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अमृत उजाला > धर्म/ज्योतिष > धर्म या ढोंग
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धर्म या ढोंग

amritujala
Last updated: May 19, 2026 12:18 pm
amritujala 2 months पहले
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धर्म या ढोंग
संकलक
डाक्टर दीपक गोस्वामी

धर्म के नाम पर जो पाखंड सदियों से पल रहा है, उसकी जड़ में एक ही रोग है : अपनी जीभ की लपलपाहट, अपने पेट की आग और अपनी वासना की गुलामी को ईश्वर की गोद में छिपा देना। मनुष्य जब पाप से लड़ नहीं पाता, तो वह पाप को ही पूजा बना देता है। वह कसाई के छुरे पर गंगाजल छिड़कता है और कहता है यह बलि है। वह शराब की बोतल पर तुलसीदल रखता है और बोलता है यह भैरव का भोग है। यह ढोंग नया नहीं है। यह तब से है जब पहले आदमी ने अपने स्वार्थ के लिए वेद की ऋचा को तोड़ा-मरोड़ा।

सनातन की आत्मा सात्विकता है। गीता चीख-चीखकर कहती है कि जो अन्न तुम्हारा रक्त बनता है, वही तुम्हारी बुद्धि बनता है। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, अंडा, ये सब तमोगुण के बीज हैं। ये शरीर में जाते ही क्रोध, वासना, आलस्य, मोह की खेती करते हैं। ऋषियों ने हजारों साल तप करके देखा कि लाश खाने वाला मन कभी शांत नहीं हो सकता। इसलिए नियम बना : यदि मोक्ष चाहिए तो जीभ पर लगाम चाहिए। मनु ने लिखा कि जो अपने स्वाद के लिए निरीह जीवों का गला काटता है, वह मरने के बाद उतनी ही बार कटता है। यह डराने के लिए नहीं, चेताने के लिए कहा गया। पर हमने क्या किया? हमने शास्त्र को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया और अपनी थाली को शास्त्र बना दिया।

अब आओ सबसे कड़वे सच पर। रामकृष्ण परमहंस का नाम लेते ही भक्तों की आंखें भीग जाती हैं। पर कथामृत के पन्ने पलटो तो वहां मछली का झोल टपकता दिखता है। काली मंदिर में बकरे का रक्त बहता है और ठाकुर का प्रसाद कहकर बांटा जाता है। एक मुंह से कहते हैं “मन को वश में रखो, पेट का धर्म से क्या रिश्ता”, दूसरे ही पल कहते हैं “साधक हो तो मांस कम खाओ”। यह कैसा दोमुंहापन है? अरे, यदि मांस खाने से आत्मा मैली नहीं होती तो ‘कम खाओ’ का उपदेश क्यों? क्या जहर की एक बूंद अमृत हो जाती है? क्या चिता की लकड़ी थोड़ी-सी घर में रखने से घर श्मशान नहीं बनता? सच तो यह है कि ‘कम खाओ’ कहना ही सबसे बड़ा स्वीकारोक्ति पत्र है। यह उस चोर की तरह है जो कहे “चोरी पाप नहीं, बस ज्यादा मत करो”। भीतर कहीं कांटा चुभ रहा था, तभी मात्रा का बहाना गढ़ा गया। वरना जिस वस्तु से ब्रह्म की प्राप्ति में बाधा न हो, उसे खुलकर खाने से कौन रोकता है?

यह रोग वहीं नहीं रुका। विवेकानंद समुद्र पार गए। वहां शेर की तरह दहाड़े कि “उपनिषद पढ़ो”, पर थाली में बीफ परोसा गया तो तर्क दिया “शास्त्र में मना नहीं है”। कौन-सा शास्त्र? मनु स्मृति का पाँचवां अध्याय पढ़ा होता तो आंख खुल जाती। वहां स्पष्ट है कि जो अपनी जीभ के सुख के लिए मूक पशु की हत्या करता है, वह घोर नरक भोगता है। पर हमें शास्त्र वही दिखता है जो हमारी थाली में बैठ जाए। हमें शिव की भांग याद है, उनका विषपान याद नहीं। हमें काली की बलि याद है, उनकी श्मशान-वैरागिनी छवि याद नहीं। हमने देवताओं को अपनी कमजोरी का वकील बना दिया।

