UN महासचिव की कुर्सी पर पहली बार महिला दावेदारी मजबूत, क्या 2027 में टूटेगा 80 साल का इंतजार?

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संयुक्त राष्ट्र महासचिव चुनाव में नया इतिहास रचने की तैयारी, महिला उम्मीदवारों ने बढ़ाई उम्मीद

UN Secretary General 2026:  24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में आया था। हालांकि, इसके मूल चार्टर पर इससे करीब चार महीने पहले, 26 जून 1945 को सैन फ्रांसिस्को में आयोजित सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे। इस सम्मेलन में 50 देशों के प्रतिनिधियों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। पोलैंड उस समय सम्मेलन में शामिल नहीं हो सका था, लेकिन बाद में हस्ताक्षर कर वह संयुक्त राष्ट्र के मूल 51 सदस्यों में शामिल हुआ। आज संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या 193 है। आठ दशकों में 51 से 193 सदस्यों तक पहुंची यह संस्था आधुनिक विश्व की सबसे व्यापक बहुपक्षीय संस्थाओं में से एक बन चुकी है। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में अब तक नौ व्यक्ति महासचिव का पद संभाल चुके हैं, लेकिन इनमें एक भी महिला नहीं रही है। ऐसे में 2026 में होने वाली महासचिव पद की उत्तराधिकारी प्रक्रिया लैंगिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

 

जिस संस्था ने समानता की बात की, वहां अब तक महिला महासचिव नहीं

संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक दस्तावेज में ही लैंगिक समानता की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। चार्टर की प्रस्तावना में पुरुषों और महिलाओं के समान अधिकारों में विश्वास व्यक्त किया गया है। वहीं, अनुच्छेद 8 में स्पष्ट किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख और सहायक अंगों में पुरुषों और महिलाओं की समान परिस्थितियों में भागीदारी पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। विडंबना यह है कि जिस संस्था ने 1945 में लैंगिक समानता को अपने मूल सिद्धांतों में स्थान दिया, उसके सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर 2026 तक एक भी महिला नहीं पहुंच सकी। अब पहली बार तस्वीर बदलती हुई दिखाई दे रही है।

 

2026 में महासचिव पद के लिए बदल रहा समीकरण

वर्तमान महासचिव एंतोनियो गुतारेस का दूसरा पांच वर्षीय कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होगा। इसके बाद नए महासचिव का पांच वर्षीय कार्यकाल 1 जनवरी 2027 से शुरू होगा। महासचिव का चयन सीधे दुनिया की जनता के मतदान से नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद उम्मीदवार की सिफारिश करती है और इसके बाद महासभा नियुक्ति करती है। सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में कम से कम नौ सकारात्मक मत जरूरी होते हैं। साथ ही पांच स्थायी सदस्यों में से किसी एक का नकारात्मक मत प्रक्रिया को रोक सकता है। यही वजह है कि अनौपचारिक मतदान में बढ़त महत्वपूर्ण जरूर होती है, लेकिन उसे अंतिम जीत नहीं माना जा सकता।

 

पहली बार मजबूत स्थिति में महिला उम्मीदवार

अगस्त 2026 तक महासचिव पद की दौड़ में आठ उम्मीदवार सामने थे। इनमें पांच महिलाएं और तीन पुरुष शामिल थे। यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में असाधारण है, क्योंकि पहली बार महिला उम्मीदवारों की इतनी मजबूत मौजूदगी इस पद की वास्तविक प्रतिस्पर्धा में दिखाई दे रही है। अगस्त में इक्वाडोर की इवोन बकी के मैदान में आने के बाद उम्मीदवारों की संख्या आठ हुई। हालांकि, प्रक्रिया पूरी होने तक उम्मीदवारों की संख्या में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

पहले मतदान में रेबेका ग्रिन्सपैन आगे

30 जुलाई को हुए पहले अनौपचारिक सुरक्षा परिषद मतदान में कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन सबसे आगे रहीं। उन्हें 10 ‘प्रोत्साहन’ मत मिले। गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिरकेट को नौ और अर्जेंटीना के राफेल ग्रोसी को सात प्रोत्साहन मत मिले। हालांकि, यह मतदान केवल उम्मीदवारों के प्रति सुरक्षा परिषद के सदस्यों के रुझान को समझने के लिए था। इसे अंतिम चुनाव नहीं माना जाता।

 

