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विदेश

गृहमंत्री सुडान गुरूंग के इस्तीफे से असहज हुई बालेन सरकार

amritujala
Last updated: अप्रैल 24, 2026 8:15 अपराह्न
amritujala 1 दिन पहले
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गृहमंत्री सुडान गुरूंग के स्तीफे से असहज हुई बालेन सरकार

यशोदा श्रीवास्तव

:नेपाल में दो मंत्रियों के रुखसती को “बालेन सरकार की उलटी गिनती” की दृष्टि से भले न देखा जाए लेकिन इस घटना से मात्र 26 दिन पूर्व सत्ता रूढ़ हुई बालेन सरकार के अनुभव और परिपक्वता को लेकर सवाल उठना लाजिमी है। मनी लांड्रिंग और विवादित व्यवसायी दीपक भट्ट से व्यवसायिक साझेदारी, संपत्ति अर्जन जैसे और भी आरोपों के खुलासे के बाद सुडान गुरूंग के खिलाफ विरोध और प्रदर्शन तेज हो गया था। उनके खिलाफ काठमांडू के नकसाल थाने में प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी की मांग जोर पकड़ रही थी। सुडान गुरूंग ने हालांकि अपने शोसल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्तीफा न देने की बात कही थी लेकिन अचानक उन्होंने बुधवार को प्रधानमंत्री बालेन शाह को अपना स्तीफा सौंप दिया। नेपाल में 26 दिन के भीतर यह दूसरे मंत्री का स्तीफा है। इसके कुछ दिन पूर्व जब श्रम मंत्री दीपक कुमार साह का स्तीफा हुआ था तब बालेन शाह की खूब वाहवाही हुई थी। दीपक कुमार साह पर अपनी पत्नी को स्वास्थ्य बोर्ड में सदस्य के पद पर स्थापित करने का आरोप था। दीपक साह धोखाधड़ी के मामले में जेल भी जा चुके हैं। दीपक साह से स्तीफा लेने पर बालेन सरकार के स्वच्छ छवि के कसीदे पढ़े गए थे वहीं सुडान गुरूंग के स्तीफे को एक ऐसे मंत्री का स्तीफा माना जा रहा है जिसने सिर्फ ईमानदार होने का मुखौटा लगा रखा था।
सुडान गुरूंग की छवि जेन जी आंदोलन के जरिए ओली सरकार को अपदस्थ करने वाले नायक की उभरी थी। ओली सरकार पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप थे। ओली ही क्यों, राजशाही खत्म होने के बाद नेपाल में जितनी भी सरकारें आईं उन सबसे जनता ऊब चुकी थी। जेन जी आंदोलन में ओली तो सेना के कैंप में भागकर मार पिटाई से बच गए थे, जबकि लगभग सभी पार्टियों के शीर्ष नेता, पूर्व प्रधानमंत्री,उनकी पत्नियां जेन जी के गुस्से का शिकार हुई थीं। जनता चूंकि उन सभी सरकारों से ऊबी हुई थी इसलिए ऐसे नेताओं के साथ हुए बर्बर व्यवहार से खुश थी। इस हिंसक आंदोलन में 76 युवाओं की जान गई थी और काठमांडू में महत्वपूर्ण सरकारी इमारतें,माल और हिल्टन जैसे अरबों रुपए के होटल आग के हवाले हो गए थे।
बहरहाल राजनीतिक अफरातफरी के बीच उच्च न्यायालय की पूर्व जज सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। इस सरकार ने छः महीने के अंदर चुनाव कराकर चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंप देने का वादा किया। अंतरिम सरकार के गठन और प्रधानमंत्री के चयन में भी सुडान गुरूंग की भूमिका खास थी। छः महीने बाद जब चुनाव की तारीख नजदीक आई तो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के रूप में एक मजबूत और युवाओं की पार्टी ने अपना विस्तार करना शुरू किया। इस पार्टी के अध्यक्ष पूर्व पत्रकार रवि लामी छाने हैं जिन्होंने पांच साल पहले इस पार्टी का गठन किया था।