2026 बना नौसेना के आधुनिकीकरण का ऐतिहासिक वर्ष, स्वदेशी जहाज निर्माण ने रचा नया कीर्तिमान
भारत की समुद्री सुरक्षा और सामरिक क्षमता को नई मजबूती देते हुए भारतीय नौसेना में रविवार को तीन नए युद्धपोत शामिल किए गए। कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) में आयोजित समारोह में आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस अग्रय और आईएनएस संशोधक को औपचारिक रूप से नौसेना के बेड़े का हिस्सा बनाया गया।
इन तीनों युद्धपोतों की भूमिका अलग-अलग है। एक लंबी दूरी तक समुद्री अभियानों के लिए तैयार है, दूसरा दुश्मन की पनडुब्बियों का शिकार करने में सक्षम है, जबकि तीसरा समुद्र की गहराइयों का वैज्ञानिक और सामरिक अध्ययन करेगा।
नौसेना के इतिहास में सबसे तेज विस्तार
भारतीय नौसेना के लिए वर्ष 2026 विशेष महत्व रखता है। इस वर्ष नौसेना कुल 19 नए युद्धपोत और प्लेटफॉर्म अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है। इससे पहले 2025 में 14 पोत और एक पनडुब्बी नौसेना में शामिल की गई थी।
यानी केवल दो वर्षों के भीतर भारतीय नौसेना में 33 नए प्लेटफॉर्म शामिल होने जा रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञ इसे देश की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता और रक्षा आत्मनिर्भरता का बड़ा उदाहरण मान रहे हैं।
आईएनएस दुनागिरी: गहरे समुद्र का नया प्रहरी
आईएनएस दुनागिरी आधुनिक नीलगिरि श्रेणी के फ्रिगेट्स में से एक है। यह युद्धपोत लंबे समय तक समुद्र में रहकर मिशन संचालित कर सकता है, जिसे नौसैनिक भाषा में “ब्लू वॉटर क्षमता” कहा जाता है।
इसमें अत्याधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, वायु रक्षा मिसाइलें और सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइलें लगी हैं। दुश्मन के जहाजों, विमानों और मिसाइलों से मुकाबला करने के साथ-साथ यह समुद्री निगरानी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
करीब 6,700 टन वजनी यह युद्धपोत अपनी पिछली पीढ़ी के जहाजों की तुलना में अधिक शक्तिशाली, तेज और कम रडार पहचान वाला है। इसकी डिजाइन में स्टील्थ तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे दुश्मन के लिए इसे पहचानना कठिन हो जाता है।
नई तकनीक से तेजी से बन रहे हैं युद्धपोत
नीलगिरि श्रेणी के जहाजों को तैयार करने में “इंटीग्रेटेड कंस्ट्रक्शन” तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें जहाज के विभिन्न हिस्सों को अलग-अलग तैयार कर बाद में जोड़ा जाता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), आधुनिक डिजाइन सॉफ्टवेयर और डिजिटल निर्माण प्रक्रियाओं के कारण अब भारत में युद्धपोत बनाने का समय 8-9 वर्षों से घटकर लगभग 6 वर्ष रह गया है।
यह बदलाव भारतीय रक्षा उत्पादन क्षेत्र में तकनीकी क्रांति का संकेत माना जा रहा है।
आईएनएस अग्रय: दुश्मन की पनडुब्बियों का शिकारी
आईएनएस अग्रय को विशेष रूप से दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए तैयार किया गया है।
यह अर्नाला श्रेणी का चौथा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) है। इसका मुख्य कार्य तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में छिपी पनडुब्बियों की पहचान करना और उन पर कार्रवाई करना है।
इस युद्धपोत में अत्याधुनिक सोनार, पानी के भीतर संचार प्रणाली, हल्के टॉरपीडो, रॉकेट और आधुनिक एंटी-टॉरपीडो सुरक्षा तंत्र लगाए गए हैं।
करीब 80 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक से निर्मित इस परियोजना में देश की अनेक निजी और सरकारी कंपनियों के साथ 50 से अधिक एमएसएमई इकाइयों की भागीदारी रही है।
आईएनएस संशोधक: समुद्र की गहराइयों का वैज्ञानिक प्रहरी
आईएनएस संशोधक केवल एक युद्धपोत नहीं बल्कि समुद्री अनुसंधान और सामरिक जानकारी जुटाने का अत्याधुनिक मंच है।
यह समुद्र की गहराई, समुद्र तल की संरचना, नौवहन मार्गों और खनिज संसाधनों की जानकारी जुटाने में सक्षम है। पनडुब्बियों के सुरक्षित संचालन से लेकर समुद्री व्यापार मार्गों के विकास तक इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
करीब 110 मीटर लंबा और 3,400 टन वजनी यह पोत आधुनिक हाइड्रोग्राफिक उपकरणों, स्वायत्त पानी के भीतर चलने वाले वाहनों (AUV), डिजिटल स्कैनिंग सिस्टम और विशेष सर्वेक्षण नौकाओं से लैस है।
समुद्री शक्ति के नए युग की ओर भारत
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और समुद्र तल में मौजूद महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की खोज के बीच भारतीय नौसेना तेजी से खुद को आधुनिक बना रही है।
आईएनएस दुनागिरी, आईएनएस अग्रय और आईएनएस संशोधक का शामिल होना केवल तीन नए जहाजों का जुड़ना नहीं है, बल्कि यह भारत की उस सोच का प्रतीक है जिसमें आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा एक साथ आगे बढ़ रहे हैं।
समुद्र की सतह से लेकर उसकी गहराइयों तक, भारतीय नौसेना अब पहले से कहीं अधिक सक्षम, आधुनिक और आत्मविश्वास से भरी हुई दिखाई दे रही है।