दूसरे मतदान में बदली तस्वीर

21 अगस्त 2026 को हुए दूसरे अनौपचारिक मतदान में तस्वीर कुछ बदल गई। गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिरकेट आठ ‘प्रोत्साहन’ मतों के साथ सबसे आगे रहीं, जबकि रेबेका ग्रिन्सपैन सात प्रोत्साहन मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बिरकेट को तीन ‘हतोत्साहन’ मत मिले, जबकि चार सदस्यों ने कोई राय नहीं दी। वहीं, ग्रिन्सपैन को सात प्रोत्साहन और चार हतोत्साहन मत मिले। फिर भी यह याद रखना जरूरी है कि यह मतदान अनौपचारिक और गैर-बाध्यकारी है। महासचिव पद का अंतिम फैसला अभी बाकी है।

 

कैरोलिन रोड्रिग्स-बिरकेट के नाम से जुड़ी ऐतिहासिक संभावना

यदि कैरोलिन रोड्रिग्स-बिरकेट संयुक्त राष्ट्र की महासचिव चुनी जाती हैं तो वह संगठन की पहली महिला महासचिव होंगी। इसके साथ ही वह कैरेबियाई क्षेत्र से आने वाली पहली महासचिव भी बनेंगी। उनकी व्यक्तिगत यात्रा भी उल्लेखनीय है। गुयाना के एक दूरस्थ आदिवासी समुदाय से निकलकर शिक्षिका बनने, फिर मंत्री और अंततः संयुक्त राष्ट्र में गुयाना की स्थायी प्रतिनिधि बनने तक का उनका सफर वैश्विक नेतृत्व में प्रतिनिधित्व के व्यापक सवाल को सामने लाता है। हालांकि, इस समय उन्हें विजेता घोषित करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। दूसरे अनौपचारिक मतदान में प्रथम स्थान मजबूत राजनीतिक स्थिति का संकेत जरूर है, लेकिन महासचिव बनने के लिए सुरक्षा परिषद की औपचारिक सिफारिश और महासभा की नियुक्ति जरूरी है।

 

सवाल सिर्फ महिला बनाम पुरुष का नहीं

इस पूरी प्रक्रिया को केवल महिला बनाम पुरुष के नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि 2027 से संयुक्त राष्ट्र को किस तरह के नेतृत्व की जरूरत है। दुनिया इस समय युद्ध, मानवीय संकट, जलवायु परिवर्तन, भूख, गरीबी, विस्थापन, विकास में असमानता और बहुपक्षीय संस्थाओं में घटते विश्वास जैसी कई चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में नए महासचिव के सामने राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखने, कूटनीतिक संतुलन साधने और सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने की बड़ी चुनौती होगी।

 

गरीबी और भूख की चुनौती

गरीबी की स्थिति इस चुनौती की गंभीरता को समझने में मदद करती है। विश्व बैंक ने वैश्विक अत्यधिक गरीबी के लिए नई अंतरराष्ट्रीय सीमा 3 डॉलर प्रतिदिन निर्धारित की है। उसके उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 831 मिलियन लोग इस सीमा से नीचे जीवन जी रहे हैं। इनमें 400 मिलियन से अधिक महिलाएं भी शामिल हैं। भूख की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। खाद्य एवं कृषि संगठन की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में करीब 645 मिलियन लोग भूख से प्रभावित थे। यह दुनिया की कुल आबादी का लगभग 7.8 प्रतिशत है। 2024 की तुलना में इसमें करीब 14 मिलियन की कमी जरूर आई है, लेकिन 2030 तक भूख खत्म करने के वैश्विक लक्ष्य की तुलना में यह संख्या अभी भी बहुत बड़ी है।

 

शिक्षा और महिलाओं की स्थिति

शिक्षा के क्षेत्र में भी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है। यूनेस्को के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दुनिया में करीब 273 मिलियन बच्चे और युवा स्कूल से बाहर हैं। इनमें लगभग 133 मिलियन लड़कियां और 140 मिलियन लड़के शामिल हैं। वयस्क साक्षरता की स्थिति में भी महिलाओं की चुनौतियां अधिक हैं। बुनियादी साक्षरता से वंचित वयस्कों में करीब दो-तिहाई महिलाएं हैं। ऐसे में लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा को केवल सामाजिक कल्याण का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक विकास की बुनियादी शर्त के रूप में देखना जरूरी है।

 

