उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों दलित वोटों की बिसात पर सियासी मात देने का खेल तेजी से चल रहा है। राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां फिट करना शुरू कर दिया है। यूपी की कुल आबादी में करीब 21 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले दलित वर्ग को अपने पाले में खींचने के लिए समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पूरी ताकत झोंक दी है।
सपा की रणनीति: हारी हुई सीटों पर खास फोकस
इसी सियासी रणनीति के तहत अखिलेश यादव ने आज प्रदेश की सभी आरक्षित विधानसभा सीटों के चुनिंदा पदाधिकारियों के साथ एक अहम मंथन किया। समाजवादी पार्टी का खास तौर पर उन 65 रिजर्व सीटों पर फोकस है, जहां पिछले चुनाव में पार्टी को शिकस्त का मुंह देखना पड़ा था। सपा ने प्लान बनाया है कि हर एक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 27 हजार नए वोट जोड़े जाएं। इसके अलावा, अखिलेश लगातार अंबेडकर की टूटी मूर्तियों और संविधान बचाने के मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं। पार्टी के अंदरूनी गलियारों में माना जा रहा है कि बसपा सुप्रीमो मायावती के पारिवारिक कलह में उलझे होने का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए सपा नीले गमछे और छात्र सभा की नीली ड्रेस जैसे प्रतीकों के जरिए दलितों को संदेश दे रही है।
ब्रजेश पाठक का पलटवार: ‘चाहे पूरा शरीर नीला कर लें…’
उधर, समाजवादी पार्टी के इस दलित प्रेम और घेराबंदी की काट निकालने में बीजेपी भी पीछे नहीं है। प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने सपा के इन प्रयासों पर करारा तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश यादव चाहे अपना पूरा शरीर नीला रंग लें, फिर भी दलित समुदाय कभी समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देने वाला। लोकसभा चुनाव 2024 में हुए नुकसान से सबक लेते हुए बीजेपी अब डैमेज कंट्रोल में जुटी है। योगी सरकार ने अंबेडकर समेत तमाम दलित महापुरुषों की मूर्तियों, पार्कों और स्मारकों की सुरक्षा व सौंदर्यकरण के लिए 400 करोड़ रुपये का तगड़ा बजट अलॉट किया है। इसके तहत हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 10 स्मारकों के आसपास बाउंड्री और ग्रिल लगवाने का काम किया जाएगा।
बदल रहा है यूपी का दलित वोट समीकरण
कभी मायावती के अटूट गढ़ माने जाने वाले दलित वोटों में अब बड़ी सेंधमारी हो चुकी है। साल 2014 के बाद से एक बड़ा वर्ग बसपा से छिटककर बीजेपी के पाले में खड़ा नजर आया। हालांकि आंकड़ों की बाजीगरी देखें तो 2024 के चुनाव में मायावती के पास उनका कोर जाटव वोट (करीब 44 फीसदी) तो टिका रहा, लेकिन गैर-जाटव दलितों का झुकाव तेजी से इंडिया गठबंधन की तरफ शिफ्ट हुआ है, जहां उन्हें करीब 56 फीसदी वोट मिले।
अब यही वजह है कि एक तरफ अखिलेश यादव इस खिसकते हुए और नाराज दलित वोट बैंक को अपनी झोली में डालने के लिए छटपटा रहे हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी भी अपने हाथ से फिसले वोटों को वापस पाने के लिए मास्टरस्ट्रोक खेलने में जुटी है। आने वाले चुनाव में यह दलित वोट बैंक ही तय करेगा कि यूपी के सिंहासन पर कौन बैठेगा।





















