डाक्टर दीपक गोस्वामी
छल विवाह या लव जिहाद के धटनाक्रम के प्रारंभ का अवलोकन जो रोज समाज में घटित और चर्चित हो रही है, को जब प्राचीन रामायण कथा के विवेक से देखा जाए तो वर्तमान की कई जटिल समस्याएँ अपने मूल में बहुत सरल दिखने लगती हैं। लव जिहाद या छल विवाह नाम से चर्चित समस्या को समझने के लिए वाल्मीकि रामायण में सीता माता द्वारा स्वीकार की गई तीन भूलें एक अद्भुत लाक्षणिक आधार देती हैं। पहली भूल कामना थी, दूसरी क्रोध और अविश्वास, तीसरी प्रशंसा का मोह। ये तीनों भूलें किसी भी काल में मनुष्य के विवेक को ढँकने के लिए पर्याप्त हैं। आज किशोरावस्था में प्रवेश कर रही बेटियों के जीवन में यही तीन द्वार बार बार खुलते हैं और इन्हीं द्वारों से आधुनिक छद्मवेश प्रवेश करता है।
सोने के मृग की लालसा केवल चर्म की नहीं थी, वह नवीनता की, भिन्नता की, चमक की लालसा थी। किशोर मन स्वभाव से जिज्ञासु होता है। मनोविज्ञान कहता है कि 13 से 19 वर्ष की आयु में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पूर्ण विकसित नहीं होता। निर्णय क्षमता भावनाओं से संचालित होती है। इसी अवस्था में सोशल मीडिया, रील, वेब सीरीज और सहपाठी समूह के द्वारा एक कृत्रिम दुनिया रची जाती है जहाँ साधारण जीवन फीका लगता है और मृग की सुनहरी चमक वाला जीवन वास्तविक लगने लगता है। इसी चमक को आधार बनाकर छद्म पहचान गढ़ी जाती है। नाम बदला जाता है, पृष्ठभूमि छुपाई जाती है, आर्थिक स्थिति का प्रदर्शन किया जाता है। यह मारीच का स्वर्ण मृग है। वह मृग वास्तविक नहीं था, केवल मायाजाल था। आज भी गिफ्ट, महँगे फोन, रेस्तराँ, बाइक पर घुमाना, यह सब उसी मायाजाल का भौतिक रूप है। आर्थिक कसौटी पर देखें तो अधिकांश मामलों में लक्ष्य आर्थिक रूप से कमजोर या भावनात्मक रूप से अकेली युवती होती है। जब घर में संवाद का अभाव हो, माता-पिता के पास समय न हो, तब बाहर से मिला क्षणिक सम्मान बहुत बड़ा लगता है। यही पहली भूल की जमीन तैयार करता है।
दूसरी भूल लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन था। लक्ष्मण केवल देवर नहीं थे, वे मर्यादा थे, परिवार थे, धर्म थे, विवेक थे। सीता ने आवेश में आकर लक्ष्मण पर अविश्वास किया, कटु वचन कहे। परिणाम सबको ज्ञात है। आज लक्ष्मण रेखा परिवार है, संस्कार है, कुल परंपरा है, स्वधर्म है। किशोरावस्था में जब किसी बाहरी व्यक्ति पर विश्वास जन्म लेता है तो पहला संघर्ष घर से होता है। घर वाले रोकते हैं, टोकते हैं, प्रश्न पूछते हैं। तब उन्हें पिछड़ा, दकियानूसी, स्वतंत्रता का विरोधी कहकर खारिज कर दिया जाता है। क्रोध में आकर बेटियाँ वह कह बैठती हैं जो सामान्य स्थिति में कभी न कहतीं। यहीं परिवार और व्यक्ति के बीच दीवार खड़ी हो जाती है। सामाजिक दृष्टि से देखें तो एक बार जब युवती परिवार से कट जाती है तो उसके पास लौटने का सामाजिक-भावनात्मक आधार कमजोर पड़ जाता है। कूटनीतिक रूप से यह स्थिति उसे और अधिक निर्भर बना देती है। संविधान प्रत्येक वयस्क को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है, यह सत्य है। परन्तु संविधान छल, कपट, पहचान छुपाकर विवाह, बलपूर्वक धर्म परिवर्तन को अपराध भी मानता है। अनेक राज्यों ने विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम बनाए हैं। इन कानूनों का आधार ही छल को रोकना है। इसलिए लक्ष्मण रूपी परिवार की बात अनसुनी करना दूसरी बड़ी भूल बन जाती है।
