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अमृत उजाला > धर्म/ज्योतिष > पितृ-महिमा: वेद से कलयुग तक सनातन संस्कार की अटूट धारा
धर्म/ज्योतिष

पितृ-महिमा: वेद से कलयुग तक सनातन संस्कार की अटूट धारा

amritujala
Last updated: June 21, 2026 12:14 PM
amritujala 2 months पहले
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पितृ-महिमा: वेद से कलयुग तक सनातन संस्कार की अटूट धारा
पितृ-महिमा: वेद से कलयुग तक सनातन संस्कार की अटूट धारा
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वेद, उपनिषद, पुराण, भागवत और लोक-जीवन के विस्तृत पटल पर यदि किसी एक संबंध को देवत्व के समकक्ष रखा गया है तो वह पिता का संबंध है। ऋग्वेद का उद्घोष “पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः” केवल शब्द नहीं, भारतीय चेतना का मूल मंत्र है। पिता को यहाँ जन्म देने वाला ही नहीं, प्रथम गुरु, धर्म का आधार और सबसे कठोर तपस्या का प्रतीक कहा गया। अथर्ववेद ने पिता के कर्तव्य को और स्पष्ट किया कि संतान का भरण-पोषण, रक्षा और मार्गदर्शन उसका दायित्व है, इसलिए वह पूजनीय है। तैत्तिरीय उपनिषद में जब शिष्य की शिक्षा पूर्ण होती है तो आचार्य का अंतिम आदेश होता है मातृदेवो भव, पितृदेवो भव। अर्थात जीवन की पाठशाला से निकलते समय भी पहला प्रणाम माता और पिता के लिए ही निश्चित किया गया। छांदोग्य उपनिषद में आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मज्ञान देते हैं। यहाँ पिता केवल अन्नदाता नहीं रहा, वह आत्मज्ञान का द्वार खोलने वाला आचार्य बन गया। इस प्रकार वैदिक काल से ही पिता की भूमिका चार रूपों में प्रतिष्ठित हुई। वह जनक है क्योंकि उससे शरीर मिला। वह पालक है क्योंकि उसी के श्रम से संतान पलती है। वह शिक्षक है क्योंकि वही पहला अक्षर सिखाता है। और वह धर्म-संस्थापक है क्योंकि कुल की मर्यादा उसी से आरम्भ होती है।

पुराणों ने इस भाव को कथाओं के माध्यम से और दृढ़ किया। स्कन्द पुराण कहता है कि माता पिता से सौ गुना श्रेष्ठ है, फिर भी उसी श्लोक की परंपरा में पिता को कुल का रक्षक और धर्म का प्रवर्तक कहा गया। भागवत पुराण में ध्रुव और प्रह्लाद के प्रसंग आते हैं। ध्रुव का पिता उत्तानपाद मोह में बँधा था, प्रह्लाद का पिता हिरण्यकशिपु घोर विरोधी था। फिर भी कथा का सार यही निकलता है कि पितृ-ऋण का भाव मन में रखना ही धर्म है। पिता कैसा भी हो, उसका स्थान रिक्त नहीं किया जा सकता। गरुड़ पुराण तो यहाँ तक कह देता है कि जिसके पिता जीवित हैं, उसे तीर्थों में भटकने की आवश्यकता नहीं। पिता की सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ है, सबसे बड़ी प्रदक्षिणा है। मनुस्मृति ने तो गणित ही बैठा दिया। दस उपाध्यायों से एक आचार्य श्रेष्ठ, सौ आचार्यों से एक पिता श्रेष्ठ। क्योंकि उपाध्याय अक्षर देता है, आचार्य ज्ञान देता है, पर पिता जीवन ही दे देता है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का नित्य कर्म बताया कि वे प्रातः उठकर माता, पिता और गुरु को शीश नवाते थे। इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि स्वयं भगवान ने भी पिता के चरणों को अपने मस्तक पर रखा।

लोक ने इस शास्त्रीय भाव को अपनी सरल कहावतों में ढाल लिया। पिता का साया, धूप में छाया कहकर समाज ने स्वीकार किया कि पिता की उपस्थिति ही सुरक्षा है। पिता करे संतान हित, तन मन धन सब वार यह पंक्ति हर उस गृहस्थ के जीवन का सार है जिसने अपने सुख काटकर बच्चों के सपने सींचे हैं। बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया जैसी उक्ति विडंबना जरूर है, पर वह भी यही बताती है कि मूल में पिता का स्थान रुपया से भी ऊपर माना गया था, तभी उसकी तुलना से व्यंग्य रचा गया। लोक में पिता बरगद है। बरगद फल नहीं देता, छाँव देता है। बोलता नहीं, पर उसके नीचे पूरी बस्ती पलती है। इसी कारण हमारे यहाँ तीन ऋण माने गए। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। देव ऋण यज्ञ से, ऋषि ऋण स्वाध्याय से, और पितृ ऋण संतान उत्पत्ति तथा सेवा से चुकता होता है। पिता इस तीसरे ऋण का मूल है।

