नई दिल्ली। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशन बंद करने, इंटरनेट सेवाएं रोकने और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली में मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलें, इंटरनेट सेवा बहाल रहे और लोगों की आवाजाही में बाधा न डाली जाए। कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर मंगलवार तक जवाब मांगा है। साथ ही, पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के कथित उल्लंघन पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।
इस बीच, CJP नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को रविवार सुबह करीब 10 बजे 23 घंटे की हिरासत के बाद रिहा कर दिया गया। तीनों को दिल्ली कैंट स्थित एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया गया था। उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार की शर्त पर रिहा किया गया। इसके लिए तीनों ने 50-50 हजार रुपये का जमानती मुचलका भरा।
मेट्रो स्टेशन बंद करने पर DMRC से मांगा नक्शा
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) से उन मेट्रो स्टेशनों का नक्शा पेश करने को कहा है, जिन्हें प्रदर्शन के दौरान बंद किया गया था। कोर्ट के सामने बताया गया कि शुरुआत में 57 स्टेशन बंद करने का प्रस्ताव था, जबकि बाद में 45 स्टेशन बंद किए गए। इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि यदि मेट्रो मार्ग के बीच के स्टेशन बंद कर दिए जाएं और दोनों छोर के स्टेशन खुले रहें, तो यात्री यात्रा कैसे कर पाएंगे।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि शनिवार रात 10 बजे तक सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए थे और इंटरनेट सेवाएं भी बहाल कर दी गई थीं। उन्होंने आश्वासन दिया कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों के कामकाज में बाधा नहीं आने दी जाएगी।
बिना कानूनी प्रक्रिया किसी को हिरासत में न लें
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिल्ली में लोगों की आवाजाही कानून के अनुसार सुचारू रूप से जारी रहनी चाहिए। कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने शांतिपूर्ण और बिना हथियार प्रदर्शन करने वाले लोगों के अधिकारों पर भी जोर दिया।
कोर्ट ने अपने परिसर और आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू होने संबंधी नोटिस और बोर्ड हटाने का निर्देश दिया, यदि वे अब तक नहीं हटाए गए हैं। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों में आने-जाने को लेकर किसी तरह की आशंका नहीं रहनी चाहिए।
प्रदर्शनकारियों की हिरासत को दी गई चुनौती
मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने दो याचिकाएं आई हैं। एक याचिका में 9 अक्टूबर के आदेश का पालन नहीं करने का आरोप लगाते हुए केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और DMRC की अध्यक्ष डी. थारा के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई है।
दूसरी याचिका में विपक्षी नेताओं और प्रदर्शनकारियों को एहतियातन हिरासत में लेने की कार्रवाई को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एहतियातन हिरासत का इस्तेमाल शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की। उन्होंने कहा कि मामला केवल वकीलों के अधिकारों का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का है। याचिकाकर्ताओं ने निहत्थे नागरिकों को हिरासत में लेने, महिला प्रदर्शनकारियों से बदसलूकी और पुलिसकर्मियों की पहचान संबंधी चिह्न नहीं होने के आरोप भी लगाए हैं।
एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त
दिल्ली पुलिस के अनुसार, अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को BNSS की धाराओं 126 और 170 के तहत एहतियातन हिरासत में लिया गया था। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद तीनों को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और 50-50 हजार रुपये के जमानती मुचलके पर रिहा कर दिया गया।
मुचलके की शर्तों का उल्लंघन होने पर जमानत की रकम जब्त हो सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि तीनों एक साल तक प्रदर्शन नहीं कर सकते। किसी नए अपराध की स्थिति में पुलिस अलग से कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
दादी के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके अभिजीत
रिहाई के बाद अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके ने कहा कि यदि उनके बेटे को एक दिन पहले रिहा कर दिया गया होता, तो वह अपनी दादी के अंतिम संस्कार में शामिल हो सकता था। अब वह आखिरी बार उनका चेहरा भी नहीं देख पाएगा।
CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने बताया कि पार्टी रविवार दोपहर दो बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगी। वहीं, दिल्ली पुलिस ने शनिवार के प्रदर्शन के संबंध में 20 से अधिक एफआईआर दर्ज किए जाने की जानकारी दी है। ये मामले कथित तौर पर सरकारी काम में बाधा डालने, कानून हाथ में लेने और पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट से संबंधित हैं।





