आज गली-गली यही लीला चल रही है। सावन में कांवड़ उठाने वाला भोले का भगत, भादो आते ही मुर्गे की टांग तोड़ता है। नवरात्रि में नौ दिन लहसुन से परहेज करने वाली देवी की भक्तिन, दसवें दिन तंदूर पर टूट पड़ती है। पूछो तो ज्ञान बघारते हैं “अरे, भगवान भाव देखता है, भोजन नहीं”। धूर्तता की हद है। यदि भगवान केवल भाव ही देखता तो यम-नियम, आहार-शुद्धि, आसन-प्राणायाम सब व्यर्थ थे। ऋषि पागल थे जो कंद-मूल खाकर जीवन काट गए? यदि खून से सना निवाला और तुलसी-दल एक समान हैं, तो आश्रम और कसाईखाना एक समान क्यों नहीं? यह सुविधा का धर्म है, साधना का नहीं। यह जीभ का धर्म है, जीव का नहीं।

असली पाप मांस खाना या शराब पीना नहीं है। असली पाप है उसे धर्म की चादर ओढ़ा देना। एक शराबी यदि कहे “मैं पियक्कड़ हूँ, पतित हूँ”, तो उसके बचने की आशा है। पर जब वह कहता है “शिव भी पीते थे, मैं प्रसाद ले रहा हूँ”, तब वह अपने लिए नरक का द्वार खुद खोलता है। क्योंकि उसने पाप ही नहीं किया, पाप को पुण्य का मुखौटा पहना दिया। उसने अपने साथ ईश्वर को भी घसीट लिया। यह अपराध सबसे बड़ा है। रामकृष्ण ने यदि मछली खाई, तो खाई। वे संत थे या नहीं, यह उनका और काली का हिसाब है। पर तुम उनके नाम पर अपनी मछली को जायज मत बनाओ। तुम्हारी जीभ की लार का जिम्मा ठाकुर क्यों लें? विवेकानंद ने यदि बीफ खाया, तो उनका शरीर, उनका कर्म। पर तुम ‘वीर बनने के लिए मांस जरूरी है’ का झंडा लेकर गाय काटना शुरू मत करो। वीरता खून पीने से नहीं, खून देने से आती है।

धर्म सौदा नहीं है कि सोमवार को उधार रखो, शनिवार को ब्याज सहित खा लो। धर्म तलवार है जो सीधा काटती है। वह कहती है कि तामसिक अन्न से तामसिक मन बनेगा, और तामसिक मन से बंधन कटेगा नहीं। अब चुनाव तुम्हारा है। भोग चाहिए तो साफ-साफ भोगी बनो। मांस खाना है तो खाओ, पर छाती ठोककर कहो “हाँ, मैं स्वाद के लिए जीव मारता हूँ”। शराब पीनी है तो पियो, पर यह मत बोलो कि “यह भैरव का भोग है”। कम से कम ईमानदारी का पुण्य तो कमा लो। पाप करके खुद को पुण्यात्मा समझना, यह आत्मा के साथ सबसे बड़ा धोखा है।

याद रखो, मंदिर में बलि चढ़ाने से देवी प्रसन्न नहीं होती, अपनी बलि चढ़ाने से होती है। जीभ की बलि, वासना की बलि, अहंकार की बलि। जिस दिन बकरे की जगह अपने भीतर के पशु को काटोगे, उस दिन काली सच में मुस्कुराएगी। उससे पहले जितना मांस खाओ, जितनी बलि दो, सब ढोंग है, सब पाखंड है। और पाखंड की उम्र लंबी नहीं होती। सत्य की आग में वह एक दिन जलकर राख हो ही जाता है।

इसलिए सुनो, कड़वा लगेगा, कसैला लगेगा, पर यही नंगा सच है : ईश्वर के नाम पर पाप करने वाला नास्तिक से भी गया-गुजरा है। नास्तिक तो ईश्वर को मानता ही नहीं, पर यह पाखंडी ईश्वर को अपनी वासना का नौकर बना देता है। आत्मा को तुम लाख बहकाओ, परमात्मा को नहीं बहका सकते। वह सब देखता है। वह तुम्हारी थाली भी देखता है और तुम्हारी नीयत भी। और जब हिसाब होगा, तब न रामकृष्ण बचाने आएंगे, न विवेकानंद। वहां केवल तुम्हारा कर्म बोलेगा। तो पाप करना है तो मर्द बनकर करो। उसे धर्म की साड़ी मत पहनाओ। क्योंकि जिस दिन धर्म सुविधा बन गया, उस दिन समझो मनुष्य मर गया, केवल पशु बचा। और पशु को मोक्ष नहीं मिलता, केवल लाठी मिलती है।

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