प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में ग्राम सभा और सार्वजनिक उपयोग की जमीनों पर अवैध कब्जे के मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जनहित याचिका संख्या 2923/2025 पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने 6 अक्टूबर 2025 को पारित किया था।
प्रधान और लेखपाल को 60 दिन में देनी होगी सूचना
अदालत के निर्देशों के मुताबिक, ग्राम सभा की जमीन पर अवैध कब्जे की जानकारी मिलने पर ग्राम प्रधान और लेखपाल को निर्धारित प्रक्रिया के तहत 60 दिनों के भीतर संबंधित तहसीलदार या तहसीलदार (न्यायिक) को सूचना देनी होगी। अदालत ने सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा में लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए कहा कि जिम्मेदार पदाधिकारियों के खिलाफ परिस्थितियों और कानून के अनुसार विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।
90 दिन में पूरी करनी होगी अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 के तहत जारी कारण बताओ नोटिस के बाद अतिक्रमण संबंधी कार्यवाही 90 दिनों के भीतर पूरी की जाए। प्रक्रिया पूरी होने का मतलब केवल आदेश पारित करना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार वास्तविक कब्जा हटाकर सार्वजनिक भूमि को उसके मूल उपयोग के लिए बहाल करना भी है। प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर देने और पूरी कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत करने पर भी जोर दिया गया है।
लापरवाही पर BNS की धारा 316 के तहत कार्रवाई संभव
अदालत ने सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा में जिम्मेदार पदाधिकारियों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि कानून के तहत आवश्यक सूचना देने या कार्रवाई करने में विफलता पर संबंधित लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 के तहत आपराधिक विश्वासघात से जुड़ी कार्यवाही सहित अन्य वैधानिक कदम उठाए जा सकते हैं। तहसीलदार द्वारा बिना पर्याप्त कारण निर्धारित समय में कार्यवाही पूरी नहीं करने पर विभागीय कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं। अतिक्रमण हटाने में पुलिस को राजस्व अधिकारियों की सहायता करने और आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना की कार्यवाही की संभावना का भी उल्लेख किया गया है।





















