जीवन का सबसे बड़ा सत्य किसी किताब के पन्नों में नहीं, बल्कि उस क्षण में छिपा होता है जब इंसान गिरता है। जमीन पर गिरना केवल शरीर का गिरना नहीं होता, कई बार यह अहंकार, भ्रम और आत्मविश्वास के टूटने का भी क्षण होता है। हर व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी गिरता है। कोई नौकरी में असफल होता है, कोई रिश्तों में चोट खाता है, किसी का भरोसा टूटता है तो किसी के सपने बिखर जाते हैं। लेकिन गिरना जीवन की हार नहीं है। असली हार तब होती है, जब इंसान गिरने के बाद दोबारा उठने की कोशिश छोड़ देता है।
पीछे मुड़कर देखें तो अक्सर महसूस होता है कि जिन लोगों या परिस्थितियों ने हमें सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई, उन्होंने ही हमें जीवन के कुछ जरूरी सबक भी सिखाए। कभी किसी शिक्षक के कठोर शब्द आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं, तो वही चोट भीतर कुछ कर दिखाने का संकल्प पैदा कर देती है। कभी किसी अधिकारी की बेरुखी या किसी अवसर का छिन जाना हमें अपनी क्षमता पर भरोसा करना सिखाता है। नौकरी चली जाती है तो नया हुनर तलाशने की जरूरत महसूस होती है और जब एक रास्ता बंद होता है, तब कई बार नए रास्ते दिखाई देने लगते हैं। उस समय लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन कुछ साल बाद वही घटना जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ नजर आती है।
रिश्तों और समाज से मिलने वाली चोटें भी इंसान को बहुत कुछ सिखाती हैं। किसी मित्र, रिश्तेदार या पड़ोसी का यह कहना कि ‘तुम्हारे बस का नहीं’ उस वक्त बेहद बुरा लग सकता है, लेकिन कई बार वही बात मेहनत की वजह बन जाती है। इंसान जवाब शब्दों से नहीं, अपने काम से देना सीखता है। इसी तरह कर्ज हमें पैसे की कीमत समझाता है, पारिवारिक विवाद संयम सिखाते हैं और बीमारी यह एहसास कराती है कि स्वस्थ शरीर से बड़ी कोई संपत्ति नहीं। विरोध करने वाले लोग भी हमारी कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनकी हर बात सही नहीं होती, लेकिन हर आलोचना को नजरअंदाज कर देना भी समझदारी नहीं। कई बार विरोधी वही आईना दिखा देता है, जिसे करीबी लोग अनजाने में छिपा देते हैं।
जीवन की मुश्किल परिस्थितियां हमें खुद से भी परिचित कराती हैं। संकट पूछता है कि हमारे भीतर कितना धैर्य है, असफलता पूछती है कि हम कितनी बार दोबारा प्रयास कर सकते हैं और अपमान यह सवाल छोड़ जाता है कि हमारा आत्मसम्मान दूसरों के शब्दों पर निर्भर है या अपने चरित्र पर। वहीं सफलता यह परीक्षा लेती है कि उपलब्धियां मिलने के बाद भी हम कितने विनम्र रह सकते हैं। मनुष्य अक्सर अपनी ताकत को धन, पद और प्रतिष्ठा में तलाशता है, जबकि असली ताकत उस व्यक्ति में होती है जो टूटने के बाद भी खुद से कह सके कि अभी सब खत्म नहीं हुआ है। परिवार और अपने लोगों का साथ भी ऐसे समय में बड़ी ताकत बनता है। मां की आंखों में उम्मीद, पिता की खामोशी, जीवनसाथी का साथ और बच्चों का अपने माता-पिता के प्रयास पर भरोसा इंसान को फिर खड़े होने की वजह देता है।
इसलिए जीवन में आने वाले हर व्यक्ति को अपना गुरु मानना जरूरी नहीं, लेकिन हर अनुभव से कुछ सीखना जरूरी है। अगली बार जब कोई आपको गिराए तो तुरंत बदला लेने के बारे में सोचने के बजाय खुद से पूछिए कि इस घटना ने आपको क्या सिखाया। अगर किसी ने आपकी कमजोरी दिखाई है तो उसे अपनी ताकत बनाइए, गलती बताई है तो उसे सुधारिए, रास्ता रोका है तो नया रास्ता तलाशिए और अगर किसी ने आपको अस्वीकार किया है तो खुद को स्वीकार करना सीखिए। दुनिया में गिराने वाले हमेशा मिलेंगे—कभी लोग, कभी परिस्थितियां और कभी हमारी अपनी गलतियां। लेकिन गिरने के बाद उठना या वहीं पड़े रहना, यह फैसला हमेशा हमारा होता है।
जीवन की सबसे बड़ी जीत यह नहीं है कि हमें कभी गिरना न पड़े। असली जीत तो तब है, जब हर गिरावट के बाद हम पहले से ज्यादा समझदार, धैर्यवान और मजबूत होकर उठें। जिसने गिरना समझ लिया, उसने जीवन को समझना शुरू कर दिया। जिसने गिरकर उठना सीख लिया, उसने संघर्ष को साधना सीख लिया। और जिसने अपने गिराने वालों से भी सीखना सीख लिया, उसे दुनिया गिरा तो सकती है, लेकिन हरा नहीं सकती।
लेखक: डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत
राष्ट्रीय चिंतक | प्रख्यात लेखक | प्रेरक वक्ता | प्रशिक्षक | सामाजिक दार्शनिक





















