आदर्श प्रकाश सिंह
यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हिंदी पत्रकारिता ने 200 साल का लंबा सफर तय कर लिया है। हिदी के प्रथम पत्र ‘उदंत मार्तंड‘ का प्रकाशन कोलकाता से 30 मई 1826 को हुआ था। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इस साप्ताहिक पत्र के माध्यम से जो अलख जगाई वह आज नए आयाम गढ़ रही है। मीडिया का हर विद्यार्थी और इस पेशे से जुड़ा प्रत्येक इनसान यह अवश्य जानता होगा कि हिंदी का पहला समाचार पत्र कौन सा था। मैंने जब 1982-83 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से पत्रकारिता की शिक्षा ली तो पत्रकारिता का इतिहास पढ़ते हुए यह जाना कि ‘उदंत मार्तंड‘ ही हिदी का पहला पत्र है। इस पत्र का आदर्श वाक्य था-‘हिन्दुस्तानियों के हित के हेत।‘ दुर्भाग्य यह कि भारत में हिदी पत्रकारिता का श्रीगणेश करने वाले प्रथम पत्र ‘उदंत मार्तंड‘ का जीवन बहुत छोटा रहा। संपादक को जब उत्साहजनक परिणाम नहीं मिला तो 4 दिसंबर 1827 को इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। आज हमें उन महान पत्रकारों को याद करना चाहिए जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी और इसे आगे बढाया। आजादी के आंदोलन में जनमत बनाने के उद्देश्य से हिंदी समाचार पत्रों का अमूल्य योगदान रहा है। राजा राममोहन राय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबूराव विष्णु पराड़कर को याद करके आज हम गौरान्वित होते हैं।
उस कालखंड के स्वतंत्रता सेनानियों और मनीषियों ने महसूस किया कि ंिहंदी ही हम सबको एक सूत्र में पिरो सकती है। देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने में हिंदी समाचार पत्रों का अमूल्य योगदान रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिंदी भारतीय जनमानस के दिलों की धड़कन बन गई। सभी ने यह माना कि अगर देश के कोने-कोने तक पहुंच कर देश की जनता में राष्ट्रीय चेतना भर कर धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्रीयता के संकीर्ण दायरे से ऊपर उठ कर व्यापक देशहित में लगना है तो हिंदी ही इसका एकमात्र माध्यम बन सकती है। हिंदी ने अपना यह दायित्व बखूबी निभाया और राष्ट्रभाषा के रूप में आगे बढ़ते हुए हमारे दिलों पर छा गई।
हिंदी पत्रकारिता में आज बड़े पैमाने पर बदलाव दिख रहा है। परिवर्तन इस संसार का शास्वत नियम है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। दो सौ साल तो बहुत होते हैं। तकनीक के जमाने में पत्रकारिता का स्वरूप ही बदल गया है। मैंने जब एक अक्टूबर 1984 को ‘नवभारत टाइम्स‘ लखनऊ से अपना करियर आरंभ किया तो देश भर में केवल प्रिंट मीडिया यानी छपे हुए समाचार पत्रों का ही बोलबाला था। दैनिक पत्रों में बेहतर अखबार निकालने की होड़ रहती थी। चूंकि, इस पेशे से मैं 40 वर्षों से जुड़ा हूं, लिहाजा मुझे सुबह अखबार पढ़ने का शौक अब भी है। लेकिन एक बड़ा वर्ग आज प्रिंट मीडिया से दूर होता जा रहा है। कोविड-19 के समय अखबारों पर भी संकट आ गया था। