रामसर साइट की दिशा में बढ़ा कुशीनगर
जिले की आर्द्रभूमियों को मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान, वैज्ञानिक मैपिंग और जीरो लिक्विड डिस्चार्ज मॉडल पर होगा कार्य
कुशीनगर। जिले की प्राकृतिक धरोहर मानी जाने वाली प्रमुख आर्द्रभूमियां और ताल अब अंतरराष्ट्रीय पहचान की ओर बढ़ रहे हैं। जिले के प्रमुख वेटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) को रामसर साइट की सूची में शामिल कराने के लिए जिला प्रशासन ने पहल तेज कर दी है। इसके तहत जिले के 10 प्रमुख तालों के संरक्षण, विकास और प्रबंधन के लिए एक व्यापक मास्टर प्लान तैयार किया जाएगा। साथ ही इन आर्द्रभूमियों की वैज्ञानिक मैपिंग कर विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की उच्च स्तरीय समिति गठित की जाएगी।
यह निर्णय जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर की अध्यक्षता में आयोजित जिला आर्द्रभूमि समिति की विशेष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक में लिया गया। बैठक का संचालन जिला आर्द्रभूमि समिति के सचिव एवं प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) ने किया। बैठक में जिले की प्राकृतिक जल संरचनाओं के संरक्षण तथा उन्हें रामसर साइट के मानकों के अनुरूप विकसित करने पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक में ऑर्किड विश्वविद्यालय, सिक्किम; दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय; वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया); हिमालयी पर्यावरण संस्थान, देहरादून; वाटर पीस इंस्टीट्यूट, देहरादून; सीडब्ल्यूपी, गाजियाबाद तथा पीपुल साइंस इंस्टीट्यूट, देहरादून सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों को विशेषज्ञ समिति में शामिल करने का निर्णय लिया गया।
पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. कल्पना अरोड़ा को जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) योजना तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं, जिले के अन्य बड़े तालाबों को अधिसूचित कराने के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
बैठक में डॉ. उमर सैफ ने ‘प्लानिंग एवं स्टेकहोल्डर फ्रेमवर्क’ विषय पर प्रस्तुतीकरण दिया। जिलाधिकारी ने निर्देश दिया कि तालों एवं उनके आसपास के क्षेत्रों को चरणबद्ध तरीके से जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) मॉडल के अनुरूप विकसित किया जाए, ताकि अशोधित अपशिष्ट जल आर्द्रभूमियों तक न पहुंच सके।
आर्द्रभूमि समिति के विश्लेषण के अनुसार जिले की 10 प्रमुख आर्द्रभूमियों को क्षेत्रफल के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। वृहद श्रेणी में बांसगांव ताल (44.26 हेक्टेयर), मनखोटही ताल (41.81 हेक्टेयर) और तुर्कहा ताल (38.98 हेक्टेयर) शामिल हैं।
मध्यम श्रेणी में खैरी तालाब (26.17 हेक्टेयर), राजमंदिर ताल (25.11 हेक्टेयर) तथा टिकर ताल (16.55 हेक्टेयर) को रखा गया है। वहीं, बड़हरा ताल, सूर्या ताल, कुंदुर ताल और पिपरा माफी ताल को सूक्ष्म आर्द्रभूमि श्रेणी में शामिल किया गया है।
अधिकारियों ने बताया कि ये आर्द्रभूमियां मानसूनी जल संचयन, बाढ़ नियंत्रण, मृदा संरक्षण, जल शोधन तथा भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनका संरक्षण पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ जैव विविधता के संरक्षण के लिए भी आवश्यक है।
आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत इन क्षेत्रों में अतिक्रमण, भूमि उपयोग परिवर्तन, अशोधित सीवेज का निस्तारण, प्लास्टिक एवं ठोस अपशिष्ट का डंपिंग, नए प्रदूषणकारी उद्योगों की स्थापना तथा परिसंकटमय पदार्थों के भंडारण पर प्रतिबंध रहेगा।
जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने कहा कि कुशीनगर की आर्द्रभूमियां जिले की पारिस्थितिक एवं सांस्कृतिक विरासत हैं। रामसर साइट के रूप में मान्यता मिलने से इन तालों को वैश्विक स्तर पर संरक्षण प्राप्त होगा तथा क्षेत्र में सतत विकास के नए अवसर भी सृजित होंगे।








