प्रमाणित आँकड़ों की कसौटी पर हिंदी पत्रकारिता का यथार्थ

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डॉक्टर दीपक गोस्वामी

हिंदी पत्रकारिता आज एक कठिन मोड़ पर खड़ी है। छोटे-मंझोले पत्र-पत्रिकाओं के सामने पाठकों की कमी सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। यह संकट केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है। इसे समझने के लिए हमें तथ्यों को देखना होगा। यह वही आँकड़े हैं जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं।

समाचारपत्रों के पंजीयक की रिपोर्ट ‘प्रेस इन इंडिया 2020-21’ के अनुसार 31 मार्च 2021 तक देश में कुल पंजीकृत प्रकाशन 1,44,520 थे। इनमें हिंदी के 55,349 प्रकाशन थे। पर वार्षिक विवरण केवल 32,938 प्रकाशनों ने ही दाखिल किया। यानी 1,11,582 प्रकाशनों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट नहीं है। 2020-21 में 1,097 नए प्रकाशन पंजीकृत हुए, 60 बंद हुए। 2021 के बाद का कोई आधिकारिक आँकड़ा सार्वजनिक नहीं है।

प्रसार की बात करें तो 2020-21 में सभी भाषाओं के प्रकाशनों का कुल दावा किया गया प्रसार 38,64,82,373 प्रतियाँ था। हिंदी का हिस्सा 18,93,96,236 प्रतियाँ। भारतीय पाठक सर्वेक्षण 2019 प्रथम तिमाही बताता है कि हिंदी दैनिकों की कुल पाठक संख्या 18.6 करोड़ थी। 2017 में 17.6 करोड़ थी। औसत निर्गत पाठक संख्या 7.66 करोड़ थी। 2019 के बाद भारतीय पाठक सर्वेक्षण ने नए प्रसार आँकड़े जारी नहीं किए हैं।

पाठक का स्वरूप बदल रहा है। भारतीय इंटरनेट एवं मोबाइल संघ-केन्टर की ‘इंटरनेट इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार 2024 के अंत तक भारत में 886 मिलियन सक्रिय अंतर्जाल उपयोगकर्ता थे। ग्रामीण भारत के 488 मिलियन, शहरी के 397 मिलियन। ग्रामीण उपयोगकर्ता 55% हो गए। 2025 में यह संख्या 958 मिलियन पहुँच गई, जिनमें 57% यानी 548 मिलियन ग्रामीण हैं। भारतीय पाठक सर्वेक्षण 2019 कहता है कि देश में दैनिक समाचारपत्र पढ़ने वालों की पहुँच 39% थी। शहरी में 53%, ग्रामीण में 32%। हिंदी दैनिकों की पहुँच 17% थी। अंग्रेजी दैनिकों के कुल पाठक 3.1 करोड़ थे। आज ग्रामीण पाठक भी सूचना के लिए अंतर्जाल का उपयोग कर रहा है। पारंपरिक पुस्तकालयों में पाठकों की संख्या घटी है।

हिंदी पत्रकारिता की आर्थिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है। समाचारपत्र छपाई कागज कोविड से पहले 31-35 रुपये प्रति किलो था। कोविड में 70 रुपये से ऊपर चला गया। जुलाई 2023 तक 48-52 रुपये प्रति किलो था। आयातित कागज 400 डॉलर प्रति मीट्रिक टन था, जो बढ़कर 1,000-1,050 डॉलर तक गया। 2023-24 की तीसरी तिमाही तक 540-560 डॉलर पर आया। एक 16 पृष्ठ का समाचारपत्र छापने की लागत 3.40 रुपये से ऊपर है, पर विक्रय मूल्य अक्सर 2 रुपये रहता है।

विज्ञापन का परिदृश्य बदल गया है। डेंट्सू-ई4एम की 2026 रिपोर्ट के अनुसार 2025 के अंत तक कुल विज्ञापन 1,22,155 करोड़ रुपये का हो गया। इसमें अंकीय का हिस्सा 59% यानी 71,621 करोड़ रुपये। दूरदर्शन 21% यानी 25,964 करोड़। मुद्रित 14% यानी 16,594 करोड़ पर है। 2016 में अंकीय और पारंपरिक का अनुपात 12:88 था। अब 59:41 हो गया।

