आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी अथवा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी। वहीं, मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार कर धर्म और सत्य की स्थापना की थी। इस वर्ष विजयादशमी का पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
पूरे दिन रहेगा रवि योग
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल, स्वास्तिक ज्योतिष केंद्र, अलीगंज, लखनऊ के अनुसार, इस बार विजयादशमी के दिन रवि योग का संयोग रहेगा। विजयादशमी को स्वयं सिद्ध और अबूझ मुहूर्त वाला पर्व भी माना जाता है। इस दिन किसी शुभ कार्य को आरंभ करने के लिए अलग से मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं मानी जाती। मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ कार्यों से सफलता और विजय का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
दशहरा पर्व पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन करने की परंपरा है। आमतौर पर सूर्यास्त के बाद शाम के समय पुतला दहन किया जाता है। इस अवसर पर भगवान श्रीराम की विजय का स्मरण करते हुए अधर्म, अहंकार और अन्याय के अंत का संदेश दिया जाता है। इस दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन को भी शुभ माना जाता है।
विजय मुहूर्त में अस्त्र-शस्त्र पूजन का विधान
विजयादशमी क्षत्रिय समाज के प्रमुख पर्वों में से एक है। इस दिन विजय मुहूर्त में अस्त्र-शस्त्र पूजन करने की परंपरा है। इसके साथ ही भगवान श्रीराम और मां दुर्गा की पूजा, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाण तथा शमी वृक्ष के पूजन का विधान बताया गया है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, दशमी तिथि के अपराह्न काल में ईशान दिशा में अपराजिता देवी के साथ जया और विजया देवियों की पूजा की जाती है। शमी वृक्ष का पूजन भी इस पर्व का महत्वपूर्ण अंग है। मान्यता है कि शमी पूजन से विजय, सफलता और कार्यों में आने वाली बाधाओं से मुक्ति का आशीर्वाद मिलता है।
विजयादशमी पर पूजन के शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल के अनुसार, इस वर्ष विजयादशमी पर विजय मुहूर्त दोपहर 1:45 बजे से 2:31 बजे तक रहेगा। वहीं, अपराह्न पूजन का मुहूर्त दोपहर 12:59 बजे से 3:16 बजे तक बताया गया है।
विजय मुहूर्त में अस्त्र-शस्त्र पूजन, अपराजिता देवी की पूजा और शमी वृक्ष का पूजन करना शुभ माना जाता है। परंपरा में इस समय विजय-प्रयाण और सीमा उल्लंघन का भी उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में सीमा उल्लंघन का आशय विजय की कामना से शत्रु क्षेत्र की ओर प्रस्थान करने से था।
महाभारत काल से जुड़ी है शमी पूजन की परंपरा
शमी वृक्ष के पूजन के संबंध में महाभारत काल की एक प्रसिद्ध कथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, पांडवों के अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष पर छिपाकर रखे थे। इस दौरान उन्होंने बृहन्नला का रूप धारण कर राजा विराट के यहां समय बिताया था।
अज्ञातवास की अवधि पूरी होने के बाद अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने अस्त्र-शस्त्र निकाले और युद्ध में विजय प्राप्त की। इसी प्रसंग को शमी वृक्ष की महिमा और विजयादशमी पर उसके पूजन की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए आगे बढ़े, तब शमी वृक्ष ने उनकी विजय का संकेत दिया था। इसी कारण विजयादशमी पर विजय की कामना से शमी वृक्ष का पूजन करने की परंपरा प्रचलित है।
विजयादशमी का पर्व केवल उत्सव और पुतला दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में सत्य, धर्म, साहस और सदाचार अपनाने की प्रेरणा भी देता है। भगवान श्रीराम की विजय का संदेश यही है कि अंततः धर्म और सत्य की ही जीत होती है।
स्रोत: ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल, स्वास्तिक ज्योतिष केंद्र, अलीगंज, लखनऊ।





















