डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है
सच कहा आपने मित्र। यह संसार असीम है, अनंत है, विशाल है। इसमें पर्वत भी हैं और सागर भी, अंधकार भी है और प्रकाश भी, कंटक भी हैं और कुसुम भी। इस संसार में नाना प्रकार के मार्ग विद्यमान हैं, नाना प्रकार के लोग निवास करते हैं, और नाना प्रकार की कथाएं प्रतिदिन लिखी जाती हैं। फिर भी मनुष्य के जीवन की सबसे गहरी पीड़ा, सबसे तीव्र आघात प्रायः बाहर से नहीं आता। वह आता है अपनों से।
जिन्हें हम अपना सर्वस्व मानते हैं, जिनके सुख में हम अपना सुख देखते हैं, जिनकी एक मुस्कान के लिए हम रात-दिन परिश्रम करते हैं, उन्हीं के दो-चार शब्द कभी-कभी हमारे सबसे बड़े स्वप्नों को बेध देते हैं। वे ऐसा जान-बूझकर नहीं करते। उनके पीछे कोई द्वेष नहीं होता। परंतु उनकी सोच की सीमा, उनका अपना भय, उनका अनुभवहीन तर्क, और समाज के प्रति उनका मोह हमारे साहस को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर देता है।
वे प्रतिदिन जाने-अनजाने हमारे संकल्पों से छेड़छाड़ करते हैं। जब हम कोई नया विचार लेकर उठते हैं तो पहला प्रश्न वही करते हैं। यह संभव नहीं है। यह तुम्हारे बस की बात नहीं। तुम स्थिर नौकरी छोड़कर यह जोखिम क्यों ले रहे हो। लोग क्या कहेंगे। रिश्तेदार क्या सोचेंगे। पहले घर देखो, फिर सपने देखना। और हम सुनते-सुनते, टूटते-टूटते अपने ही स्वप्नों पर संदेह करने लगते हैं। यही वह सूक्ष्म क्षण है जहां बाहरी पराजय नहीं होती, परंतु भीतर ही भीतर पराजय का बीज बो दिया जाता है। एक ऐसा बीज जो अंकुरित होकर आत्मविश्वास के वृक्ष को सुखा देता है।
परंतु मित्र, इस स्थान पर रुककर विचार करो। क्या वास्तव में समस्या संसार है, या समस्या संसार को देखने का हमारा तरीका है। क्या आवश्यकता लोगों को बदलने की है, या आवश्यकता स्वयं अपने दृष्टिकोण को बदलने की है। दृष्टि वही रहती है, आंखें वही रहती हैं, सामने खड़े लोग भी वही रहते हैं, परिस्थितियां भी वही रहती हैं। केवल देखने का कोण बदल जाता है और संपूर्ण चित्र बदल जाता है।
जब हम दूसरों की अपेक्षा को अपना अंतिम मानदंड मानना छोड़ देते हैं, जब हम यह समझ जाते हैं कि हर व्यक्ति अपने अनुभव, अपने भय और अपनी सीमाओं से बोलता है, तब उनके शब्दों का विष हमें स्पर्श नहीं करता। तब हम आलोचना को ईंधन बना लेते हैं और उपेक्षा को सीढ़ी। तब हम यह जान जाते हैं कि निंदा वास्तव में इस बात का प्रमाण है कि हम कुछ भिन्न कर रहे हैं। भीड़ कभी भीड़ की निंदा नहीं करती। नदी कभी नदी की धारा नहीं रोकती। विरोध तभी होता है जब हम सामान्य से हटकर असामान्य की ओर बढ़ते हैं।
