बुद्ध और सामाजिक समरसता

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बुद्ध और सामाजिक समरसता:

वैशाख की पूर्णिमा। चांद अपनी पूरी आभा में। उसी दिन जन्मे, उसी दिन बोध मिला, उसी दिन महापरिनिर्वाण। तीन महायोग एक तिथि पर — यही है बुद्ध पूर्णिमा। पर बुद्ध केवल एक तिथि नहीं, एक क्रांति हैं। एक ऐसी क्रांति जिसने तलवार से नहीं, करुणा से समाज को जोड़ा। आज जब हम दीवारों की बात करते हैं, बुद्ध सेतु की बात करते हैं।

1. राजकुमार से श्रमण तक: भेद मिटाने की पहली यात्रा
सिद्धार्थ का जन्म कपिलवस्तु के राजमहल में हुआ। सोने का पालना, रेशम के वस्त्र, दास-दासियाँ। पर महल की खिड़की से जब उन्होंने एक बूढ़ा, एक रोगी, एक मृतक और एक संन्यासी देखा — चार दृश्यों ने राजपाट को छोटा कर दिया। 29 साल का युवक रात के अंधेरे में यशोधरा और राहुल को सोता छोड़कर निकल पड़ा। क्यों? क्योंकि दुख का कोई वर्ण नहीं होता। राजा दुखी है तो रंक भी दुखी है। बुद्ध की पहली सामाजिक समरसता यही थी — अपना सुख छोड़कर सबका दुख अपना लेना।

6 साल तक शरीर को गलाया। हाड़-मांस का ढांचा रह गए। पर समझ आया कि अति तप भी भेद है, अति भोग भी भेद है। बोधगया में पीपल तले जब आंख खुली, तो जो मिला वो “मध्यम मार्ग” था। न ऊंच न नीच, न अति न अभाव। यही समरसता का पहला सूत्र बना।

2. सारनाथ का सिंहनाद: सबके लिए धर्मचक्र
ज्ञान मिला तो बुद्ध चुप नहीं बैठे। सारनाथ गए। पांच ब्राह्मण शिष्य सामने थे। पर बुद्ध ने धर्म को ब्राह्मण की बपौती नहीं बनने दिया। नाई उपालि को भिक्षु संघ में लिया, अंगुलिमाल डाकू को गले लगाया, आम्रपाली नगरवधू को भिक्षुणी बनाया। उस युग में जब जन्म से जाति तय होती थी, बुद्ध ने कहा — “न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो। कर्मणा वसलो होति, कर्मणा होति ब्राह्मणो।” जन्म से न कोई शूद्र, न ब्राह्मण। कर्म से ही पहचान।

यह सीधा प्रहार था उस व्यवस्था पर जो इंसान को इंसान से बांटती थी। भिक्षु संघ में क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र एक पात्र में खाते, एक साथ सोते। राजा बिम्बिसार और सफाई करने वाला सुनित — दोनों को “भंते” कहकर एक समान संबोधित किया जाता। 2500 साल पहले का यह दृश्य आज के भारत का सपना है।

3. चार आर्य सत्य: दुख को जोड़ने वाला धागा
बुद्ध ने कहा — दुख है। यह पहला सत्य दुनिया के हर इंसान को जोड़ता है। अमीर का दुख, गरीब का दुख, स्त्री का दुख, पुरुष का दुख — नाम अलग, पीड़ा एक। दुख का कारण तृष्णा है — मेरा घर, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा अहं। यही “मेरा” समाज को तोड़ता है।

दुख का निवारण संभव है। कैसे? अष्टांगिक मार्ग से — सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। गौर करो, इसमें कहीं नहीं लिखा कि मंदिर जाओ या मस्जिद। लिखा है — दृष्टि साफ रखो, वाणी में जहर न घोलो, किसी की रोजी न छीनो। यह संविधान से भी बड़ा सामाजिक करार है।

4. मैत्री और करुणा: समरसता के दो पंख
बुद्ध ने “वैर को वैर से नहीं, अवैर से जीतो” कहा। आज जब एक व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर दंगे हो जाते हैं, बुद्ध का यह वाक्य कलम तोड़ औषधि है। उन्होंने मैत्री भावना सिखाई — “सब्बे सत्ता सुखी होन्तु” — सभी प्राणी सुखी हों। इसमें न हिंदू है न मुसलमान, न अगड़ा न पिछड़ा।

किस्सा है — बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त ने उन पर पागल हाथी छुड़वाया। सारा शहर भागा। बुद्ध खड़े रहे, हाथ उठाया, मैत्री की तरंग छोड़ी। हाथी रुक गया, झुका, पैर चूमे। हिंसा को अहिंसा से जीतना — यही सामाजिक समरसता का सर्वोच्च उदाहरण है। तलवार से जीता राज कल टूट जाता है, करुणा से जीता दिल युगों तक जुड़ा रहता है।