सरकारी विज्ञापन: केंद्रीय संचार ब्यूरो ने 2022-23 में 331.01 करोड़ रुपये खर्च किए। 2023-24 में 12 दिसंबर 2023 तक 967.46 करोड़ रुपये। लोकसभा में दी जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में मुद्रित विज्ञापनों पर 119.79 करोड़ रुपये 1,052 समाचारपत्रों को दिए गए। इसमें शीर्ष 10 मीडिया समूहों को 63.23 करोड़ रुपये से ज्यादा मिले। दैनिक जागरण को 9.63 करोड़, दैनिक भास्कर को 8.29 करोड़, अमर उजाला को 4.93 करोड़। शेष 1,042 समाचारपत्रों के लिए 56.56 करोड़ बचा। औसत 5.4 लाख सालाना। छोटे प्रकाशनों के लिए संपादन, मुद्रण, वितरण और कर्मचारियों का खर्च निकालना कठिन हो रहा है।

राजनीतिक दलों के पास अब अपने सूचना माध्यम हैं। उनके सूचना प्रकोष्ठ और जाल प्रसारण वाहिनी लाखों लोगों तक सीधे पहुँचते हैं। छोटे समाचारपत्रों की भूमिका सीमित हो रही है। सरकारी विज्ञापन नीति के तहत आवंटन होता है।

पाठक की अपेक्षाएँ बदली हैं। आज युवा सारांश में जानकारी चाहता है। 2000 शब्द के संपादकीय की जगह 200 शब्द का विश्लेषण। पर छोटे पत्रों के पास अंकीय टीम, आँकड़ा विश्लेषक, खोज इंजन विशेषज्ञ का अभाव है। वे अक्सर फेसबुक पृष्ठ पर पीडीएफ डाल देते हैं। वितरण व्यवस्था भी बदली है। हॉकर अब कूरियर को प्राथमिकता देता है। डाक विभाग ने रियायती दरें समाप्त कर दी हैं।

अंकीय माध्यम में हिंदी की उपस्थिति सीमित है। डब्ल्यू3टेक्स के मई 2026 के आँकड़ों के अनुसार हिंदी उन सभी जालस्थलों का 0.0% है जिनकी सामग्री भाषा ज्ञात है। शीर्ष 10 लाख जालस्थलों में यह 0.1% है। अंग्रेजी 49.7% है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ हिंदी प्रकाशनों में कम विज्ञापन देती हैं। शोध भी अंग्रेजी मीडिया पर अधिक होता है।

पाठक का समय बँटा हुआ है। भारतीय उपयोगकर्ता औसत 90 मिनट अंतर्जाल पर बिताता है। शहरी 94 मिनट, ग्रामीण 89 मिनट। लघु चलचित्र और सामाजिक माध्यम पर अधिक समय जाता है। छोटे पत्र यदि सनसनी नहीं परोसते तो दृश्यता कम रहती है, परोसें तो विश्वसनीयता का प्रश्न उठता है। सरकार ने नवंबर 2025 से मुद्रित विज्ञापन दरों में 26% वृद्धि की है। एक लाख प्रसार वाले दैनिक में श्वेत-श्याम विज्ञापन की दर 47.40 से बढ़कर 59.68 रुपये प्रति वर्ग सेंटीमीटर हो गई। पर लागत और आय का अंतर बना हुआ है।

पत्रकारिता कभी ‘वाच्’ की साधना मानी जाती थी। अब वह एक उद्योग भी है। छोटे पत्र अभी भी जमीनी मुद्दे उठाते हैं, पर पाठकों तक पहुँचना कठिन हो रहा है। पाठक अब सूचना के लिए कई माध्यम देखता है। निष्पक्ष पत्रकारिता को टिके रहना एक चुनौती है।

समाधान की दिशा में कुछ कदम संभव हैं: अति-स्थानीय समाचार पर ध्यान, समुदाय आधारित सदस्यता प्रारूप, अंकीय-प्रथम दृष्टिकोण और हिंदी में गुणवत्तापूर्ण सामग्री। पाठकों का यह समझना भी जरूरी है कि विश्वसनीय खबर के लिए संसाधन चाहिए।

समाचारपत्रों के पंजीयक के 1.44 लाख पंजीकृत प्रकाशनों में से कितने सक्रिय हैं, यह 2021 के बाद स्पष्ट नहीं है। शब्दों को बचाने के लिए आँकड़े समझने होंगे और नए रास्ते खोजने होंगे। यही आज की वास्तविकता है।

