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अमृत उजाला > दिल्ली > द्रौपदी मुर्मू:जन्मदिन विशेष
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द्रौपदी मुर्मू:जन्मदिन विशेष

amritujala
Last updated: जून 20, 2026 4:05 अपराह्न
amritujala 23 घंटे पहले
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द्रौपदी मुर्मू:जन्मदिन विशेष
द्रौपदी मुर्मू:जन्मदिन विशेष
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विशेष लेख | जन्मदिवस पर

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की मिसाल बन जाती हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की कहानी भी ऐसी ही एक यात्रा है। यह कहानी किसी बड़े राजनीतिक परिवार, आर्थिक संपन्नता या विशेष सुविधाओं से शुरू नहीं होती, बल्कि ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव की मिट्टी से निकलती है, जहां सपने देखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था।

आज जब देश राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जन्मदिन मना रहा है, तब यह अवसर केवल शुभकामनाएं देने का नहीं, बल्कि उस जीवन-यात्रा को समझने का भी है जिसने करोड़ों भारतीयों को यह विश्वास दिया कि कठिन परिस्थितियां किसी की मंजिल तय नहीं करतीं।

एक छोटे गांव की बेटी

ओडिशा के मयूरभंज जिले का उपरबेड़ा गांव कभी देश के नक्शे पर विशेष पहचान नहीं रखता था। इसी गांव में 20 जून 1958 को द्रौपदी मुर्मू का जन्म हुआ। संथाल आदिवासी समुदाय से आने वाली द्रौपदी ने बचपन से ही संसाधनों की कमी और सामाजिक चुनौतियों को करीब से देखा।

उस दौर में ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा आसान नहीं थी। लेकिन उन्होंने पढ़ाई को अपनी ताकत बनाया। परिवार की सीमित परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने स्नातक शिक्षा पूरी की, जो उस समय उनके क्षेत्र की लड़कियों के लिए असाधारण उपलब्धि मानी जाती थी।

नौकरी से समाज सेवा तक

शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सरकारी कार्यालय में काम किया और बाद में शिक्षण कार्य से भी जुड़ीं। एक शिक्षिका के रूप में उन्होंने बच्चों के भविष्य को संवारने का प्रयास किया। यहीं से समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता और जनसेवा की भावना मजबूत हुई।

कई लोगों की तरह उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि समाज के बीच काम करने की इच्छा से किया। स्थानीय निकाय राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे राज्य स्तर तक पहुंचा।

जब जिंदगी ने सबसे कठिन परीक्षा ली

द्रौपदी मुर्मू के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों के सामने उनका साहस है।

कुछ वर्षों के भीतर उन्होंने अपने पति और दो बेटों को खो दिया। परिवार पर एक के बाद एक दुखों का पहाड़ टूटता गया। सामान्य परिस्थितियों में ऐसा आघात किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकता है। लेकिन उन्होंने अपने दर्द को ही अपनी शक्ति बना लिया।

आध्यात्मिकता, आत्मअनुशासन और सामाजिक कार्यों ने उन्हें इस कठिन दौर से बाहर निकलने की ताकत दी। यही कारण है कि आज भी जब उनके संघर्षों की चर्चा होती है, तो लोग केवल एक राष्ट्रपति नहीं बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति वाली महिला को देखते हैं।

राजनीति में बढ़ता कद

ओडिशा विधानसभा में विधायक और मंत्री के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने प्रशासनिक अनुभव हासिल किया। बाद में उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया। झारखंड की पहली महिला राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल कई संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित दृष्टिकोण के लिए याद किया जाता है।

उन्होंने संवैधानिक पद पर रहते हुए संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को महत्व दिया। यही कारण था कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी छवि एक शांत, गंभीर और जिम्मेदार नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित हुई।

इतिहास का वह दिन

साल 2022 में जब द्रौपदी मुर्मू ने भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तब वह केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं थी। यह उन लाखों लोगों की आकांक्षाओं की जीत थी जो देश के दूरदराज़ इलाकों, आदिवासी समुदायों और सीमित अवसरों वाली पृष्ठभूमि से आते हैं।

वह भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति बनीं। यह उपलब्धि भारतीय लोकतंत्र के उस स्वरूप को मजबूत करती है जिसमें प्रतिनिधित्व केवल सत्ता का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी विषय है।

राष्ट्रपति के रूप में प्राथमिकताएं

राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, जनजातीय समुदायों के विकास, पर्यावरण संरक्षण और युवाओं के कौशल विकास जैसे विषयों पर लगातार जोर दिया है।

अपने संबोधनों में वह अक्सर इस बात पर बल देती हैं कि विकास तभी सार्थक होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक अवसर पहुंचेंगे। उनकी भाषा में राजनीतिक आक्रामकता नहीं, बल्कि संवाद और संवेदनशीलता दिखाई देती है।

युवाओं के लिए संदेश

द्रौपदी मुर्मू की यात्रा भारतीय युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। सफलता हमेशा सीधी रेखा में नहीं मिलती। कई बार जीवन में ऐसे मोड़ आते हैं जब सब कुछ समाप्त होता हुआ दिखाई देता है। लेकिन वही दौर व्यक्ति की असली पहचान भी बनाता है।

उनका जीवन बताता है कि साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन संकल्प सीमित नहीं होना चाहिए।

एक प्रेरणा, जो पद से बड़ी है

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज केवल संवैधानिक प्रमुख नहीं हैं। वह उन करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का चेहरा हैं जो मानते हैं कि संघर्ष और ईमानदारी का रास्ता भले लंबा हो, लेकिन मंजिल तक पहुंचाता जरूर है।

उनके जन्मदिन पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि द्रौपदी मुर्मू की कहानी भारत के लोकतंत्र की सबसे प्रेरक कहानियों में से एक है। यह कहानी बताती है कि इतिहास केवल बड़े शहरों और प्रभावशाली परिवारों में नहीं बनता, बल्कि कभी-कभी किसी छोटे से गांव की एक साधारण लड़की भी राष्ट्र के सर्वोच्च पद तक पहुंचकर पूरे देश को नई प्रेरणा दे सकती है।

Ankit Awasthi

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