चंदौली में धान की फसल पर आभासी कंडुआ रोग का खतरा मंडरा रहा है। फफूंद से होने वाला यह रोग शुरुआत में आसानी से दिखाई नहीं देता, लेकिन धान की बालियां निकलने पर इसकी पहचान होने लगती है। प्रभावित बालियों में दानों की जगह पीले या काले रंग का पाउडर दिखाई देता है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी विनोद कुमार यादव ने किसानों को समय रहते जरूरी सावधानियां बरतने और फसल की नियमित निगरानी करने की सलाह दी है।
विनोद कुमार यादव के अनुसार, फूल आने की अवस्था में वातावरण में 90 प्रतिशत से अधिक आर्द्रता और 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान होने पर रोग फैलने की आशंका बढ़ जाती है। बचाव के लिए किसानों को गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 10 ग्राम स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस या ट्राइकोडर्मा से उपचारित करने की सलाह दी गई है, ताकि रोग के प्रकोप को कम किया जा सके।
बिचड़ों का उपचार और संतुलित उर्वरक का इस्तेमाल जरूरी
कृषि रक्षा अधिकारी ने बताया कि एक हेक्टेयर क्षेत्र में रोपाई के लिए तैयार बिचड़ों को 100 लीटर पानी में 2.5 किलोग्राम स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस या ट्राइकोडर्मा मिलाकर 30 मिनट तक उपचारित करने के बाद रोपाई करनी चाहिए। इसके साथ ही किसानों को उर्वरकों का जरूरत के मुताबिक संतुलित इस्तेमाल करने और फसल चक्र अपनाने की सलाह दी गई है। कृषि विभाग के मुताबिक, शुरुआती स्तर पर सावधानी बरतने से रोग के प्रकोप को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
बाली निकलते समय दवा के छिड़काव की सलाह
धान की बालियां निकलने की अवस्था में रोग नियंत्रण के लिए विभाग ने प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी अथवा पिकॉक्सीस्ट्रोबिन 7.05 प्रतिशत और प्रोपिकोनाजोल 11.7 प्रतिशत एससी की एक लीटर मात्रा या थिफ्लुजामाइड 15 प्रतिशत और डाइफेनोकोनाजोल 20 प्रतिशत एससी की 250 मिलीलीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर फसल पर छिड़काव करने की सलाह दी है। किसानों से अपील की गई है कि दवा का इस्तेमाल करने से पहले उत्पाद के लेबल और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार मात्रा व सावधानियों की पुष्टि कर लें, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके।





















