भारत में 2014 के बाद से सत्ता परिवर्तन चुनाव से नहीं हो रहा, इसलिए अब चुनाव आयोग को ही कठघरे में खड़ा करके सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी जा रही है। यह कोई नई रणनीति नहीं है, यह वही वैश्विक मॉडल है जिसे ‘रेजीम चेंज’ कहा जाता है।
1. पैटर्न क्या है?
रेजीम चेंज का पहला नियम है – देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करो। सेना पर सवाल, न्यायालय पर सवाल, और सबसे अहम – चुनाव आयोग पर सवाल।
2019 से पहले तक चुनाव आयोग पर कभी व्यवस्थित हमला नहीं हुआ था। 2019 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद पहली बार EVM को लेकर भ्रम फैलाया गया। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं, विदेश में सेमिनार, और भारत में प्रेस कॉन्फ्रेंस – एक ही स्क्रिप्ट।
2024 के लोकसभा चुनाव में जब फिर से अपेक्षित परिणाम नहीं आया, तो नया बहाना बना – वोटर लिस्ट में गड़बड़ी, SIR – विशेष गहन पुनरीक्षण।
2. चुनाव आयोग के बहाने कैसे?
बिहार में 2025 में चल रहे SIR को ही देखिए। चुनाव आयोग का काम है मृत मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टि और बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम हटाना। यह दुनिया के हर लोकतंत्र में होता है। अमेरिका में हर 2 साल में वोटर लिस्ट पर्ज होती है।
पर भारत में इसे ‘वोट चोरी’ और ‘वोटबंदी’ कहा जा रहा है। क्यों? क्योंकि यदि 20-30 लाख फर्जी नाम कट गए, तो वह समीकरण जो फर्जी वोटों पर टिका है, वह ध्वस्त हो जाएगा।
अब तर्क दिया जा रहा है – “गरीब के पास कागज नहीं है।” यही तर्क CAA के समय दिया गया था, यही तर्क NRC के समय दिया गया था। संस्था को बदनाम करो, ताकि जब चुनाव हारो तो कह सको – चुनाव आयोग ने हराया है, जनता ने नहीं।
3. अब तक की साजिश के चरण
चरण एक – संस्थाओं का अंतरराष्ट्रीयकरण: चुनाव आयोग के खिलाफ लेख विदेशी अखबारों में छपवाना, विदेशी विश्वविद्यालयों में चर्चा कराना।
चरण दो – सड़क पर अराजकता: CAA के नाम पर शाहीन बाग, किसान आंदोलन के नाम पर बॉर्डर जाम, अब SIR के नाम पर बिहार बंद। उद्देश्य – सरकार को प्रतिक्रिया के लिए उकसाना और फिर कहना – देखो लोकतंत्र खतरे में है।
चरण तीन – न्यायपालिका पर दबाव: हर चुनाव सुधार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना, ताकि चुनाव आयोग अपना नियमित काम भी न कर सके।
यह साजिश चुनाव आयोग के बहाने नहीं, चुनाव आयोग को बहाना बनाकर सीधे भारत के जनादेश के खिलाफ है।
2014 से पहले रेजीम चेंज विदेशी पैसे और मीडिया से होता था। 2014 के बाद भारत में वह मॉडल फेल हो गया, क्योंकि जनता सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ी है। इसलिए अब नया मॉडल है – जनता के फैसले को ही अवैध घोषित कर दो। कहो कि चुनाव आयोग ही निष्पक्ष नहीं है, इसलिए चुनाव ही निष्पक्ष नहीं है।
पर भारत के मतदाता ने 2019 में, 2024 में और हर विधानसभा चुनाव में यह साबित किया है कि वह EVM से नहीं, अपनी इच्छा से वोट देता है। रेजीम चेंज की यह साजिश हर बार चुनाव आयोग की दीवार से टकराकर टूट जाती है, यही इस संस्था की सबसे बड़ी ताकत है।





