तीसरी भूल सबसे सूक्ष्म थी। रावण साधु वेश में आया। गेरुआ वस्त्र, शिखा, सूत्र, मधुर वाणी, शास्त्र का उद्धरण। सीता माता ने सोचा कि साधु द्वार पर आया है तो आतिथ्य धर्म निभाना चाहिए। यहाँ प्रशंसा का मोह विवेक पर भारी पड़ा। रावण ने सीता की नहीं, उनके सौंदर्य और कुल की प्रशंसा की। प्रशंसा जब अहम को छूती है तो बुद्धि सो जाती है। मनोवैज्ञानिक शब्दावली में इसे लव बॉम्बिंग कहते हैं। आरंभ में अत्यधिक केयर, सम्मान, मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ जैसे वाक्य, हर बात पर हाँ में हाँ मिलाना। यह व्यवहार डोपामिन स्पाइक पैदा करता है। किशोर मस्तिष्क इसे प्रेम समझ लेता है। परन्तु यह प्रेम नहीं, रणनीति है। कुछ समय बाद यही व्यक्ति नियंत्रित करने लगता है। पहनावा बदलो, दोस्तों से मत मिलो, घर में मत बताओ। धीरे धीरे पहचान बदलने का दबाव आता है। यह रावण का वास्तविक रूप प्रकट होना है। अब तक तीसरी भूल हो चुकी होती है।
इस पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक और वैज्ञानिक दोनों धरातल पर परखना होगा। जनसांख्यिकी परिवर्तन एक वैश्विक चिंता है। प्यू रिसर्च के आँकड़े बताते हैं कि धर्म परिवर्तन के पीछे विवाह एक सबसे बड़ा कारण है। मान्यनीय उच्च न्यायालयों ने कई न्यायिक निर्णयों में छल से विवाह और फिर धर्म परिवर्तन के मामलों को बहुत गंभीर और संवेदनशील माना है। यह कटु सत्य है कि समाज में लगातार युवतियों के छल विवाह कर धर्म परिवर्तन कराने के मामले सामने आ रहे है। कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश की पुलिस जाँचों में फर्जी पहचान, निकाह के बाद विदेश ले जाने के प्रयास जैसे तथ्य सामने आए। यह कोई सम्पूर्ण समुदाय पर आरोप नहीं है। अपराधी व्यक्ति होता है, समुदाय नहीं। परन्तु पैटर्न को नकारना भी बुद्धिमानी नहीं है। जब एक जैसी पद्धति, एक जैसे झूठ, एक जैसा लक्ष्य बार बार दिखे तो उसे संयोग कहकर छोड़ देना आत्मघाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो स्वधर्म का अर्थ केवल पूजा पद्धति नहीं है। गीता कहती है स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। स्वधर्म का अर्थ है अपनी प्रकृति, अपने परिवार, अपने उत्तरदायित्व के अनुकूल आचरण। जब युवती अपने मूल से कटती है तो केवल धर्म नहीं बदलता, पूरी जीवनशैली, खानपान, उत्सव, रिश्ते, सोच बदलने का दबाव आता है। बहुत बार यह परिवर्तन स्वेच्छा से नहीं, परिस्थिति से होता है। और जब वहाँ भी सम्मान न मिले तो न घर की रहती है न घाट की। यह परलौकिक नहीं, इसी लोक का कड़वा सच है।
अब समाधान की बात। कड़वी बात यह है कि केवल बेटियों को उपदेश देने से काम नहीं चलेगा। माता-पिता को लक्ष्मण बनना होगा। डाँट नहीं, संवाद। निगरानी नहीं, मित्रता। घर में इतना प्रेम और अपनापन हो कि बेटी को बाहर मान्यता न खोजनी पड़े। दूसरा, शिक्षा। धर्म की शिक्षा का अर्थ कर्मकांड नहीं, दर्शन है। अपनी परंपरा का तर्क सहित ज्ञान हो तो कोई भी गेरुआ वस्त्र पहनकर भरमा नहीं सकता। बेटियों को अर्ली वार्निंग साइन सिखाने होंगे। पहचान छुपाना, जल्दी शादी का दबाव, परिवार से अलग करना, सोशल मीडिया पासवर्ड माँगना, धर्म पर लगातार टिप्पणी करना, ये सब रेड फ्लैग हैं। कानून की जानकारी भी जरूरी है। बालिग होने पर भी यदि विवाह छल से हुआ है तो वह शून्य है। महिला आयोग, 181 हेल्पलाइन, ये सब संवैधानिक सुरक्षा हैं।
आर्थिक पक्ष भी है। स्वावलंबी बेटी को खरीदना कठिन होता है। इसलिए कौशल, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता सबसे बड़ी ढाल है। सोने का मृग तब आकर्षित नहीं करता जब अपने पास पहले से आत्मनिर्भरता का स्वर्ण हो।
अंत में, यह विषय नफरत का नहीं, सतर्कता का है। प्रेम अपराध नहीं है। परन्तु प्रेम के नाम पर छल, पहचान का भ्रम, और अंत में अस्तित्व का संकट, यह अपराध है। सीता माता ने अपनी भूल स्वीकार करके हमें साहस दिया कि भूल हो सकती है, परन्तु विवेक जाग्रत रहे तो हनुमान रूपी धर्म और पुरुषार्थ रक्षा के लिए आ ही जाते हैं। आज आवश्यकता है कि प्रत्येक घर में सीता की कथा केवल पूजा के लिए नहीं, चेतावनी के लिए पढ़ी जाए। बेटी को मृग की चमक, लक्ष्मण के वचन और साधु के वेश, तीनों की पहचान सिखाई जाए। तभी वह स्वयं अपनी लक्ष्मण रेखा खींच सकेगी। और जब विवेक जागता है तो कोई रावण जीत नहीं पाता।




