नायक कौन है? क्या वह जो पर्दे पर अन्याय के विरुद्ध मुट्ठी तान दे, वह जो संवाद बोलते ही सभागार में तालियां बटोर ले, या वह जो तालियां थमने के बाद उसी समाज के बीच पहुंच जाए, जिसके लिए पर्दे पर लड़ने का अभिनय किया था? इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए नाना पाटेकर का नाम सामने आता है। उन्हें केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व के एक बड़े हिस्से को अनदेखा करना होगा। अभिनय उनका व्यवसाय है, लेकिन किसानों और ग्रामीण समाज के सवालों से जुड़ना उनके सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है।
‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में नाना पाटेकर ने ऐसे किरदार निभाए, जिनमें आक्रोश, संघर्ष, व्यवस्था से टकराव और मनुष्य की बेचैनी दिखाई देती है। उनका अभिनय दर्शक को केवल मनोरंजन नहीं देता, बल्कि कई बार भीतर एक असहज सवाल भी छोड़ जाता है कि आखिर समाज ऐसा क्यों है? लेकिन उनकी कहानी का एक दूसरा पक्ष तब सामने आता है, जब कैमरा बंद हो जाता है। महाराष्ट्र में किसानों की बदहाली, सूखा, कर्ज और आत्महत्या की घटनाओं के बीच नाना पाटेकर और अभिनेता मकरंद अनासपुरे ने किसानों और ग्रामीण समाज की सहायता के लिए ‘नाम फाउंडेशन’ के माध्यम से काम को संगठित रूप दिया।
यहां महत्वपूर्ण बात केवल आर्थिक सहायता नहीं है। किसान की समस्या को यदि सिर्फ उसके खाली हाथ की समस्या मान लिया जाए तो समाधान भी क्षणिक होगा। खेत में पानी नहीं है, उत्पादन टिकाऊ नहीं है, परिवार संकट में है और गांव की सामुदायिक व्यवस्था कमजोर है तो समस्या व्यक्ति से कहीं बड़ी हो जाती है। इसी सोच के तहत जल-संरक्षण, ग्रामीण विकास, सामुदायिक भागीदारी और संकटग्रस्त परिवारों की सहायता जैसे प्रयास अधिक स्थायी महत्व रखते हैं। ‘नाम फाउंडेशन’ के कार्यों में जल-संरक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की भागीदारी से विकास के प्रयास भी शामिल रहे हैं। इसका मूल विचार यही है कि गांव को केवल सहायता का पात्र नहीं, बल्कि समाधान का सहभागी बनाया जाए।
यहीं से ‘अंतिम जन’ का प्रश्न जन्म लेता है। अंतिम जन वह है जो व्यवस्था की कतार में सबसे पीछे खड़ा है। जिसकी फसल खराब होती है तो घर का चूल्हा बुझने लगता है, जिसकी बेटी की पढ़ाई रुक जाती है तो अगली पीढ़ी का अवसर छिन जाता है और जिसकी बीमारी इलाज के बजाय कर्ज बन जाती है। ऐसे व्यक्ति के लिए सहायता केवल दया नहीं होनी चाहिए। उसे सम्मान, अवसर, संसाधन और अपने पैरों पर खड़े होने की शक्ति चाहिए। किसान के खेत में पानी पहुंचाना इसलिए केवल एक किसान की मदद नहीं है। पानी खेत में आता है तो परिवार का भविष्य भी सिंचित होता है, फसल के साथ उम्मीद उगती है और बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के आत्मविश्वास तक कई चीजें बचती हैं।
नाना पाटेकर की सामाजिक सक्रियता को इसी दृष्टि से समझना जरूरी है। उन्होंने किसानों की पीड़ा को केवल आंकड़ों तक सीमित रहने देने के बजाय उनकी कठिनाइयों पर सार्वजनिक रूप से बोलने और समाज से सहयोग का आह्वान करने का प्रयास किया। प्रसिद्ध व्यक्ति जब किसी अनदेखे वर्ग की समस्या को सार्वजनिक चर्चा में लाता है तो उसकी लोकप्रियता सामाजिक प्रश्न के लिए एक माध्यम बन सकती है। लेकिन प्रसिद्धि अपने आप में सेवा नहीं है। असली कसौटी यह है कि कैमरे के सामने दिखाई देने वाले काम और कैमरे के पीछे होने वाले श्रम में कितना अंतर है।
