आपूर्ति कार्यालय बना प्राइवेट कर्मियों का ‘पावर सेंटर’
सरकारी फाइलों पर बाहरी हाथ, जिम्मेदार मौन; सप्लाई इंस्पेक्टर और डीएसओ की भूमिका पर उठे सवाल
सुलतानपुर। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति तथा सरकारी कार्यालयों में बाहरी व्यक्तियों से कार्य लेने पर प्रतिबंध के बावजूद सुलतानपुर का जिला आपूर्ति कार्यालय नियमों को चुनौती देता नजर आ रहा है। सदर तहसील परिसर स्थित कार्यालय में सरकारी कार्यों के संचालन में कथित रूप से निजी व्यक्तियों की संलिप्तता के आरोप सामने आए हैं, जिससे सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और गोपनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।
सरकारी कार्यों में निजी व्यक्तियों की भूमिका का आरोप
सूत्रों के अनुसार, कार्यालय में राशन कार्डों से संबंधित प्रक्रियाएं, लाभार्थियों के अभिलेखों का संधारण तथा अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों का कार्य कथित तौर पर निजी कंप्यूटर ऑपरेटरों द्वारा किया जा रहा है। आरोप है कि कुड़वार ब्लॉक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी भी एक निजी व्यक्ति को सौंप दी गई है।
शासनादेशों के अनुपालन पर उठे सवाल
प्रदेश सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी सरकारी कार्यालय में बाहरी व्यक्तियों से सरकारी कार्य नहीं कराया जाएगा। ऐसे में यदि संवेदनशील अभिलेख और सरकारी डाटा निजी हाथों में हैं, तो यह शासनादेशों की अवहेलना के साथ-साथ सरकारी गोपनीयता और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
जिम्मेदारों की चुप्पी से बढ़ी चर्चाएं
मामले में संबंधित अधिकारियों का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका। अधिकारियों की चुप्पी के कारण मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं।
उठ रहे हैं ये सवाल
- आखिर किसके आदेश पर निजी व्यक्तियों को सरकारी कार्यालय में बैठाकर कार्य कराया जा रहा है?
- कुड़वार ब्लॉक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र का कार्यभार किसी बाहरी व्यक्ति को किस नियम के तहत सौंपा गया?
- क्या जिला पूर्ति अधिकारी (डीएसओ) को इसकी जानकारी है अथवा यह सब उनकी निगरानी में हो रहा है?
- सरकारी रिकॉर्ड और लाभार्थियों की जानकारी निजी हाथों में सौंपना क्या नियमों का उल्लंघन नहीं है?
जांच और कार्रवाई पर टिकी निगाहें
यदि लगाए जा रहे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ जाएगा। अब यह देखना होगा कि जिला प्रशासन और उच्चाधिकारी इस प्रकरण की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करते हैं या मामला विभागीय स्तर तक ही सीमित रह जाता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शासन के आदेशों के अनुपालन की जिम्मेदारी संभालने वाले तंत्र पर ही सवाल उठ रहे हों, तो जवाबदेही किससे तय की जाएगी?