वे पिछले चुनाव में पूर्वी नेपाल में पहली मर्तबा चुनाव लड़े और बीस सांसदों के साथ नेपाल प्रतिनिधि सभा में धमाके दार इंट्री की और ओली सरकार में उप प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री भी बनें लेकिन अमेरिकी नागरिकता विवाद के चलते उन्हें उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से मंत्री और प्रतिनिधि सभा से स्तीफा देना पड़ा। हालांकि बाद में इस विवाद के हल हो जाने पर वे फिर जीतकर प्रतिनिधि सभा में लौटे लेकिन मंत्री अथवा अन्य किसी सरकारी पद से दूर रहें। बतौर गृह मंत्री रवि लामी छाने की छवि काफी सख्त थी। पहली मर्तबा उन्होंने ब्यूरोक्रेट्स और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर प्रहार किया था। रवि लामी छाने के इस तेवर से खुद ओली सरकार हिल गई थी साथ ही अन्य राजनीतिक दलों के बड़े नेता भी कांप उठे थे क्योंकि सबके हाथ भ्रष्टाचार में सने हुए हैं। हालांकि रवि लामी छाने स्वयं एक बड़े घोटाले में न्यायालय का सामना कर रहे हैं।
नेपाल की राजनीति में रवि लामी छाने और उनकी पार्टी की छवि अन्य पार्टियों की अपेक्षा स्वच्छ थी।यही वजह रही कि काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह,हामी नेपाल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के संचालक रहे सुडान गुरूंग और तमाम दूसरे पार्टियों के नेता बड़ी तेजी से इस पार्टी में शामिल हुए। रवि लामी छाने ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री का चेहरा तय कर दिया।
जनता चूंकि परिवर्तन के मूड में थी ही लिहाजा चुनाव हुआ तो पहाड़ से मैदान तक राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को एक तरफा जीत मिली। किसी एक पार्टी की ऐसी प्रचंड जीत पूर्व में किसी पार्टी को मिली हो, ऐसा कोई उदाहरण फिलहाल नेपाल की राजनीतिक इतिहास में नहीं है।
नेपाली जनता को इस युवा सरकार से बहुत उम्मीदें थीं। शपथ ग्रहण के बाद हर रोज सरकार के चकित करने वाले एक से एक फरमान से जनता उत्साहित थी और उसे परिवर्तन की अनुभूति की आश थी। गृहमंत्री पद पर रहते हुए सुडान गुरूंग ने पूर्व पीएम ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार करने का आदेश देकर सुर्खियां बटोरी तो थी लेकिन अपनी ही पार्टी के अंदर खाने उनकी आलोचना भी होने लगी थी। उनका अन्य मंत्रालयों में दखल भी मंत्रियों को असहज कर रहा था।
मधेश के लोगों को बालेन शाह से कुछ अधिक उम्मीद थी क्योंकि उन्हें भ्रम था कि पहली मर्तबा नेपाल में मधेश का प्रधानमंत्री हुआ है। मधेशियों को मधेश की समस्याएं भी हल होने की उम्मीद कुछ अधिक थी। जबकि सच यह है कि बालेन शाह के माता-पिता जरूर मधेश के थे लेकिन उनका जन्म और पालन पोषण काठमांडू में हुआ था और पढ़ाई लिखाई भारत में। राजशाही के जमाने में मधेश से दो प्रधानमंत्री हुए हैं। एक टंक बहादुर आचार्य और दूसरे तुलसी गिरी।
बालेन शाह के रूप में मधेशी प्रधानमंत्री की खुशी में फूले नहीं समा रहे मधेशियों को पहला झटका उनके चहेते प्रधानमंत्री से ही मिला। बालेन सरकार ने भारत सीमा से सटे भारतीय बाजारों से नेपाली नागरिकों के असीमित खरीददारी पर रोक लगा दिया है। भारतीय सीमा के बाजार नेपाल के मधेश से ही सटे हुए हैं। ये बाजार नेपाल के मधेश क्षेत्र के गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए जीवन रेखा है। इन बाजारों से ये लोग रोजमर्रा के सामान,सूती कपड़े, चीनी आदि खरीदते थे। दोनों ओर से इन्हें कोई रोकता टोकता नहीं था। बालेन सरकार ने भारतीय बाजारों से नेपाली नागरिकों की खरीदारी पर अंकुश लगा दिया है। अब वे सौ रुपए से अधिक के सामान की खरीदारी किए तो उन्हें नेपाल सरकार को सीमा शुल्क अदा करना होगा। इसके पीछे बालेन सरकार की मंशा नेपाली बाजारों को सुदृढ़ करने की हो सकती है लेकिन जब यहां बाजार का रुख दो तरफा है तो इससे नेपाल के सीमावर्ती बाजारों को नुकशान कहां था? बालेन सरकार के इस फैसले से दोनों देशों के बीच सदियों पुराना रोटी बेटी के रिश्ते पर भी असर पड़ सकता है।