किसी किसान के साथ तस्वीर खिंचवाना आसान है, उसके संकट को समझना कठिन है। गांव में जाकर भाषण देना आसान है, गांव की वास्तविक समस्या के समाधान में समय लगाना कठिन है। गरीबी पर भावुक होना आसान है, लेकिन किसी गरीब परिवार को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार काम करना कठिन है। यही अंतर रील और वास्तविक जीवन के बीच की दूरी बताता है। नाना पाटेकर की बेबाकी भी उनके व्यक्तित्व का एक उल्लेखनीय पक्ष रही है। कई बार उनकी भाषा कठोर होती है, लेकिन सामाजिक प्रश्नों पर स्पष्ट बोलने की उनकी शैली लोगों को सोचने के लिए मजबूर करती है। सच हमेशा मधुर नहीं होता। कभी-कभी समाज को प्रशंसा से अधिक आईना चाहिए।
नाना का महत्व इस बात में भी देखा जा सकता है कि उन्होंने प्रसिद्धि को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में देखने के बजाय सामाजिक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया। किसान, गांव, जल और संकटग्रस्त परिवार उस भारत की तस्वीर हैं, जो महानगरों की चमक के पीछे अक्सर दिखाई नहीं देता। भारत की वास्तविक शक्ति केवल बड़े शहरों में नहीं है। वह उस खेत में भी है, जहां किसान सूरज से पहले उठता है। वह उस कुएं में है, जिसका पानी गर्मी में सूख जाता है। वह उस मां की आंखों में है, जो अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए खेत और घर दोनों संभालती है। वह उस ग्रामीण बच्चे में है, जिसके सपने बड़े हैं लेकिन साधन छोटे हैं।
इसलिए नायक की परिभाषा बदलने की जरूरत है। नायक वह नहीं जो केवल पर्दे पर हजारों लोगों को प्रेरित करे। नायक वह भी है जो वास्तविक जीवन में किसी एक टूटे हुए परिवार को फिर से खड़े होने का साहस दे। नायक वह नहीं जो केवल व्यवस्था के विरुद्ध संवाद बोले, बल्कि वह भी है जो व्यवस्था की कमियों के बीच समाधान की छोटी-सी शुरुआत करे। नायक वह नहीं जो गरीब की भूमिका निभाए, बल्कि वह है जो गरीब मनुष्य के सम्मान को अपना प्रश्न बनाए।
नाना पाटेकर की यात्रा हमें यही सवाल सौंपती है—क्या हमारी प्रसिद्धि केवल हमारे लिए है, या उसका कोई हिस्सा उस समाज के लिए भी है, जिसने हमें प्रसिद्ध बनाया? यदि इस प्रश्न का उत्तर समाज की ओर जाता है, तभी लोकप्रियता सार्थक होती है। पर्दा गिरने के बाद तालियां बंद हो जाती हैं। लेकिन खेत में पानी चाहिए तो तालियां नहीं, श्रम चाहिए। किसान को संकट से निकालना है तो संवाद नहीं, समाधान चाहिए। अंतिम जन तक पहुंचना है तो मंच नहीं, जमीन चाहिए। यहीं रील समाप्त होती है और वास्तविक जीवन शुरू होता है।
नाना पाटेकर की कहानी को इसी दृष्टि से पढ़ा जा सकता है—एक अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि उस सार्वजनिक चेतना के उदाहरण के रूप में, जो प्रसिद्धि से आगे बढ़कर किसान और ग्रामीण समाज के प्रश्नों को छूने का प्रयास करती है। क्योंकि असली नायक वह नहीं, जिसकी तस्वीर सबसे बड़ी हो। असली नायक वह है, जिसके कारण किसी छोटे आदमी की जिंदगी थोड़ी बड़ी हो जाए।
लेखक — डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक — आदर्श संस्कार शाला, भारत





















