बलरामपुर। कृषि विभाग में कथित भ्रष्टाचार का एक बड़ा मामला सामने आया है। उर्वरक विक्रेताओं से स्टॉक एवं वितरण रजिस्टर के सत्यापन के नाम पर अवैध धन उगाही करने के आरोप में जिला कृषि कार्यालय में तैनात वरिष्ठ सहायक राघवेन्द्र पटेल को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी के पास से 99,800 रुपये नकद और संबंधित अभिलेख बरामद किए गए हैं। इस कार्रवाई ने कृषि विभाग में लंबे समय से चल रही कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के नेटवर्क पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिला कृषि अधिकारी की शिकायत पर हुई कार्रवाई
मामले का खुलासा तब हुआ जब जिला कृषि अधिकारी अमित कुमार ने कोतवाली देहात में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उर्वरक शाखा का कार्य देख रहे वरिष्ठ सहायक रजिस्टर प्रमाणित करने, लाइसेंस संबंधी कार्यों को आगे बढ़ाने और विभागीय अनुमोदन दिलाने के नाम पर उर्वरक विक्रेताओं से धन वसूल रहे थे।
शिकायत मिलने के बाद जब विभागीय स्तर पर प्रारंभिक जांच की गई तो कई महत्वपूर्ण अभिलेख और रजिस्टर कार्यालय में उपलब्ध नहीं मिले। इससे पूरे मामले की गंभीरता बढ़ गई और पुलिस जांच शुरू की गई।
दो हजार से पांच हजार रुपये तक की होती थी वसूली
पुलिस पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह उर्वरक विक्रेताओं और लाइसेंस धारकों से कार्य शीघ्र कराने के बदले दो हजार से पांच हजार रुपये तक लेता था। जांच में यह भी सामने आया कि उसकी तैनाती के दौरान लगभग 65 उर्वरक विक्रेताओं को स्टॉक विक्रय रजिस्टर जारी किए गए थे।
पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि यह धन उगाही केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित थी या फिर इसके पीछे कोई संगठित तंत्र भी सक्रिय था।
किसानों तक पड़ सकता है सीधा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरक वितरण व्यवस्था में होने वाला भ्रष्टाचार केवल सरकारी राजस्व को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव किसानों पर पड़ता है। यदि लाइसेंस, रजिस्टर सत्यापन और निरीक्षण प्रक्रियाएं पारदर्शी न हों तो नकली उर्वरकों, कालाबाजारी और आपूर्ति में गड़बड़ियों की आशंका बढ़ जाती है।
कृषि क्षेत्र में कार्यरत जानकारों के अनुसार उर्वरक विक्रेताओं पर अनावश्यक आर्थिक दबाव अंततः किसानों तक पहुंचता है, क्योंकि कई बार यह अतिरिक्त लागत अप्रत्यक्ष रूप से कृषि उत्पादों और उर्वरकों की कीमतों में जुड़ जाती है।
पहले भी उठते रहे हैं सवाल
उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर कृषि विभाग और उर्वरक वितरण प्रणाली में अनियमितताओं के मामले सामने आते रहे हैं। बीते वर्षों में नकली खाद की बिक्री, लाइसेंस नवीनीकरण में कथित रिश्वतखोरी, निरीक्षण के नाम पर वसूली और सब्सिडी से जुड़े घोटालों को लेकर कई जिलों में जांच हो चुकी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि क्षेत्र में डिजिटल निगरानी, ऑनलाइन लाइसेंसिंग और रजिस्टरों के डिजिटलीकरण से ऐसी अनियमितताओं पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा
पुलिस अधीक्षक विकास कुमार के निर्देश पर गठित टीम ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर न्यायालय भेज दिया गया है।
जांच के दायरे में आ सकते हैं अन्य लोग
सूत्रों के अनुसार पुलिस और विभागीय जांच एजेंसियां अब यह भी पड़ताल कर रही हैं कि अवैध वसूली से जुड़े इस मामले में कोई अन्य कर्मचारी, अधिकारी या बाहरी व्यक्ति शामिल तो नहीं था। बरामद अभिलेखों और वित्तीय लेन-देन के आधार पर जांच का दायरा बढ़ सकता है।
कृषि प्रधान जिले बलरामपुर में सामने आया यह मामला सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करता है। किसानों के हितों से सीधे जुड़े विभागों में यदि भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होती हैं, तो इसका प्रभाव केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रहता बल्कि खेती-किसानी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। ऐसे में इस मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह अकेले एक कर्मचारी की करतूत थी या फिर किसी बड़े तंत्र का हिस्सा।