बालेन सरकार के इस फैसले से मधेश क्षेत्र में सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है। इस गुस्से को नेपाली कांग्रेस भुनाने के प्रयास के तहत बालेन सरकार की न केवल निंदा की है,खत लिखकर अपने इस फैसले पर पुनर्विचार की अपील भी की है। बालेन सरकार के और भी कुछ फैसले सामने आए हैं जिससे आम जनता का कोई सरोकार नहीं है लेकिन उससे सरकार की सख्त मिजाजी का संदेश जरूर जाता है। बालेन सरकार के अबतक के क्रियाकलापों का मूल्यांकन का वक्त आ ही रहा था कि इस सरकार के दूसरे नंबर के सख्त मिजाज गृहमंत्री का भांडा फूट गया।
गृहमंत्री सुडान गुरूंग के खिलाफ जेन जी का ही एक धड़ा मोर्चा खोल दिया है। इस घटना से बालेन सरकार का असहज होना स्वाभाविक है।समझा जाता है कि यह धड़ा बालेन सरकार के छात्र संगठनों और उनकी सक्रिय राजनीति पर प्रतिबंध लगाने के फैसले से नाराज़ हैं। “जेन जी मूवमेंट” नेपाल नामक इस युवा संगठन का मानना है कि नेपाल में आज जो युवा नेतृत्व की सरकार सत्ता सीन हुई है वह युवा और छात्र राजनीति की ही देन है। चुनाव में सत्ता परिवर्तन का माहौल छात्र संगठन और युवा राजनीति ही बनाता है।
बालेन सरकार के इस फैसले से नाराज़ युवाओं का यह संगठन बालेन सरकार के खिलाफ मुखर हो रहा है।
सुडान गुरूंग के खिलाफ राजधानी के संवेदनशील क्षेत्र सिंह दरबार में प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद कार्यालय के बाहर सुडान गुरुंग के इस्तीफे की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन भी हुआ था।“गृहमंत्री इस्तीफा दो” की गूंज से नेपाल का राजनीतिक माहौल गरमा गया था। नतीजा कल तक जो गृहमंत्री स्तीफा न देने की बात कर रहे थे उन्हें मजबूर होकर प्रधानमंत्री को स्तीफा सौंपना पड़ा। सुडान गुरूंग का स्तीफा होते ही राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने गृहमंत्री का पद प्रधानमंत्री बालेन शाह के हवाले कर दिया।
मामला गृहमंत्री के स्तीफे तक ही सीमित नहीं है।
जेन-ज़ी मूवमेंट, नेपाल” ने गृहमंत्री सुडान गुरुंग के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए पुलिस मुख्यालय, नक्साल में औपचारिक रूप से शिकायत भी दर्ज कराई है। संगठन के प्रवक्ता विजय शाह ने अपने बयान में कहा कि सुडान गुरूंग पर लगे गंभीर आरोपों ने जनता के विश्वास को गहराई से प्रभावित किया है। “जेन-ज़ी मूवमेंट, नेपाल” ने गृहमंत्री पद पर रहते हुए सुडान गुरूंग पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए आंदोलनों के दुरुपयोग, आर्थिक लाभ प्राप्त करने और कथित अवैध गतिविधियों में संलिप्त होने जैसे आरोप भी लगाए हैं। बयान में यह भी कहा गया कि हालिया आंदोलन के दौरान हुए नुकसान और शहीदों के अपमान ने जनता की भावनाओं को गहराई से आहत किया है।
संगठन ने अपनी मांगों में स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्हें गिरफ्तार कर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच शुरू की जाए, और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। सुडान गुरूंग के खिलाफ उठे आवाज से नेपाल सरकार अंतर्विरोधों के चक्रव्यूह में फंस गई है। जिस तरह नेपाल की राजनीति में नया मोड़ आ रहा है उससे एक बात साफ है कि नेपाली जनता फिलहाल जहां की तहां है। अच्छे दिन की आश में उसने आंदोलन से उपजे युवा नेतृत्व पर भरोसा किया था लेकिन अब वे निराश और नाउम्मीद हो रहे हैं।

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