प्रयागराज: नाबालिग बच्चों की कस्टडी को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पिता कानून के मुताबिक अपनी नाबालिग बेटी के प्राकृतिक अभिभावक हैं और उन्हें अभिभावक की जिम्मेदारी निभाने के लिए अयोग्य साबित नहीं किया गया है, तो केवल आशंकाओं के आधार पर उन्हें बेटी की कस्टडी से वंचित नहीं किया जा सकता। मामले की सुनवाई जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की डिवीजन बेंच ने की। कोर्ट ने प्रयागराज के अधिवक्ता अभिषेक यादव की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बदल दिया, जिसमें उनकी नाबालिग बेटी की कस्टडी देने से इनकार किया गया था।
हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट की धारा 6 का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने कहा कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत पिता को नाबालिग बेटी का प्राकृतिक अभिभावक माना जाता है। ऐसे में कस्टडी से इनकार करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि पिता बच्चे की देखभाल और अभिभावक की भूमिका निभाने के योग्य नहीं हैं। अदालत ने यह भी माना कि बच्चे के हित और उसके भविष्य की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए कस्टडी का फैसला केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि बच्चा लंबे समय से किसी अन्य रिश्तेदार के साथ रह रहा है।
2019 में हुई थी शादी, 2022 में बेटी का जन्म
अदालत के सामने रखे गए मामले के मुताबिक, अधिवक्ता अभिषेक यादव की शादी वर्ष 2019 में हुई थी। दंपति के यहां 2022 में एक बेटी का जन्म हुआ। इसके अगले साल यानी 2023 में अभिषेक की पत्नी के भाई बच्ची को उसके मायके ले गए। इसके बाद वर्ष 2024 में अभिषेक की पत्नी की मृत्यु हो गई। पत्नी की मौत के बाद उसके पिता और तीन भाइयों ने बच्ची को अभिषेक की कस्टडी में देने से इनकार कर दिया। बेटी को वापस पाने के लिए अभिषेक ने पहले ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में अपील दाखिल की।
ससुराल पक्ष ने लगाए थे गंभीर आरोप
मामले में प्रतिवादियों की ओर से अभिषेक पर कई आरोप लगाए गए। उनका कहना था कि उन्होंने दहेज को लेकर अपनी पत्नी को परेशान किया और उसके साथ मारपीट भी की थी। इसके अलावा उन्होंने अदालत के सामने यह भी दलील दी कि बच्ची बहुत छोटी उम्र से ही अपने नाना के पास रह रही है। प्रतिवादियों ने यह आशंका भी जताई कि अभिषेक भविष्य में दूसरी शादी कर सकते हैं और ऐसी स्थिति में बच्ची की उचित देखभाल प्रभावित हो सकती है।
बच्ची नाना और मौसी के यहां रह रही थी
हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर गौर करते हुए पाया कि बच्ची लगातार केवल नाना के पास नहीं रह रही थी, बल्कि वह अपने नाना और मौसी के बीच रह रही थी। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि मौसी के पहले से ही पांच बच्चे हैं। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि प्रतिवादी पक्ष बच्ची की पूरी और व्यक्तिगत देखभाल कर रहा था। कोर्ट ने माना कि पिता और उनके परिवार के साथ रहने की नई स्थिति में बच्ची को शुरुआत में कुछ परेशानी हो सकती है। लेकिन सिर्फ इस संभावित कठिनाई के आधार पर उसे ऐसे वातावरण में रखना उचित नहीं होगा, जहां उसके भविष्य की स्थिरता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हों।
एक महीने में पिता को सौंपनी होगी कस्टडी
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने अभिषेक यादव की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे एक महीने के भीतर नाबालिग बच्ची की कस्टडी उसके पिता अभिषेक यादव को सौंप दें। अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि बच्चे के भविष्य और उसके कल्याण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल संभावित परिस्थितियों या आशंकाओं के आधार पर प्राकृतिक अभिभावक को बच्चे की कस्टडी से अलग नहीं किया जा सकता, जब तक उसकी अभिभावक के रूप में अयोग्यता साबित न हो।






















