बड़े ऋण, बैंकिंग व्यवस्था, राइट-ऑफ का सच और जवाबदेही का कठिन सवाल
प्रस्तावना : कर्ज से बड़ा सवाल है जवाबदेही का
गाँव की चौपाल पर एक दिन चर्चा छिड़ी। एक किसान बोला, “साहब! बैंक से थोड़ा कर्ज लिया था। फसल खराब हो गई, किस्त नहीं भर पाया। बैंक वाले घर तक पहुँच गए। नोटिस आया, फोन आए, जमीन की चिंता अलग।”
तभी दूसरे व्यक्ति ने सवाल किया, “और जब किसी बड़े कारोबारी का हजारों करोड़ रुपये का कर्ज नहीं लौटता, तब क्या होता है?”
चौपाल पर सन्नाटा छा गया।
किसी ने कहा, “बड़े कारोबार में जोखिम भी बड़ा होता है। हर नुकसान धोखाधड़ी नहीं होता।”
एक बुजुर्ग ने बात आगे बढ़ाई, “बिल्कुल सही! लेकिन यदि नुकसान वास्तविक है तो उसकी जाँच होनी चाहिए और यदि जानबूझकर पैसा दूसरी जगह लगाया गया, संपत्ति छिपाई गई या बैंक को गुमराह किया गया, तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आखिर बैंक जनता के विश्वास पर ही तो चलते हैं।”
यहीं से असली प्रश्न जन्म लेता है। सवाल यह नहीं कि किसी कारोबारी का व्यवसाय क्यों डूबा। सवाल यह है कि ऋण किस आधार पर दिया गया, उसकी निगरानी कैसे हुई, संकट के संकेत कब मिले, वसूली के लिए क्या किया गया और अंततः नुकसान की जिम्मेदारी किसकी बनी?
राइट-ऑफ का अर्थ कर्जमाफी नहीं, लेकिन सवाल फिर भी बड़ा है
अक्सर समाचारों में सुनाई देता है कि बैंकों ने लाखों करोड़ रुपये के कर्ज राइट-ऑफ कर दिए। आम आदमी स्वाभाविक रूप से समझता है कि इतना पैसा माफ कर दिया गया। लेकिन यह समझ पूरी तरह सही नहीं है।
राइट-ऑफ मुख्यतः बैंक की लेखांकन प्रक्रिया है। इसके माध्यम से बैंक अपने बहीखातों से ऐसे खराब ऋणों को हटाते हैं जिनके संबंध में नियमानुसार प्रावधान किया जा चुका हो या जिनकी वसूली कठिन हो गई हो। इससे कर्जदार की कानूनी देनदारी अपने-आप समाप्त नहीं होती। बैंक वसूली की कार्रवाई जारी रख सकते हैं।
अर्थात राइट-ऑफ और कर्जमाफी दो अलग-अलग बातें हैं।
लेकिन इस तकनीकी अंतर के पीछे एक बड़ा आर्थिक प्रश्न छिपा है। यदि बैंक किसी ऋण को अपने खाते से हटा देता है, तो उस ऋण की गुणवत्ता, उससे जुड़ी पूँजी, बैंक के लाभ और भविष्य में ऋण देने की क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है? वसूली कितनी हुई? कितनी राशि अब भी बाकी है? और क्या ऋण स्वीकृति से लेकर वसूली तक हर स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई?
