लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गोमूत्र की खरीद को लेकर एक ऐसी पहल सामने आई है, जिसका सीधा जुड़ाव गांव, पशुपालकों और खेती से है। सरकार की योजना के तहत गोमूत्र को 10 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदे जाने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य पशुपालकों को अतिरिक्त आमदनी का जरिया उपलब्ध कराने के साथ-साथ जैविक खेती को बढ़ावा देना बताया जा रहा है। गांवों में पशुपालन करने वाले परिवारों के लिए यह पहल छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन कमाई का एक नया रास्ता खोल सकती है।
इस योजना का एक अहम पहलू जैविक खेती से जुड़ा है। गोमूत्र का इस्तेमाल कई जगहों पर जैविक कृषि में तैयार किए जाने वाले उत्पादों में किया जाता है। ऐसे में इसकी खरीद और संग्रह की व्यवस्था बेहतर होने पर किसानों को स्थानीय स्तर पर ही प्राकृतिक कृषि से जुड़ी सामग्री उपलब्ध हो सकती है। इससे रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने की कोशिशों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नजरिए से देखें तो गोमूत्र की खरीद से पशुपालकों को पशुधन से अतिरिक्त आय हासिल करने का अवसर मिल सकता है। खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए पशुपालन अक्सर खेती के साथ आय का महत्वपूर्ण साधन होता है। यदि खरीद की प्रक्रिया नियमित, पारदर्शी और गांवों के करीब रखी जाती है तो इसका लाभ सीधे पशुपालकों तक पहुंच सकता है। हालांकि, योजना का वास्तविक असर खरीद केंद्रों, भुगतान व्यवस्था और गोमूत्र के उचित उपयोग की व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
सरकार की इस पहल को केवल गोमूत्र खरीद तक सीमित न मानकर ग्रामीण स्तर पर पशुपालन और जैविक खेती को जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि योजना को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है और पशुपालकों को भुगतान कितनी आसानी और समय पर मिलता है। अगर व्यवस्था प्रभावी रही तो इससे गांवों में पशुपालन को प्रोत्साहन मिलने के साथ जैविक खेती के लिए स्थानीय संसाधन उपलब्ध कराने में भी मदद मिल सकती है।