शब्दों का संग्राम: प्रमाणित आँकड़ों की कसौटी पर हिंदी पत्रकारिता का यथार्थ
डाक्टर दीपक गोस्वामी

हिंदी पत्रकारिता आज एक कठिन मोड़ पर खड़ी है। छोटे-मंझोले पत्र-पत्रिकाओं के सामने पाठकों की कमी सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। यह संकट केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है। इसे समझने के लिए हमें तथ्यों को देखना होगा। यह वही आँकड़े हैं जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं।

समाचारपत्रों के पंजीयक की रिपोर्ट ‘प्रेस इन इंडिया 2020-21’ के अनुसार 31 मार्च 2021 तक देश में कुल पंजीकृत प्रकाशन 1,44,520 थे। इनमें हिंदी के 55,349 प्रकाशन थे। पर वार्षिक विवरण केवल 32,938 प्रकाशनों ने ही दाखिल किया। यानी 1,11,582 प्रकाशनों की वर्तमान स्थिति स्पष्ट नहीं है। 2020-21 में 1,097 नए प्रकाशन पंजीकृत हुए, 60 बंद हुए। 2021 के बाद का कोई आधिकारिक आँकड़ा सार्वजनिक नहीं है।

प्रसार की बात करें तो 2020-21 में सभी भाषाओं के प्रकाशनों का कुल दावा किया गया प्रसार 38,64,82,373 प्रतियाँ था। हिंदी का हिस्सा 18,93,96,236 प्रतियाँ। भारतीय पाठक सर्वेक्षण 2019 प्रथम तिमाही बताता है कि हिंदी दैनिकों की कुल पाठक संख्या 18.6 करोड़ थी। 2017 में 17.6 करोड़ थी। औसत निर्गत पाठक संख्या 7.66 करोड़ थी। 2019 के बाद भारतीय पाठक सर्वेक्षण ने नए प्रसार आँकड़े जारी नहीं किए हैं।

पाठक का स्वरूप बदल रहा है। भारतीय इंटरनेट एवं मोबाइल संघ-केन्टर की ‘इंटरनेट इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार 2024 के अंत तक भारत में 886 मिलियन सक्रिय अंतर्जाल उपयोगकर्ता थे। ग्रामीण भारत के 488 मिलियन, शहरी के 397 मिलियन। ग्रामीण उपयोगकर्ता 55% हो गए। 2025 में यह संख्या 958 मिलियन पहुँच गई, जिनमें 57% यानी 548 मिलियन ग्रामीण हैं। भारतीय पाठक सर्वेक्षण 2019 कहता है कि देश में दैनिक समाचारपत्र पढ़ने वालों की पहुँच 39% थी। शहरी में 53%, ग्रामीण में 32%। हिंदी दैनिकों की पहुँच 17% थी। अंग्रेजी दैनिकों के कुल पाठक 3.1 करोड़ थे। आज ग्रामीण पाठक भी सूचना के लिए अंतर्जाल का उपयोग कर रहा है। पारंपरिक पुस्तकालयों में पाठकों की संख्या घटी है।

हिंदी पत्रकारिता की आर्थिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है। समाचारपत्र छपाई कागज कोविड से पहले 31-35 रुपये प्रति किलो था। कोविड में 70 रुपये से ऊपर चला गया। जुलाई 2023 तक 48-52 रुपये प्रति किलो था। आयातित कागज 400 डॉलर प्रति मीट्रिक टन था, जो बढ़कर 1,000-1,050 डॉलर तक गया। 2023-24 की तीसरी तिमाही तक 540-560 डॉलर पर आया। एक 16 पृष्ठ का समाचारपत्र छापने की लागत 3.40 रुपये से ऊपर है, पर विक्रय मूल्य अक्सर 2 रुपये रहता है।

विज्ञापन का परिदृश्य बदल गया है। डेंट्सू-ई4एम की 2026 रिपोर्ट के अनुसार 2025 के अंत तक कुल विज्ञापन 1,22,155 करोड़ रुपये का हो गया। इसमें अंकीय का हिस्सा 59% यानी 71,621 करोड़ रुपये। दूरदर्शन 21% यानी 25,964 करोड़। मुद्रित 14% यानी 16,594 करोड़ पर है। 2016 में अंकीय और पारंपरिक का अनुपात 12:88 था। अब 59:41 हो गया।