मातृ स्वास्थ्य भी बड़ी वैश्विक चुनौती

मातृ स्वास्थ्य का मुद्दा भी विश्व नेतृत्व के सामने गंभीर चुनौती पेश करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2023 में गर्भावस्था, प्रसव या उसके बाद करीब 260,000 महिलाओं की मौत हुई। इनमें लगभग 92 प्रतिशत मौतें निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में हुईं। इनमें से बड़ी संख्या में मौतों को उचित स्वास्थ्य सेवाओं और समय पर उपचार के जरिए रोका जा सकता था। आंकड़े बताते हैं कि मातृ स्वास्थ्य अभी भी वैश्विक विकास और समानता के एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

शांति निर्माण में महिलाओं की भूमिका

शांति निर्माण के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को लेकर भी महत्वपूर्ण शोध सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र महिला से जुड़े एक वैश्विक अध्ययन में पाया गया कि जिन शांति प्रक्रियाओं में महिलाएं गवाह, हस्ताक्षरकर्ता, मध्यस्थ या वार्ताकार के रूप में शामिल थीं, उनमें शांति समझौते के कम से कम 15 वर्षों तक टिके रहने की संभावना 35 प्रतिशत अधिक थी। इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल महिला नेतृत्व से युद्ध खत्म हो सकते हैं। हालांकि, उपलब्ध प्रमाण यह जरूर संकेत देते हैं कि शांति प्रक्रिया में महिलाओं की सार्थक भागीदारी समझौतों को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद कर सकती है।

 

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है महासचिव पद की दौड़

संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की यह पूरी प्रक्रिया भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और इसके विस्तार की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की शक्ति-संरचना को दर्शाती है, जबकि आज की दुनिया कहीं अधिक व्यापक, विविध और बहुध्रुवीय हो चुकी है। ऐसे में यदि किसी विकासशील देश या छोटे अथवा मध्यम देश से आने वाली महिला को महासचिव पद मिलता है, तो यह वैश्विक प्रतिनिधित्व की बहस को एक नया आयाम दे सकता है।

 

विजयलक्ष्मी पंडित से जुड़ा भारत का ऐतिहासिक अध्याय

महिला नेतृत्व के मामले में भारत का अपना बहुपक्षीय इतिहास भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 1953 में विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी थीं। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक अभिलेख इसकी पुष्टि करते हैं। इस लिहाज से संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर महिला नेतृत्व की संभावना भारत के लिए केवल वर्तमान वैश्विक राजनीति का विषय नहीं है, बल्कि उसके अपने बहुपक्षीय इतिहास से भी जुड़ी हुई है।

 

अभी फैसला बाकी, लेकिन संकेत बड़े हैं

26 अगस्त 2026 तक सबसे तथ्यात्मक निष्कर्ष यही है कि संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में पहली महिला महासचिव बनने की संभावना अब वास्तविक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र में है। कैरोलिन रोड्रिग्स-बिरकेट का दूसरे अनौपचारिक मतदान में प्रथम स्थान और रेबेका ग्रिन्सपैन का दूसरे स्थान पर रहना इस संभावना को जरूर मजबूत करता है, लेकिन अभी किसी भी उम्मीदवार को विजेता घोषित करना जल्दबाजी होगी। अंतिम निर्णय सुरक्षा परिषद की औपचारिक सिफारिश और महासभा की नियुक्ति के बाद ही होगा।

 

बदलती विश्व व्यवस्था का संकेत

महासचिव का यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि संयुक्त राष्ट्र का अगला प्रमुख कौन होगा। इसके जरिए यह संकेत भी मिलेगा कि दुनिया किस तरह की वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहती है। क्या विश्व पुरानी शक्ति-संरचना को बनाए रखना चाहता है या अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और बहुपक्षीय व्यवस्था की ओर आगे बढ़ना चाहता है—इस सवाल का जवाब भी इस चुनाव के साथ कहीं न कहीं सामने आएगा। इतिहास का अंतिम फैसला अभी बाकी है, लेकिन 2026 ने एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर दिखा दिया है। संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च पद की दौड़ में महिलाएं अब केवल प्रतीकात्मक दावेदार नहीं हैं, बल्कि गंभीर और मजबूत प्रतिस्पर्धी के रूप में वैश्विक मंच के केंद्र में खड़ी हैं।

 

आठ दशक की प्रतीक्षा के बाद यदि संयुक्त राष्ट्र को पहली महिला महासचिव मिलती है, तो यह केवल एक पद पर महिला की नियुक्ति नहीं होगी, बल्कि वैश्विक नेतृत्व और प्रतिनिधित्व की बदलती तस्वीर का ऐतिहासिक संकेत भी होगा।

 

डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक

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