Neelkanth Mahadev Temple: उत्तराखंड की पहाड़ियों में बसे कई धार्मिक स्थल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ पौराणिक कथाओं के लिए भी प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में एक नाम नीलकंठ महादेव मंदिर का है। ऋषिकेश के नजदीक स्थित यह प्राचीन शिवधाम भगवान भोलेनाथ के भक्तों के लिए बेहद खास माना जाता है। खासकर सावन के दिनों में यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला तो उसकी तीव्रता से देवता और असुर दोनों चिंतित हो उठे। संसार को इस विष के प्रभाव से बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। विष को गले में रोक लेने के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया और तभी से उन्हें ‘नीलकंठ’ नाम से भी जाना जाने लगा। मान्यता है कि भगवान शिव ने जिस स्थान पर इस विष का प्रभाव शांत किया, वही क्षेत्र आगे चलकर नीलकंठ महादेव धाम के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
ऋषिकेश से करीब 32 किलोमीटर दूर है मंदिर
नीलकंठ महादेव मंदिर पौड़ी गढ़वाल जिले में मणिकूट पर्वत पर स्थित है। यह ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर की दूरी पर है। चारों तरफ पहाड़, हरियाली और शांत वातावरण इस धार्मिक स्थल को और खास बना देते हैं। मंदिर तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को रास्ते में प्राकृतिक सौंदर्य भी देखने को मिलता है। यह मंदिर मधुमती और पंकजा नदियों के आसपास के क्षेत्र में स्थित बताया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में ब्रह्मकूट, विष्णुकूट और मणिकूट नाम की तीन पहाड़ियों का भी विशेष उल्लेख मिलता है। इन्हीं पहाड़ी क्षेत्रों के बीच नीलकंठ महादेव का धाम श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
शिव के तप से जुड़ी है मान्यता
नीलकंठ मंदिर को लेकर एक और धार्मिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि विषपान करने के बाद भगवान शिव ने विष की गर्मी को शांत करने के लिए इस क्षेत्र में लंबे समय तक तपस्या की थी। मान्यता है कि उन्होंने वटवृक्ष के नीचे ध्यान लगाया और समाधि में लीन रहे। कहा जाता है कि तपस्या के बाद भगवान शिव ने अपने कंठ की स्मृति और प्रतीक के रूप में यहां शिवलिंग स्थापित किया। मंदिर में मौजूद शिवलिंग को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं और भक्त इसे बेहद पवित्र मानकर पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर की दीवारों पर दिखती है समुद्र मंथन की कथा
नीलकंठ महादेव मंदिर की पहचान सिर्फ इसकी धार्मिक मान्यताओं से नहीं है। मंदिर की वास्तुकला भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती है। मंदिर के ऊपरी हिस्से में समुद्र मंथन से जुड़ी घटनाओं को चित्रित किया गया है। इन आकृतियों में उस पौराणिक प्रसंग को दर्शाने का प्रयास किया गया है, जिसमें देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इसी समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव द्वारा ग्रहण किए जाने की कथा इस मंदिर को विशेष धार्मिक पहचान देती है।
सावन में उमड़ता है भक्तों का सैलाब
सावन के महीने में नीलकंठ महादेव मंदिर का माहौल पूरी तरह शिवमय हो जाता है। हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों से कांवड़ लेकर आने वाले श्रद्धालु गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। सावन के अलावा महाशिवरात्रि पर भी यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी नीलकंठ महादेव मंदिर की धार्मिक महत्ता का उल्लेख कर चुके हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए इसे पौराणिक आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थस्थल बताया था। नीलकंठ महादेव मंदिर इसलिए भी खास है क्योंकि यहां धार्मिक विश्वास, पौराणिक कथा और पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता एक साथ देखने को मिलती है। यही वजह है कि सालभर श्रद्धालु इस धाम में पहुंचते हैं और सावन में इसकी रौनक कई गुना बढ़ जाती है।






