अब प्रश्न उठता है कि जिस पिता को सतयुग में ऋषि, त्रेता में राजा, द्वापर में मार्गदर्शक कहा गया, कलयुग में उसकी स्थिति क्या है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के द्वादश स्कंध में कलयुग के लक्षण गिनाते समय स्पष्ट लिखा है कि इस युग में संतान पितु-वाक्य नहीं मानेगी। धन के लिए माता-पिता का तिरस्कार करेगी। पितरौ भाररूपत्वं अर्थात माता-पिता बोझ लगने लगेंगे। यह भविष्यवाणी थी, आदेश नहीं। शास्त्र ने रोग बताया, उसे धर्म नहीं कहा। इसके विपरीत मनुस्मृति का वचन कलयुग में भी ज्यों का त्यों खड़ा है कि माता के समान गुरु नहीं और पिता के समान देव नहीं। गरुड़ पुराण ने तो कलयुग के लिए विशेष फल लिखा कि इस युग में जो पुत्र मन-कर्म-वचन से पिता की सेवा करेगा, उसे गया में श्राद्ध करने जितना पुण्य अपने आँगन में ही मिल जाएगा। इसका कारण यही है कि कलयुग में धर्म का आचरण कठिन है, इसलिए छोटा सा सत्य भी बड़े फलदायी हो जाता है।

कलयुग में पिता का स्वरूप बदला है, स्वभाव नहीं। वेद का पिता जन्मदाता और गुरु था। आज का पिता एटीएम भी है, गूगल भी है, दोस्त भी है और बॉडीगार्ड भी है। पहले वह केवल धर्म और खेती सिखाता था, आज वह कोडिंग की फीस भरता है, ईएमआई के तनाव में हँसता है, और बच्चों के करियर की चिंता में रात भर करवट बदलता है। पहले पिता की पहचान धोती और लाठी थी, आज उसकी पहचान थका हुआ चेहरा और फोन पर लगा पासवर्ड है जो बच्चों की ऑनलाइन क्लास के लिए है। परिश्रम का क्षेत्र बदला है, परिश्रम का भाव वही है। पहले पिता कुल-परंपरा देता था, अब वह सपने, स्कूल फीस और संस्कार तीनों एक साथ देता है। इसीलिए कहा जाता है कि सतयुग में पिता ऋषि था, कलयुग में पिता संघर्षशील इंसान है। ऋषि को पूजना सरल था, संघर्षशील इंसान को समझना कठिन है, पर आवश्यक वही है।

संतों ने कलयुग का सबसे सरल मार्ग बताया। कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि नर उतरहिं पारा। जैसे भगवान का नाम इस युग का सबसे बड़ा सहारा है, वैसे ही माता-पिता की सेवा इस युग का सबसे सरल और सबसे ऊँचा धर्म है। कबीर ने जब कहा कि गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय, तो गुरु को प्रथम रखा। पर घर का पहला गुरु, पहला विद्यालय, पिता ही होता है। इसलिए पितृ-सेवा गोविन्द-सेवा का ही पहला सोपान है। लोक आज भी कहता है कि बाप की लाठी का सहारा बुढ़ापे में पता चलता है। कलयुग में बच्चे भले ही पढ़ाई या नौकरी के लिए जल्दी दूर हो जाएँ, पर जीवन के किसी मोड़ पर जब दुनिया मुँह फेर लेती है, तब पिता का मौन आशीर्वाद ही सबसे पहले याद आता है।

आँकड़ों की दृष्टि से देखें तो भी यह सत्य प्रमाणित होता है। समाजशास्त्र के अध्ययन बताते हैं कि जिन परिवारों में पिता की सक्रिय भूमिका रही, वहाँ बच्चों में आत्मविश्वास, निर्णय क्षमता और नैतिक बल कई गुना अधिक पाया गया। अपराध-शास्त्र के आँकड़े कहते हैं कि किशोर अपराधों में उन बालकों की संख्या अधिक है जिनके जीवन से पिता का साया जल्दी उठ गया या निष्क्रिय रहा। मनोविज्ञान के सर्वेक्षण बताते हैं कि पिता का संवाद बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए माता के प्रेम जितना ही अनिवार्य है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या यह अवश्य बताती है कि कलयुग का लक्षण पितरौ भाररूपत्वं सत्य हो रहा है, पर उन्हीं वृद्धाश्रमों में बैठे बुजुर्गों की आँखें आज भी द्वार पर टँगी रहती हैं। यह प्रतीक्षा ही प्रमाण है कि संबंध का सूत्र टूटा नहीं है, केवल उलझ गया है।

सार यही है कि युग बदलने से पिता नहीं बदलता, पिता का ऋण नहीं बदलता। वेद से लेकर आज तक पिता चार भूमिकाएँ निभाता आया है। वह बीज है, वह छाया है, वह दिशा है और वह आधार है। सतयुग में वह मंत्र देता था, कलयुग में वह मेहनत देता है। तब वह शास्त्र पढ़ाता था, अब वह संघर्ष पढ़ाता है। तब वह यज्ञ कराता था, अब वह स्वयं ही हवन हो जाता है। इसलिए शास्त्रों ने कहा कि पिता स्वर्ग है और लोक ने माना कि पिता बिना घर, देहरी बिना द्वार है। कलयुग की कसौटी पर पिता का मूल्य घटा नहीं, बल्कि और बढ़ गया है। क्योंकि इस युग में अच्छाई निभाना ही तप है। और जो पुत्र इस तप को समझकर पिता के पसीने की गंध में तीर्थ का जल देख लेता है, उसके लिए कलयुग भी सतयुग बन जाता है। पितृ-ऋण चुकाया नहीं जा सकता, केवल स्वीकारा जा सकता है। यही सनातन सत्य है, यही महान संस्कृति का संस्कार है।

इस लेख के लेखक मेरे स्वर्गीय पिताश्री है।
गोलोक निकुंज सेवी श्री राजेन्द्र प्रसाद गोस्वामी,सेवानिवृत्त शिक्षक,
संस्थापक। आदर्श संस्कार शाला ,परिवार,भारत

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