इतिहास साक्षी है। जो आज व्यंग्य करते हैं, वे कल उसी व्यक्ति से प्रेरणा मांगते हैं। जो आज मार्ग रोकते हैं, वे कल उसी के साथ चलने की इच्छा रखते हैं। जो आज कहते हैं यह पागलपन है, वे कल कहते हैं हमने पहले ही कहा था कि तुम कर लोगे। ऐसा क्यों होता है। क्योंकि समय सबसे बड़ा प्रमाण है। समय कर्म की सच्चाई को छिपने नहीं देता। समय झूठ को उजागर करता है और सत्य को स्थापित करता है। इसलिए अपने लक्ष्य से दृष्टि मत हटाओ। मार्ग में निंदा होगी, उपहास होगा, अपनों की उदासीनता होगी, अकेलापन भी होगा। परंतु यह सब परीक्षा है। और परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले के लिए फल अवश्य मधुर होता है। कड़वे बीज से ही मीठा फल आता है।
इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कर्म हमारा हो और फल का भार ईश्वर पर हो। गीता का यही सार है। करि गोपाल की सोई होय। जब पुरुषार्थ हमारा हो और भरोसा उस परम शक्ति का हो, तो गिराने वाले चाहे जितने एकत्र हो जाएं, उठाने वाला एक ही पर्याप्त है। वह अंतर्मन की आवाज, वह अदृश्य शक्ति, वह गोपाल जो कण-कण में व्याप्त है, वह सदा हमारे साथ है। वह हमारे आंसू देखता है, हमारी रातों की नींद देखता है, हमारे मौन संघर्ष को देखता है। और वह कभी किसी सच्चे प्रयास को व्यर्थ नहीं जाने देता।
इसलिए अपनी सोच को अपना सबसे बड़ा कवच बनाकर रखो। इसे किसी की कड़वी बात से मलिन मत होने दो। इसे किसी की तुलना से छोटा मत करो। इसे किसी की जलन से विषाक्त मत होने दो। क्योंकि जिस दिन आपकी सोच अडिग हो जाएगी, जिस दिन आप अपने निर्णय के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाएंगे, उसी दिन आपका भविष्य भी अडिग हो जाएगा। संसार बाहर से नहीं बदलता, वह भीतर से बदलता है। और भीतर का परिवर्तन दृष्टिकोण बदलने से आता है।
दृष्टिकोण बदलने का अर्थ पलायन नहीं है। इसका अर्थ है जिम्मेदारी लेना। इसका अर्थ है यह स्वीकार करना कि मेरे जीवन की दिशा के लिए मैं स्वयं उत्तरदायी हूं। दूसरों की बात सुनो, परंतु अंतिम निर्णय अपना करो। सलाह लो, परंतु स्वीकृति मत मांगो। सहयोग मांगो, परंतु अनुमोदन मत मांगो। क्योंकि स्वप्न तुम्हारे हैं, पीड़ा तुम्हारी होगी, और विजय भी तुम्हारी ही होगी।
याद रखो, बीज को अंधकार में ही फूटना पड़ता है। पत्थर को तराशने के लिए चोटें सहनी पड़ती हैं। स्वर्ण को तपना पड़ता है। यदि अभी कष्ट है तो समझो निर्माण हो रहा है। यदि अभी विरोध है तो समझो तुम सही दिशा में हो। यदि अभी अकेले हो तो समझो तुम भीड़ से अलग होकर कुछ विशेष बनने जा रहे हो।
इसलिए उठो। अपने स्वप्नों को फिर से उठाओ। धूल झाड़ो। और एक बार फिर चल पड़ो। इस बार और अधिक दृढ़ता से, और अधिक शांति से, और अधिक विश्वास के साथ। लोगों की बातें आएंगी और जाएंगी। परंतु तुम्हारा कर्म रहेगा। तुम्हारी निष्ठा रहेगी। और अंत में तुम्हारी विजय रहेगी।
तुम्हारे लिए मेरी अनंत शुभकामनाएं हैं मित्र। ईश्वर करे तुम्हारे स्वप्न केवल पूरे ही न हों, वे समाज के लिए दीपक बनें। तुम्हारी सफलता से और भी लोग साहस पाएं। तुम्हारे जीवन में प्रकाश बढ़े, तुम्हारे मन में शांति रहे, तुम्हारे कर्म में निरंतरता बनी रहे। और जब कभी थकान लगे, जब कभी मन विचलित हो, तो केवल इतना स्मरण कर लेना कि दृष्टिकोण बदलते ही दिशा स्वयं बदल जाती है। करि गोपाल की सोई होय।