सरकारी विज्ञापन: केंद्रीय संचार ब्यूरो ने 2022-23 में 331.01 करोड़ रुपये खर्च किए। 2023-24 में 12 दिसंबर 2023 तक 967.46 करोड़ रुपये। लोकसभा में दी जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में मुद्रित विज्ञापनों पर 119.79 करोड़ रुपये 1,052 समाचारपत्रों को दिए गए। इसमें शीर्ष 10 मीडिया समूहों को 63.23 करोड़ रुपये से ज्यादा मिले। दैनिक जागरण को 9.63 करोड़, दैनिक भास्कर को 8.29 करोड़, अमर उजाला को 4.93 करोड़। शेष 1,042 समाचारपत्रों के लिए 56.56 करोड़ बचा। औसत 5.4 लाख सालाना। छोटे प्रकाशनों के लिए संपादन, मुद्रण, वितरण और कर्मचारियों का खर्च निकालना कठिन हो रहा है।

राजनीतिक दलों के पास अब अपने सूचना माध्यम हैं। उनके सूचना प्रकोष्ठ और जाल प्रसारण वाहिनी लाखों लोगों तक सीधे पहुँचते हैं। छोटे समाचारपत्रों की भूमिका सीमित हो रही है। सरकारी विज्ञापन नीति के तहत आवंटन होता है।

पाठक की अपेक्षाएँ बदली हैं। आज युवा सारांश में जानकारी चाहता है। 2000 शब्द के संपादकीय की जगह 200 शब्द का विश्लेषण। पर छोटे पत्रों के पास अंकीय टीम, आँकड़ा विश्लेषक, खोज इंजन विशेषज्ञ का अभाव है। वे अक्सर फेसबुक पृष्ठ पर पीडीएफ डाल देते हैं। वितरण व्यवस्था भी बदली है। हॉकर अब कूरियर को प्राथमिकता देता है। डाक विभाग ने रियायती दरें समाप्त कर दी हैं।

अंकीय माध्यम में हिंदी की उपस्थिति सीमित है। डब्ल्यू3टेक्स के मई 2026 के आँकड़ों के अनुसार हिंदी उन सभी जालस्थलों का 0.0% है जिनकी सामग्री भाषा ज्ञात है। शीर्ष 10 लाख जालस्थलों में यह 0.1% है। अंग्रेजी 49.7% है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ हिंदी प्रकाशनों में कम विज्ञापन देती हैं। शोध भी अंग्रेजी मीडिया पर अधिक होता है।

पाठक का समय बँटा हुआ है। भारतीय उपयोगकर्ता औसत 90 मिनट अंतर्जाल पर बिताता है। शहरी 94 मिनट, ग्रामीण 89 मिनट। लघु चलचित्र और सामाजिक माध्यम पर अधिक समय जाता है। छोटे पत्र यदि सनसनी नहीं परोसते तो दृश्यता कम रहती है, परोसें तो विश्वसनीयता का प्रश्न उठता है। सरकार ने नवंबर 2025 से मुद्रित विज्ञापन दरों में 26% वृद्धि की है। एक लाख प्रसार वाले दैनिक में श्वेत-श्याम विज्ञापन की दर 47.40 से बढ़कर 59.68 रुपये प्रति वर्ग सेंटीमीटर हो गई। पर लागत और आय का अंतर बना हुआ है।

पत्रकारिता कभी ‘वाच्’ की साधना मानी जाती थी। अब वह एक उद्योग भी है। छोटे पत्र अभी भी जमीनी मुद्दे उठाते हैं, पर पाठकों तक पहुँचना कठिन हो रहा है। पाठक अब सूचना के लिए कई माध्यम देखता है। निष्पक्ष पत्रकारिता को टिके रहना एक चुनौती है।

समाधान की दिशा में कुछ कदम संभव हैं: अति-स्थानीय समाचार पर ध्यान, समुदाय आधारित सदस्यता प्रारूप, अंकीय-प्रथम दृष्टिकोण और हिंदी में गुणवत्तापूर्ण सामग्री। पाठकों का यह समझना भी जरूरी है कि विश्वसनीय खबर के लिए संसाधन चाहिए।

समाचारपत्रों के पंजीयक के 1.44 लाख पंजीकृत प्रकाशनों में से कितने सक्रिय हैं, यह 2021 के बाद स्पष्ट नहीं है। शब्दों को बचाने के लिए आँकड़े समझने होंगे और नए रास्ते खोजने होंगे। यही आज की वास्तविकता है।

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