गरीब परिवार के लिए घर केवल चार दीवारें और छत नहीं, बल्कि सुरक्षा, गरिमा और भविष्य का आधार है। जिसके पास अपना घर नहीं, उसके लिए बरसात चिंता, सर्दी असुरक्षा और गर्मी तपती दीवारों व टपकती छत का नाम बन जाती है। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास योजना को केवल निर्माण कार्यक्रम मानना अधूरा दृष्टिकोण होगा। यह अंतिम व्यक्ति के सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़ा दायित्व है।
बड़े लक्ष्य, कठिन जमीन
ग्रामीण क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत 3 अगस्त 2026 तक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 4.18 करोड़ आवासों का लक्ष्य निर्धारित था। इनमें 3.91 करोड़ आवास स्वीकृत हुए, जबकि 3.12 करोड़ पूरे हो चुके थे और 79 लाख निर्माणाधीन थे। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि 4.21 करोड़ घर बन चुके हैं। योजना का उद्देश्य ऐसे गरीब परिवारों को सुरक्षित पक्का घर उपलब्ध कराना है, जिनके पास ऐसा आवास नहीं है। सामान्य क्षेत्रों में 1.20 लाख रुपये और कठिन व पर्वतीय क्षेत्रों में 1.30 लाख रुपये की सहायता निर्धारित है।
लेकिन चुनौती केवल सहायता राशि तक सीमित नहीं है। भूमिहीन परिवार, महंगी निर्माण सामग्री, बढ़ती मजदूरी और जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाएं इस सहायता से घर पूरा करना मुश्किल बना सकती हैं। यहीं सरकारी योजना और जमीन की हकीकत के बीच का अंतर सामने आता है। केंद्र सरकार के अनुसार देरी के प्रमुख कारणों में भूमिहीन लाभार्थियों को भूमि देने में विलंब, निर्माण सामग्री की कमी, राज्य कोष से धन जारी होने में देरी, लाभार्थी का पलायन या असहमति और अन्य प्रशासनिक अड़चनें शामिल हैं।
देरी का असली अर्थ
समस्या केवल धन की नहीं, बल्कि व्यवस्था की गति, समन्वय और पहुंच की भी है। उत्तर प्रदेश में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की लेखापरीक्षा इस चुनौती को गंभीर बनाती है। रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2023 के बीच 79 प्रतिशत मामलों में पहली किस्त निर्धारित सात कार्यदिवस के भीतर जारी नहीं हुई। अगस्त 2024 तक 11,031 ऐसे लाभार्थी थे, जिनके घर पूरे हो चुके थे, लेकिन 20.18 करोड़ रुपये की सहायता जारी नहीं की गई थी।
गरीब परिवार के लिए यह महज सरकारी ‘विलंब’ नहीं है। इसका मतलब अधूरी दीवार, अधूरी छत और लंबा इंतजार भी हो सकता है। जब सरकारी प्रक्रिया धीमी और अस्पष्ट होती है, तो बिचौलियों के लिए जगह बनने का खतरा बढ़ जाता है। बिना प्रमाण यह कहना उचित नहीं होगा कि हर गांव में निश्चित घूस ली जाती है या हर अधिकारी कमीशन लेता है। हालांकि, व्यवस्था में सामने आई अनियमितताओं को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
जटिल प्रक्रिया और बिचौलियों का खतरा
उत्तर प्रदेश की लेखापरीक्षा में जांच किए गए क्षेत्रों में 9.52 करोड़ रुपये की सहायता 1,838 अपात्र लाभार्थियों को दिए जाने का उल्लेख है। सितंबर 2024 तक इसमें से 2.62 करोड़ रुपये की वसूली नहीं हो सकी थी। वहीं 159 मामलों में 86.20 लाख रुपये की किस्तें इच्छित लाभार्थियों के बजाय अन्य व्यक्तियों के खातों में पहुंचीं, जिन्हें संदिग्ध साइबर अपराध से जोड़ा गया। ये आंकड़े पूरे तंत्र को भ्रष्ट घोषित करने के लिए नहीं, बल्कि यह सवाल उठाने के लिए पर्याप्त हैं कि गरीब के नाम पर स्वीकृत धन की सुरक्षा और निगरानी कितनी प्रभावी है।
भूमिहीन परिवार: सबसे कठिन परीक्षा
योजना की सबसे बड़ी चुनौतियों में भूमिहीन परिवार शामिल हैं। लेखापरीक्षा में सामने आया कि उत्तर प्रदेश सरकार स्थायी प्रतीक्षा सूची में शामिल भूमिहीन लाभार्थियों की कुल संख्या का आंकड़ा उपलब्ध नहीं करा सकी। जब लाभार्थी के पास भूमि ही नहीं है, तो केवल आवास स्वीकृत होने से उसे छत नहीं मिल सकती। भूमि, स्वीकृति, धन और निर्माण—इन सभी चरणों को समयबद्ध तरीके से जोड़ना होगा।
