8 नवंबर को सुबह 10:50 बजे से शुरू होगा मुहूर्त; जानिए लक्ष्मी पूजन का शुभ समय
वाराणसी। इस बार दिवाली को लेकर तीन साल बाद देशभर में तिथि का विवाद नहीं रहेगा। पंचांगों की गणना के अनुसार आठ नवंबर को अमावस्या पूरे दिन और रात में रहेगी। इसी वजह से उत्तर से दक्षिण तक एक ही दिन दिवाली मनाने पर सहमति बनी है।
काशी विद्वत परिषद और बीएचयू के ज्योतिष विभाग की ओर से पिछले तीन वर्षों में देशभर के 100 से अधिक पंचांगों का अध्ययन किया गया। पंचांगों में एकरूपता लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन भी आयोजित किया गया। इसके बाद 2026-27 के पंचांगों में एक तिथि और एक पर्व की धारणा को बढ़ावा मिला है।
इस बार क्यों नहीं होगा तिथि को लेकर भ्रम
बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष और पंचांग एकरूपता अभियान के समन्वयक रहे प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार, इस बार ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति ऐसी है कि दिवाली की तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति नहीं बनेगी।
उनके अनुसार, पिछले वर्षों में अमावस्या कई बार सूर्यास्त के आसपास शुरू होकर अगले दिन सूर्यास्त तक रहती थी। इसके चलते अलग-अलग पंचांगों और शास्त्रीय व्याख्याओं के आधार पर दिवाली की तिथि को लेकर मतभेद सामने आते थे। इस बार अमावस्या की स्थिति स्पष्ट है।
8 नवंबर को सुबह 10:50 बजे से दिवाली का मुहूर्त
श्री काशी विश्वनाथ न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय के अनुसार, आठ नवंबर की सुबह 10:50 बजे अमावस्या शुरू हो जाएगी। इसके साथ ही दिवाली का मुहूर्त प्रारंभ माना जाएगा। इससे पहले हनुमान जयंती मनाई जाएगी।
आठ नवंबर की रात 12 बजे तक दिवाली मनाने के लिए करीब 13 घंटे 10 मिनट का समय रहेगा। यानी इस बार दिवाली के लिए पूरे दिन पर्याप्त मुहूर्त उपलब्ध रहेगा।
सूर्यास्त के बाद 2 घंटे 24 मिनट प्रदोष काल
दिवाली के दिन सूर्यास्त के बाद दो घंटे 24 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा। इसी अवधि में मां लक्ष्मी की पूजा और दीप प्रज्ज्वलन का विशेष महत्व बताया गया है। लक्ष्मी पूजन के लिए प्रदोष काल को सबसे शुभ समय माना गया है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, दिवाली पर व्रत रखकर लक्ष्मी पूजन करना लाभकारी माना जाता है। प्रदोष काल में भोजन किया जा सकता है।
पितरों के लिए भी महत्वपूर्ण है अमावस्या
आठ नवंबर की अमावस्या पितरों की पूजा और श्राद्ध के लिए भी महत्वपूर्ण रहेगी। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस दिन दीपक हाथ में लेकर दक्षिण दिशा की ओर पितरों को दीप दिखाने की परंपरा है।
पंचांग एकरूपता अभियान से जुड़े डॉ. सुभाष पांडेय के अनुसार, शुद्ध पंचांग गणना में तिथि को लेकर भ्रम नहीं होता। इसके लिए गणना और आकलन का सटीक होना जरूरी है। इस बार प्राकृतिक रूप से भी ऐसी कोई स्थिति नहीं बनी है, जिससे दिवाली की तिथि को लेकर मतभेद पैदा हो।





















