नेपाल में आई भयावह बाढ़ और मलबे के सैलाब ने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि प्रकृति के सामने इंसान कितना असहाय है। तस्वीरों और वीडियो में दिखाई देने वाला भारी मलबा, काली मिट्टी, चट्टानें और पेड़ों के साथ बहता पानी देखकर कई सवाल उठते हैं। क्या यह केवल सामान्य फ्लैश फ्लड थी या इसके पीछे कोई असामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया भी काम कर रही थी? सोशल मीडिया पर इसे “मडफ्लड” और भू-अभियांत्रिकी से जोड़कर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, इन दावों को अभी प्रमाणित तथ्य मानना जल्दबाजी होगी। ग्लेशियल झील के फटने, भूस्खलन, अत्यधिक वर्षा और पहाड़ी क्षेत्रों में जमा मलबे के अचानक बहने जैसी प्राकृतिक घटनाएं भी बेहद शक्तिशाली और विनाशकारी सैलाब पैदा कर सकती हैं।
फ्लैश फ्लड और मलबे से भरे सैलाब को एक ही चीज समझना भी सही नहीं है। पहाड़ों में जब भारी बारिश, भूस्खलन या ग्लेशियल झील के टूटने जैसी घटनाएं एक साथ प्रभाव डालती हैं, तो पानी अपने साथ मिट्टी, चट्टान, पेड़ और दूसरी सामग्री बहाकर ला सकता है। दूर से देखने पर यह प्रवाह सामान्य पानी की बाढ़ के बजाय काले, गाढ़े कीचड़ जैसा दिखाई दे सकता है। इसलिए केवल पानी का रंग काला होना या मलबे की मात्रा अधिक होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि कोई कृत्रिम प्रयोग किया गया था। फिर भी, ऐसी त्रासदी में यह सवाल जरूर उठना चाहिए कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में मलबा कहां से आया, ग्लेशियरों और पहाड़ी ढलानों की स्थिति क्या थी और मौसम संबंधी परिस्थितियां कितनी असामान्य थीं।
भू-अभियांत्रिकी और मौसम को प्रभावित करने वाली तकनीकों पर दुनिया भर में शोध जरूर हो रहा है। क्लाउड सीडिंग जैसी तकनीक का प्रयोग कुछ परिस्थितियों में वर्षा बढ़ाने के प्रयास के लिए किया जाता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि किसी विशेष बाढ़ को जानबूझकर तैयार किया गया था, अलग बात है और उसके लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं। HAARP को लेकर भी इंटरनेट पर अनेक दावे किए जाते हैं, लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी इन तकनीकों को किसी घाटी में अचानक भारी बारिश गिराने या ग्लेशियरों को हथियार की तरह पिघलाने की क्षमता से जोड़ने का पर्याप्त प्रमाण नहीं देती। इसलिए नेपाल की घटना को किसी सैन्य या भू-अभियांत्रिकी प्रयोग का परिणाम बताने से पहले वैज्ञानिक जांच, मौसम संबंधी आंकड़ों, उपग्रह तस्वीरों और स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिपोर्ट का इंतजार करना अधिक जिम्मेदार दृष्टिकोण होगा।
नेपाल की इस त्रासदी का सबसे मानवीय पहलू उन लोगों की पीड़ा है जिन्होंने कुछ ही घंटों में अपने घर, आजीविका और अपनों को खो दिया। ऐसे समय में सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन डर फैलाना नहीं। अगर घटना वास्तव में असामान्य थी, तो वैज्ञानिक जांच उसके कारणों को सामने ला सकती है; और अगर यह जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम थी, तो उससे भी हमें बहुत कुछ सीखना होगा। भारत और नेपाल जैसे हिमालयी देशों के लिए असली चुनौती यही है कि ऐसी घटनाओं की पूर्व चेतावनी, सीमा-पार जल एवं मौसम निगरानी और आपदा प्रबंधन को और मजबूत किया जाए। सवाल पूछना हमारी जिम्मेदारी है, लेकिन जवाब तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तलाशना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।






















