केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन से ई-100 ईंधन से चलने वाले वाहनों का रास्ता साफ
सब हेडिंग: सामान्य पेट्रोल कारों में नहीं डाल सकेंगे एथेनॉल; विशेष रूप से डिजाइन और प्रमाणित वाहनों में ही होगा इस्तेमाल, फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को मिलेगा बढ़ावा
नई दिल्ली। पेट्रोल पर निर्भरता कम करने और प्रदूषण से निपटने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने 100 प्रतिशत एथेनॉल वाले ई-100 ईंधन से चलने वाले वाहनों के लिए नियमों में संशोधन कर इनके इस्तेमाल का रास्ता साफ कर दिया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में बदलाव अधिसूचित किए हैं। इससे अधिक एथेनॉल वाले ईंधन पर चलने के लिए विशेष रूप से तैयार फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के परीक्षण और प्रमाणन की व्यवस्था को विस्तार मिलेगा। सरकार को उम्मीद है कि एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी और पर्यावरण को भी लाभ होगा।
हालांकि, इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि अब सभी पेट्रोल कारों में ई-100 ईंधन डाला जा सकेगा। सामान्य पेट्रोल या ई-20 ईंधन पर चलने वाले मौजूदा वाहनों में ई-85 और ई-100 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके लिए इंजन और ईंधन प्रणाली को विशेष रूप से तैयार करना जरूरी है। केवल संबंधित ईंधन के लिए डिजाइन और प्रमाणित वाहन ही इसका इस्तेमाल कर सकेंगे।
ई-100 क्या है, कैसे बनेगा विकल्प
ई-100 ऐसा ईंधन है जिसमें एथेनॉल की मात्रा 100 प्रतिशत होती है। एथेनॉल एक जैव ईंधन है, जिसे गन्ने, मक्का और अन्य जैविक स्रोतों से तैयार किया जा सकता है। इसके विपरीत, ई-20 पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। ई-85 में एथेनॉल की मात्रा 85 प्रतिशत होती है। सरकार पहले ही पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रही है। अब ई-100 को नियमों में जगह मिलने से वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल का दायरा बढ़ेगा।
मौजूदा कार मालिकों को क्या होगा फायदा
नए प्रावधानों से फिलहाल मौजूदा कार मालिकों को अपनी गाड़ी में कोई बदलाव कराने की जरूरत नहीं है। उनकी गाड़ियां निर्धारित ईंधन के अनुसार ही चलेंगी। ई-100 या ई-85 का इस्तेमाल करने के लिए अलग से तैयार वाहन खरीदना होगा। इसलिए यह फैसला सामान्य पेट्रोल वाहनों को तत्काल बदलने की अनिवार्यता नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक अतिरिक्त विकल्प है।
एक ही वाहन में अलग-अलग ईंधन का विकल्प
फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक ऐसे वाहनों में इस्तेमाल होती है, जिन्हें पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले ईंधन पर चलाने के लिए बनाया जाता है। इसके लिए इंजन, ईंधन आपूर्ति प्रणाली और अन्य संबंधित हिस्सों को अनुकूल बनाना पड़ता है। इस तकनीक से वाहन की ईंधन संबंधी जरूरतों के अनुसार विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, वास्तविक उपयोगिता वाहन की तकनीक, ईंधन की उपलब्धता और उसकी कीमत पर निर्भर करेगी।
किसानों से लेकर अर्थव्यवस्था तक असर
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल के स्थान पर घरेलू स्तर पर तैयार जैव ईंधन का इस्तेमाल बढ़ने से विदेशी मुद्रा की बचत और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों तथा जैव ईंधन उद्योग को भी अवसर मिल सकते हैं।
सरकार के मुताबिक, एथेनॉल के इस्तेमाल से वाहनों से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसे कुछ प्रदूषकों के उत्सर्जन में कमी आ सकती है। हालांकि, वास्तविक पर्यावरणीय लाभ एथेनॉल के उत्पादन के तरीके, भूमि और पानी के इस्तेमाल तथा वाहन की तकनीक पर भी निर्भर करेंगे।
वाहन कंपनियां भी कर रहीं तैयारी
मारुति सुजुकी, टोयोटा, टाटा मोटर्स और हुंडई जैसी कंपनियां फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक पर काम कर रही हैं। मारुति सुजुकी ने जून 2026 में ई-20 से ई-100 तक के ईंधन के अनुकूल वैगनआर का प्रदर्शन किया था। नए नियमों से इस तरह के वाहनों के परीक्षण और प्रमाणन के लिए नियामकीय आधार मजबूत होगा। हालांकि, बड़े पैमाने पर इनकी उपलब्धता के लिए वाहन उत्पादन के साथ ई-100 ईंधन की आपूर्ति और पेट्रोल पंपों पर इसकी उपलब्धता भी जरूरी होगी।
सरकार का यह कदम वैकल्पिक ईंधन की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ई-100 वाहनों की कीमत कितनी रहती है, ईंधन कितनी आसानी से मिलता है और आम उपभोक्ताओं के लिए इसका इस्तेमाल कितना किफायती साबित होता है।





















