क्या है पीस बॉन्ड, जिसके उल्लंघन के आरोप में मिली 5 दिन की न्यायिक हिरासत?
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पुलिस ने 13 अक्टूबर को दोनों को हिरासत में लिया। इसके बाद स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। दोनों पर पहले भरे गए 50 हजार रुपये के पीस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप है।
इस मामले ने एक बार फिर पीस बॉन्ड यानी शांति बनाए रखने के लिए भरे जाने वाले मुचलके को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर यह मुचलका क्या होता है? क्या इसे भरने के बाद विरोध-प्रदर्शन करने पर रोक लग जाती है? और इसकी शर्तों के कथित उल्लंघन पर जेल क्यों भेजा जा सकता है?
क्या है पीस बॉन्ड?
पीस बॉन्ड को सामान्य भाषा में शांति बनाए रखने का मुचलका कहा जाता है। यह एक कानूनी व्यवस्था है, जिसके तहत सक्षम मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से निर्धारित अवधि तक शांति बनाए रखने और शांति भंग करने से बचने के लिए बांड भरने को कह सकता है।
इसका उद्देश्य संभावित विवाद या हिंसा को रोकना और सार्वजनिक शांति बनाए रखना है। मुचलके में निर्धारित राशि और शर्तें हो सकती हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति को हर परिस्थिति में विरोध-प्रदर्शन करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। प्रतिबंध का दायरा संबंधित आदेश, मुचलके की शर्तों और लागू कानून पर निर्भर करता है।
CJP नेताओं के मामले में क्या हुआ?
मामले की शुरुआत 10 अक्टूबर को हुए विरोध-प्रदर्शन से हुई थी। इस दौरान CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया था। अगले दिन तीनों को रिहा कर दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, रिहाई के समय उनसे 50 हजार रुपये का बॉन्ड भरवाया गया था। इसकी शर्तों में एक साल तक शांति भंग करने वाली गतिविधियों से दूर रहने की बात शामिल थी।
इसके बाद 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों के निर्धारित स्थलों की सूची से हटाए जाने की जानकारी सामने आई। अगले दिन सौरव दास, आशुतोष रांका और CJP कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे बैरिकेड पार करके जंतर-मंतर के प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुंच गए और वहां तिरंगा लहराया।
पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया। सौरव दास और आशुतोष रांका पर पहले भरे गए बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया। इसके बाद दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
क्या पीस बॉन्ड भरने के बाद प्रदर्शन नहीं कर सकते?
नहीं, पीस बॉन्ड भरने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार समाप्त हो जाता है। संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है, हालांकि यह अधिकार कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
यदि किसी प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान, पुलिस की वैध शर्तों या किसी सक्षम प्राधिकारी के आदेश का उल्लंघन होता है, तो परिस्थितियों के अनुसार कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी तरह, यदि कोई व्यक्ति वास्तव में मुचलके की वैध शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
इसलिए किसी मामले में केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पीस बॉन्ड टूट गया। इसके लिए मुचलके की वास्तविक शर्तें, संबंधित आदेश और कथित उल्लंघन के तथ्य देखना जरूरी है।
मुचलके की शर्त तोड़ने पर क्या कहता है कानून?
शांति बनाए रखने के लिए बांड और उसके उल्लंघन से जुड़ी प्रक्रिया आपराधिक प्रक्रिया कानून के तहत निर्धारित होती है। वर्तमान कानूनी ढांचे में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के प्रावधान प्रासंगिक हो सकते हैं। कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि मुचलका किस कानूनी प्रावधान के तहत लिया गया था और उल्लंघन किस तरह का बताया गया है।
मुचलके की शर्त टूटने का आरोप लगने मात्र से किसी व्यक्ति को स्वतः दोषी नहीं माना जाता। संबंधित प्राधिकारी को लागू कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मामले पर विचार करना होता है। न्यायिक हिरासत में भेजे जाने का अर्थ भी दोषसिद्धि नहीं है।
CJP नेताओं की हिरासत पर क्यों उठ रहे सवाल?
इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि 50 हजार रुपये के मुचलके में वास्तव में क्या शर्तें थीं और क्या जंतर-मंतर पर प्रदर्शन उन शर्तों का उल्लंघन माना गया। इसके साथ ही प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश, बैरिकेड पार करने और प्रदर्शन स्थल से संबंधित आदेशों की कानूनी स्थिति भी महत्वपूर्ण है।
इन सवालों का स्पष्ट उत्तर मुचलके की प्रति, संबंधित प्रशासनिक आदेश और अदालत के हिरासत संबंधी आदेश के अध्ययन से ही मिल सकता है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर सौरव दास और आशुतोष रांका पर शर्तों के उल्लंघन का आरोप है, लेकिन इसे अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।





