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अखबार पढ़ने की आदत पर असर डाला। मगर, नए दौर की सोशल मीडिया ने प्रिंट मीडिया को चोट पहुंचाई है। मोबाइल या कहें कि डिजिटल युग में अब पूरी दुनिया हमारी जेब में है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज समाचार पत्रों के अस्तित्व पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जहां तक प्रमाणिकता और विश्वसनीयता का सवाल है, प्रिंट मीडिया का स्थान आज भी सर्वोपरि है। लिखे हुए शब्दों पर लोग अधिक भरोसा करते हैं। छपी हुई सामग्री को आप कई वर्षों तक बतौर दस्तावेज सुरक्षित रख सकते हैं। यही वजह है कि हिंदी दैनिकों की पाठक संख्या आज लाखों-करोड़ों में है। मानक पर खरा उतरने में हिंदी पत्रकारिता का कोई सानी नहीं है। महात्मा गांधी ने 1946 में अपने पत्र ‘हरिजन‘ में लिखा था- ‘पश्चिम की तरह पूर्व में भी समाचार पत्र लोगों की बाइबल, कुरान और भगवद्गीता बनते जा रहे हैं। अखबार मे जो कुछ प्रकाशित होता है उसे लोग ईश्वरीय सत्य मान लेते हैं। इस कारण संपादकों और अन्य पत्रकारों का दायित्व बढ़ जाता है।‘
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के दौर में हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध बनाने में राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे यशस्वी संपादकों की बड़ी भूमिका रही है। ये दोनों पत्रकार मध्य प्रदेश से निकले। मेरा सौभाग्य रहा कि नवभारत टाइम्स में माथुर साहब का सानिध्य प्राप्त हुआ। वह हमारे प्रधान संपादक थे और दिल्ली कार्यालय मे बैठते थे। पर, जब भी लखनऊ आते तो हम सबके बीच बैठते और हिंदी समाचारों के लेखन और उसके संपादन पर चर्चा करते थे। उनकी सीख हमारे लिए काफी उपयोगी रहती थी। उनकी एक नसीहत मुझे बहुत अच्छी लगी। इसका पालन हमने अपने पूरे करियर के दौरान किया। माथुर साहब का कहना था- ‘समाचार खासकर इंट्रो इस तरह लिखे जाएं कि वह फौरन हमारी समझ में आ जाए। इसके लिए उन्होंने आइसक्रीम का उदाहरण दिया। यानी जिस तरह आइसक्रीम खाने पर वह तुरंत हमारे गले की नीचे उतर जाती है, उसी तरह समाचारों की भाषा ऐसी हो जो तुरंत हमारे पल्ले पड़ जाए।‘
मैं जब भी और जहां भी पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाने गया तो राजेन्द्र माथुर जी के इस कथन का उल्लेख अवश्य किया। इतनी महत्वपूर्ण बात मैं कैसे भूल सकता हूं? आजकल अखबारों में भाषा और वर्तनी पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जो नए लड़के और लड़कियां मीडिया के क्षेत्र में काम करने आते हैं उनकी हिंदी बहुत कमजोर होती है। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने के कारण हिंदी पर उनका जोर नहीं रहता। यही वजह है कि दैनिक पत्रों में भाषाई अशुद्धियों की भरमार दिखाई देती है। पत्र-पत्रिकाओं में संपादकीय विभाग की जिम्मेदारी होती है कि वह त्रुटियों को रोके और भाषाई मर्यादा का पालन करे। कई बार तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। इसके लिए गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता है। मिसाल के तौर पर चिता और चिंता में केवल एक बिंदी का फर्क है। कहीं यह बिंदी लगने से रह जाए तो क्या होगा? इसलिए सावधानी हटी, दुर्घटना घटी वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।
हिंदी पत्रकारिता लोगों को रोजगार दे रही है। सोशल मीडिया, यूट्यूब आदि के जरिये अधिसंख्य लोग इससे जुड़े हैं। हिंदी व्यापार की भाषा बन गई है। अखबारों और टीवी विज्ञापनों में हिंदी की धमक देखी जा सकती है। देश के टाॅप टेन अखबारों में से आधे हिंदी भाषा के हैं। इंडियन रीडरशिप सर्वे के अनुसार, हिंदी अखबारों की पाठक संख्या 38 करोड़ से अधिक है। भारत में 750 से अधिक टीवी चैनल हैं। इनमें 35 प्रतिशत हिंदी के हैं। इन आंकड़ों से हम आश्वस्त हो सकते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है। इंटरनेट की वजह से इसे और विस्तार मिला है। आज देश के गांव-गांव में हिदी समाचारों की पहुंच हो गई है।




