भारत की औद्योगिक ताकत और तकनीकी आत्मनिर्भरता का भविष्य अब केवल खनिज संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर नहीं है, बल्कि इस बात पर भी टिका है कि देशउन खनिजों का प्रसंस्करण और उपयोग करने में कितना सक्षम है। लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट, गैलियम, जर्मेनियम और दुर्लभ मृदा तत्व जैसे महत्वपूर्ण खनिज इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, सौर ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र के लिए बेहद अहम हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आकलनों के मुताबिक, इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला कुछ चुनिंदा देशों में केंद्रित है। ऐसे में भारत के सामने सवाल सिर्फ खदानें खोजने का नहीं, बल्कि खनिजों की पूरी मूल्य-श्रृंखला पर अपनी क्षमता विकसित करने का है।
भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे कई महत्वपूर्ण खनिजों के लिए आयात पर निर्भर है। वहीं, देश में प्राकृतिक ग्रेफाइट संसाधन होने के बावजूद बैटरी-ग्रेड ग्रेफाइट के प्रसंस्करण और आपूर्ति में चीन की मजबूत स्थिति चुनौती बनी हुई है। जम्मू-कश्मीर के रियासी में 2023 में 5.9 मिलियन टन लिथियम अयस्क संसाधन का अनुमान सामने आया था, लेकिन इसे शुद्ध लिथियम का भंडार मानना सही नहीं होगा। किसी खनिज की खोज के बाद उसके वास्तविक संसाधन, आर्थिक व्यवहार्यता, खनन और औद्योगिक उपयोग तक पहुंचने में कई चरण पूरे करने पड़ते हैं। यही वजह है कि भारत को खनन के साथ-साथ परिशोधन, रासायनिक प्रसंस्करण और उच्च-मूल्य वाले उत्पादों के निर्माण पर भी ध्यान देना होगा।
सरकार ने इस दिशा में राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन शुरू किया है, जिसके तहत अन्वेषण, घरेलू खनन, विदेशों में खनिज संपत्तियों तक पहुंच, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। खानिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (काबिल) ने अर्जेंटीना के कैटामार्का प्रांत में लिथियम संसाधनों के अन्वेषण और विकास के लिए समझौता किया है। इसके अलावा, पुराने मोबाइल फोन, लैपटॉप, ई-कचरे और इस्तेमाल की जा चुकी लिथियम-आयन बैटरियों से महत्वपूर्ण खनिजों को दोबारा प्राप्त करना भी रणनीति का अहम हिस्सा है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने और देश में नई औद्योगिक क्षमता विकसित करने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, इन पहलों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब संसाधनों को सुरक्षित आपूर्ति, प्रभावी प्रसंस्करण और विश्वस्तरीय विनिर्माण से जोड़ा जाएगा।
भारत को महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए अन्वेषण, विदेशी साझेदारी, परिशोधन, पुनर्चक्रण और तकनीकी अनुसंधान को एक साथ मजबूत करना होगा। इसके लिए निजी निवेश को प्रोत्साहन, समयबद्ध अनुमति प्रक्रिया, कुशल मानव संसाधन और प्रयोगशालाओं में नई तकनीकों के विकास की जरूरत है। साथ ही, खनन के दौरान पर्यावरण, जल, वन और स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा करना भी जरूरी है। वास्तविक आत्मनिर्भरता केवल खनिज निकालने या विदेश से कच्चा माल खरीदने से हासिल नहीं होगी। भारत को ऐसी क्षमता विकसित करनी होगी, जिससे वह महत्वपूर्ण खनिजों को शुद्ध कर सके, उनका पुनर्चक्रण कर सके और उनसे बैटरी, सेमीकंडक्टर, चुंबक तथा अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पाद बना सके। डॉ. दीपक गोस्वामी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं समसामयिक विश्लेषक, मथुरा के विचारों का केंद्रीय संदेश यही है कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल खदानों पर कब्जे की नहीं, बल्कि पूरी औद्योगिक मूल्य-श्रृंखला पर नियंत्रण की होगी।





















