कहा- अमेरिका अपना इतिहास न भूले
नई दिल्ली। अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को लेकर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की टिप्पणी पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है। विदेश मंत्रालय ने विदेशी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ बताने वाली शब्दावली को बेहद आपत्तिजनक और अनुचित करार दिया। भारत ने कहा कि ऐसी भाषा अमेरिकी अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास में भारतीय पेशेवरों के योगदान की अनदेखी करती है। मंत्रालय ने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका का इतिहास प्रवासियों के योगदान से जुड़ा रहा है।
भारतीय पेशेवरों के योगदान का दिया हवाला
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवर अत्यधिक शिक्षित और कुशल हैं। वे शोध, तकनीकी विकास, नवाचार, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। मंत्रालय ने कहा कि प्रतिभाशाली लोगों की एक देश से दूसरे देश में आवाजाही से भारत और अमेरिका, दोनों को लाभ होता है।
भारत ने यह भी कहा कि गुलामी और औपनिवेशिक दौर की दर्दनाक यादें ताजा करने वाली शब्दावली का इस्तेमाल दुर्भाग्यपूर्ण है। मंत्रालय के अनुसार, प्रवासियों ने पीढ़ियों से अमेरिका के कारोबार और आर्थिक प्रगति में योगदान दिया है। इसलिए भारतीय पेशेवरों के बारे में इस तरह की टिप्पणी उनके योगदान को नजरअंदाज करती है।
जेडी वेंस ने क्या कहा था?
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने आठ अक्तूबर को वीजा धोखाधड़ी से जुड़े एक संवाददाता सम्मेलन में एच-1बी वीजा और विदेशी कर्मचारियों की भर्ती पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी कर कम वेतन पर विदेशी कामगारों को नियुक्त करती हैं, जिससे स्थानीय कर्मचारियों के रोजगार और वेतन पर असर पड़ता है।
वेंस ने दावा किया कि समान पद पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारी की तुलना में एच-1बी वीजा पर काम करने वाला कर्मचारी सालाना 20,000 डॉलर कम कमा रहा है। उन्होंने विदेशी आउटसोर्सिंग कंपनियों के जरिए नियुक्त कर्मचारियों के मामले में यह अंतर 48,000 डॉलर तक बताया। ये आंकड़े वेंस के दावे हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
वेंस ने विदेशी कर्मचारियों के लिए ‘इंडेंटर्ड सर्वेंट्स’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिसका आशय बंधुआ मजदूरों से है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन देकर अमेरिकी कामगारों की जगह नियुक्त करती हैं और इससे अपना मुनाफा बढ़ाती हैं।
PERM कार्यक्रम पर रोक से ग्रीन कार्ड प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिकी प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी सहित आठ कंपनियों को स्थायी श्रम प्रमाणन यानी PERM कार्यक्रम से निलंबित करने की कार्रवाई की है। अमेरिकी अधिकारियों ने इस कदम के पीछे संभावित वीजा धोखाधड़ी और अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार पर पड़ने वाले प्रभावों से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया है। जांच या आरोप अपने आप में किसी कंपनी के दोषी साबित होने का प्रमाण नहीं हैं।
PERM अमेरिकी कंपनियों के जरिए पात्र विदेशी कर्मचारियों को ग्रीन कार्ड दिलाने की प्रक्रिया का एक अहम चरण है। इस पर रोक का अर्थ एच-1बी वीजा कार्यक्रम को बंद करना नहीं है।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि PERM और एच-1बी वीजा अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। PERM आवेदन निलंबित होने से पहले से वैध एच-1बी वीजा या उसके धारकों और उनके आश्रितों की कानूनी स्थिति अपने आप प्रभावित नहीं होती। हालांकि, प्रभावित कंपनियों के पात्र कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया में बाधा आ सकती है।
भारत-अमेरिका के साझा हितों पर जोर
भारत का कहना है कि कुशल पेशेवरों की आवाजाही दोनों देशों के आर्थिक हितों से जुड़ी है। भारतीय प्रतिभाओं को अमेरिका में अवसर मिलते हैं, जबकि अमेरिकी कंपनियों को तकनीकी विशेषज्ञता, शोध और नवाचार का लाभ मिलता है। इससे कारोबार की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के साथ रोजगार सृजन में भी मदद मिल सकती है।
विदेश मंत्रालय ने उम्मीद जताई कि इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्ष भारतीय पेशेवरों के योगदान और प्रतिभा के अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान से होने वाले लाभ को समझेंगे।





















