वाराणसी के श्रीविद्या मठ में आयोजित नवरात्र कार्यक्रम के दौरान परमाराध्य उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज ने साधकों को अहंकार से दूर रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जब व्यक्ति में अहंकार आ जाता है, तो उसकी लक्ष्मी और श्री समाप्त होने लगती है। यहां लक्ष्मी का आशय केवल धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि शोभा, ऐश्वर्य और सद्गुणों से भी है।
अहंकार के दुष्परिणाम समझाने के लिए शंकराचार्य जी महाराज ने देवराज इंद्र से जुड़ा पौराणिक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार महर्षि दुर्वासा ने इंद्र को दिव्य पारिजात माला भेंट की थी। लेकिन इंद्र ने अहंकारवश उस माला का सम्मान करने के बजाय उसे अपने वाहन ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। ऐरावत ने माला को सूंड से नीचे गिरा दिया और पैरों तले कुचल दिया। इस घटना को महर्षि दुर्वासा ने अपने और भगवान के प्रसाद का अपमान माना।
शंकराचार्य जी के अनुसार, महर्षि दुर्वासा ने इस पर इंद्र को श्रीहीन होने का शाप दिया, जिसके परिणामस्वरूप स्वर्गलोक से श्री, कांति और वैभव लुप्त हो गए। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने साधकों को संदेश दिया कि व्यक्ति को अपने पद, प्रतिष्ठा या अधिकार का कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। विनम्रता और सद्गुण ही मनुष्य की वास्तविक शोभा हैं।
श्रीविद्या मठ में इन दिनों ‘श्रीविद्या साधना शिविर’ का आयोजन किया जा रहा है। यहां स्फटिक मणि से निर्मित भगवती राजराजेश्वरी की प्रतिमा विराजमान है और देशभर से साधक व श्रद्धालु दीक्षा तथा साधना की बारीकियां सीखने पहुंच रहे हैं। शिविर में सुबह छह से आठ बजे और शाम चार से सात बजे तक साधना शिविर, सुबह आठ से 11 बजे तक भगवती की महापूजा तथा शाम को शंकराचार्य जी का ‘ललितोपाख्यान’ पर प्रवचन होता है। आचार्य पंडित वीरेश्वर दातार के आचार्यत्व में वैदिकों द्वारा नित्य नवचण्डी पाठ किया जा रहा है, जबकि कलश पूजन ब्रह्मचारी परमात्मानन्द जी करते हैं। प्रतिदिन विभिन्न द्रव्यों से सहस्रनाम, त्रिशती और अष्टोत्तर के माध्यम से अर्चन भी किया जाता है। यह जानकारी शंकराचार्य जी महाराज के मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने दी।





