5. स्त्री और शूद्र: बंद दरवाजे खोल दिए
आनंद के बहुत आग्रह पर बुद्ध ने भिक्षुणी संघ बनाया। महाप्रजापति गौतमी पहली भिक्षुणी बनीं। उस दौर में स्त्री को ज्ञान का अधिकार नहीं था। बुद्ध ने कहा — “निर्वाण का दरवाजा स्त्री-पुरुष दोनों के लिए खुला है।” आम्रपाली ने अपना आम्रवन संघ को दान दिया। वेश्या से दान लेने वाला समाज आज भी हिचकता है, बुद्ध ने 2500 साल पहले हिचक तोड़ दी।

रैदास, कबीर, अंबेडकर — सबने बुद्ध के इसी समता मार्ग से ताकत ली। बाबा साहेब ने 1956 में नागपुर में 5 लाख लोगों के साथ धम्म दीक्षा ली। क्यों? क्योंकि बुद्ध का धम्म जन्म-आधारित भेद को नकारता है। यह धर्मांतरण नहीं, आत्म-सम्मान का प्रत्यारोपण था।

6. बुद्ध पूर्णिमा का संदेश: दीप से दीप जलाएं
बुद्ध ने आखिरी शब्द कहे — “अप्प दीपो भव” — अपना दीपक खुद बनो। पर दीपक का काम क्या है? खुद जलकर दूसरों को रौशनी देना। यही समरसता है। तुम्हारा दीपक मेरे अंधेरे को काटे, मेरा दीपक तुम्हारे रास्ते को रौशन करे।

आज फतेहपुर सीकरी में बैठकर सोचो — अकबर ने यहीं “इबादतखाना” बनवाया था। हर धर्म के लोग बहस करते थे। बुद्ध ने तो उससे 2000 साल पहले ही “धर्म सभा” शुरू कर दी थी। कोई भी आओ, सवाल पूछो, तर्क करो। धम्म में आस्था से पहले विवेक है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं — “एहि पस्सिको” — आओ, खुद देखो। आंख मूंदकर मत मानो।

7. सच: बुद्ध आज क्यों जरूरी
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के दौर में, जहाँ 30 सेकंड में नफरत वायरल होती है, बुद्ध का “सम्यक वाणी” ब्रह्मास्त्र है। बोलने से पहले तोलो — क्या यह सच है? क्या यह जरूरी है? क्या यह प्रिय है? तीनों कसौटी पर खरा उतरे तभी बोलो। इतना कर लें तो आधी लड़ाइयाँ खत्म।

जाति पूछकर पानी पिलाने वाले समाज में बुद्ध का भिक्षु-पात्र क्रांति है। उस पात्र में राजा का भात और चांडाल की रोटी एक हो जाती थी। आज हमें अपने मन का भिक्षु-पात्र बड़ा करना है। पड़ोसी की जाति नहीं, भूख देखो। सहकर्मी का धर्म नहीं, हुनर देखो।

बुद्ध ने मूर्ति पूजा पर जोर नहीं दिया, शील पर दिया। पंचशील — हत्या न करना, चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झूठ न बोलना, नशा न करना। ये पांच नियम अगर मोहल्ला अपना ले, तो पुलिस की जरूरत आधे से कम हो जाए। यह कानून नहीं, लोक-धर्म है।

अंत में: समरसता का बोधिवृक्ष
बोधगया का वो पीपल आज भी खड़ा है। आंधी आई, तूफान आए, पर जड़ें गहरी थीं। बुद्ध का संदेश भी वैसा ही बोधिवृक्ष है। उसकी छाया में हिंदू बैठे, मुस्लिम बैठे, सिख बैठे, ईसाई बैठे — किसी से उसका धर्म नहीं पूछा गया।

बुद्ध पूर्णिमा मनाना है तो मोमबत्ती जलाकर फोटो खींचना काफी नहीं। किसी एक “दूसरे” को गले लगाओ। जिसको तुम “वो” कहते हो, उसे “अपना” कहो। भीम राव ने बुद्ध को गले लगाया तो करोड़ों को रीढ़ मिली। तुम किसी एक की आंख का डर हटाओगे तो समाज की पीठ सीधी होगी।

बुद्ध का अंतिम उपदेश था — “वयधम्मा संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ” — सभी संस्कार नश्वर हैं, प्रमाद रहित होकर काम करो। समरसता भी संस्कार है। रोज उसे सींचना होगा, वरना सूख जाएगा।

तो आओ, इस बुद्ध पूर्णिमा पर शपथ लें — न हम ऊंचे, न तुम नीचे। दुख एक, धरती एक, चांद एक, और बुद्ध का रास्ता भी एक — करुणा का, मैत्री का, समता का। यही कलम तोड़ सच है, यही सर्वश्रेष्ठ समाज है।

सबका मंगल हो। भवतु सब्ब मंगलं।
डॉक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,सामाजिक कार्यकर्ता, मोटिवेशनल स्पीकर,ट्रेनर है

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