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ईरानी नेता खोमेनी की हमले में मौत -विरासत, नेतृत्व संकट और खाड़ी तनाव का भारत पर संभावित असर

Akhand Pratap Singh
Last updated: मार्च 1, 2026 10:05 पूर्वाह्न
Akhand Pratap Singh 2 महीना पहले
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डा.अखंड प्रताप सिंह 

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान द्वारा ईरानी धार्मिक नेता अयातुल्लाह खोमेनी के मौत की पुष्टि और वर्तमान संकट के बाद ईरान के इस्लामी गणराज्य के संस्थापक अयातुल्लाह खोमेनी द्वारा स्थापित राजनीतिक-धार्मिक व्यवस्था आज एक नए संकट के दौर से गुजर रही है। उनके उत्तराधिकारियों के नेतृत्व पर मंडराते खतरे और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक अस्थिरता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक हितों और रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

अयातुल्लाह खोमेनी ने 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान को धार्मिक नेतृत्व आधारित शासन प्रणाली दी। “विलायत-ए-फक़ीह”  सिद्धांत के तहत सर्वोच्च नेता को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। आज वही व्यवस्था क्षेत्रीय तनाव और नेतृत्व अनिश्चितता के कारण दबाव में है, जिससे मध्य-पूर्व की स्थिरता पर असर पड़ रहा है।

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। तनाव और बढ़ने पर तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे वैश्विक कीमतों में तेजी आएगी। इससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगे होने और महंगाई बढ़ने की आशंका है।

दुनिया के तेल परिवहन का बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरता है। यदि संघर्ष बढ़ता है, तो समुद्री सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इससे शिपिंग लागत बढ़ेगी और भारत के आयात-निर्यात तथा आपूर्ति श्रृंखला पर भी व्यापक असर पड़ेगा।

खाड़ी देशों में 80 लाख से अधिक भारतीय कार्यरत हैं। क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति में उनकी सुरक्षा, रोजगार और वापसी की संभावनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। किसी भी आपात स्थिति में भारत को बड़े पैमाने पर निकासी अभियान चलाना पड़ सकता है।

विश्लेषकों के अनुसार तेल कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है, जिससे रुपये पर दबाव और शेयर बाजार में अस्थिरता संभव है। साथ ही भारत को ईरान, अमेरिका और इजरायल के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। ईरान में चाबहार बंदरगाह परियोजना और मध्य एशिया तक व्यापारिक संपर्क भी प्रभावित हो सकते हैं।

ईरानी नेता खोमेनी द्वारा स्थापित व्यवस्था आज जिस संकट से गुजर रही है, उसका प्रभाव क्षेत्रीय स्थिरता से आगे बढ़कर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। भारत के लिए यह स्थिति ऊर्जा कीमतों, व्यापार, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।

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