मार्च 2025 तक 20,215 ऐसे ग्रामीण आवास भी मिले, जो निर्धारित 12 महीने बाद भी अधूरे थे, जबकि इनके लिए 134.51 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके थे। कागज पर स्वीकृति, खाते में धन और सूची में नाम होने के बावजूद यदि भूमि, किस्त, सत्यापन या फाइल अटकी हुई है, तो गरीब के लिए घर अब भी सपना ही रहता है।
शहरी आवास: निर्माण से आगे उपयोग
शहरी क्षेत्र की तस्वीर भी पूरी तरह सरल नहीं है। 13 जुलाई 2026 तक प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी और उसके दूसरे चरण के तहत 1.27 करोड़ से अधिक आवास स्वीकृत हुए थे। इनमें 1.21 करोड़ से अधिक निर्माणाधीन स्तर तक पहुंच चुके थे और 99.07 लाख पूरे होकर लाभार्थियों को सौंपे जा चुके थे। इसलिए लगभग आधे शहरी आवास खाली होने का दावा तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।
हां, कुछ स्थानों पर आवासों के उपयोग में देरी या कमी हो सकती है। भूमि, आधारभूत सुविधाएं, लाभार्थी का अंश, स्थान और रोजगार से दूरी जैसे कारण वास्तविक उपयोग को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए सफलता केवल मकान बनने से नहीं, बल्कि उसके उपयोग से तय होनी चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि क्या लाभार्थी उसमें रह रहा है, क्या पानी-बिजली उपलब्ध है और क्या घर उसके रोजगार तथा जीवन की जरूरतों से जुड़ा है।
सफलता का सही पैमाना
आवास योजना की सफलता केवल स्वीकृतियों और निर्माण की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। असली सवाल यह है कि कितने जरूरतमंद परिवारों को वास्तव में सुरक्षित घर मिला, कितने परिवार उनमें रह रहे हैं और कितने लाभार्थी बिना दलाल, सिफारिश, रिश्वत या अनावश्यक चक्कर के अपने अधिकार तक पहुंच पाए।
सरकार ने लक्ष्य बढ़ाए हैं, योजनाओं का विस्तार किया है और ग्रामीण क्षेत्र के लिए दो करोड़ अतिरिक्त आवासों को मंजूरी दी है। यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन संख्या के साथ पारदर्शिता, समयबद्धता और जवाबदेही भी बढ़नी चाहिए। गरीब को घर चाहिए, कागज पर दर्ज घर नहीं।
सुधार की दिशा: योजना से अधिकार तक
ऐसी व्यवस्था आवश्यक है जिसमें पात्रता की जांच पारदर्शी हो, लाभार्थी सूची सार्वजनिक और सत्यापन योग्य हो, किस्त समय पर जारी हो, भूमिहीन परिवारों को भूमि उपलब्ध कराई जाए और निर्माण की निष्पक्ष निगरानी हो। साथ ही शिकायतों का गांव से जिला स्तर तक समयबद्ध समाधान और आवेदन से निर्माण तक लाभार्थी को स्पष्ट जानकारी मिलना जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गरीब को अपने अधिकार के लिए बिचौलिये के दरवाजे पर न जाना पड़े। घूसखोरी का मनगढ़ंत प्रतिशत लिखकर व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना आसान है। प्रमाणित अनियमितताओं के आधार पर सुधार की मांग करना कठिन, लेकिन अधिक ईमानदार पत्रकारिता है।
भरोसे की छत
घर की पहली ईंट ईंट-पत्थर से नहीं, भरोसे से टिकती है। जिस दिन अंतिम व्यक्ति को घर पाने के लिए जेब गरम नहीं करनी पड़ेगी, सिफारिश नहीं खोजनी पड़ेगी, दलाल का सहारा नहीं लेना पड़ेगा और फाइल के पीछे महीनों नहीं दौड़ना पड़ेगा, उस दिन आवास योजना सामाजिक न्याय की जीवित तस्वीर बन जाएगी।
हर पात्र परिवार के सिर पर अपनी छत हो,
हर घर में सुरक्षा हो,
हर परिवार में सम्मान हो,
और किसी गरीब के सपनों की छत
दलाल, लालफीताशाही या भ्रष्ट व्यवस्था की मुट्ठी में कैद न हो।
लेखक — डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत





