जनता को इन सवालों के स्पष्ट उत्तर चाहिए।
₹9.95 लाख करोड़ : आँकड़ा बड़ा है, इसलिए उसकी सही व्याख्या भी जरूरी है
अगस्त 2026 में संसद में प्रस्तुत सरकारी जानकारी के अनुसार, वित्तवर्ष 2014-15 से 2025-26 तक बड़े उद्योग एवं सेवा क्षेत्र की श्रेणी में बैंकों ने लगभग ₹9.95 लाख करोड़ के ऋण राइट-ऑफ किए। इसी जानकारी के अनुसार, इस श्रेणी में राइट-ऑफ की राशि 2018-19 में लगभग ₹1.49 लाख करोड़ के उच्च स्तर तक पहुँची थी और 2025-26 में घटकर लगभग ₹20,485 करोड़ रही।
यह आँकड़ा गंभीर विमर्श की माँग करता है। लेकिन इसे समझते समय तीन सावधानियाँ अनिवार्य हैं।
पहली, यह बड़े उद्योग एवं सेवा क्षेत्र की श्रेणी का आँकड़ा है, केवल किसी एक बैंक या केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का नहीं।
दूसरी, राइट-ऑफ की गई राशि का अर्थ यह नहीं कि उतनी ही राशि कर्जमाफी के रूप में दे दी गई।
तीसरी, अलग-अलग वर्षों में की गई वसूली पुराने वर्षों में राइट-ऑफ किए गए ऋणों से भी संबंधित हो सकती है। इसलिए किसी एक वर्ष की वसूली को उसी वर्ष के राइट-ऑफ से जोड़कर सीधा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं।
आँकड़ों की गंभीरता इसी में है कि हम उन्हें न तो छिपाएँ और न ही गलत अर्थ देकर प्रस्तुत करें।
बैंक का पैसा आखिर किसका है?
बैंक केवल इमारत, तिजोरी और कंप्यूटर का नाम नहीं है। बैंकिंग व्यवस्था लोगों की जमा पूँजी, संस्थागत पूँजी, नियामकीय अनुशासन और सार्वजनिक विश्वास पर खड़ी होती है।
जमाकर्ता अपनी मेहनत की कमाई बैंक में इसलिए रखता है कि आवश्यकता पड़ने पर उसका धन सुरक्षित मिले। बैंक उसी संसाधन को ऋण के रूप में आगे बढ़ाते हैं। इसीलिए ऋण देना केवल व्यावसायिक निर्णय नहीं, एक बड़ी सार्वजनिक जिम्मेदारी भी है।
यह कहना गलत होगा कि प्रत्येक राइट-ऑफ का पैसा सीधे जमाकर्ताओं की जेब से निकाल लिया गया। सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि राइट-ऑफ की प्रक्रिया अपने-आप तत्काल नकदी का बहिर्गमन नहीं करती, क्योंकि खराब ऋणों के लिए प्रावधान पहले किए जा सकते हैं।
फिर भी खराब ऋण बैंक के वित्तीय परिणाम, पूँजी की स्थिति और ऋण देने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मामले में यह प्रश्न सार्वजनिक वित्त और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही से भी जुड़ जाता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हर नुकसान जनता से वसूला गया। प्रश्न यह है कि सार्वजनिक विश्वास पर चलने वाली व्यवस्था में जोखिम का आकलन और नुकसान की जवाबदेही कितनी पारदर्शी है?
व्यवसाय का डूबना अपराध नहीं, लेकिन धोखाधड़ी को व्यवसाय कहना भी अपराध है
हर कारोबारी असफलता को धोखाधड़ी कहना अन्याय होगा। बाजार बदलता है, मांग घटती है, कच्चा माल महँगा होता है, तकनीक पुरानी पड़ती है, प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं और कभी-कभी अच्छे प्रबंधन के बावजूद कारोबार संकट में आ जाता है।
ऐसे मामलों में ऋण का पुनर्गठन, समाधान योजना या वैधानिक दिवाला प्रक्रिया आर्थिक पुनरुद्धार का रास्ता बन सकती है।
लेकिन दूसरी ओर ऐसे मामले भी होते हैं जहाँ कर्ज चुकाने की क्षमता होने के बावजूद जानबूझकर भुगतान नहीं किया जाता, ऋण की राशि निर्धारित उद्देश्य से हटाकर दूसरी जगह लगा दी जाती है, धन का दुरुपयोग या गबन होता है अथवा बैंक के पास गिरवी रखी संपत्ति को अनधिकृत तरीके से बेच दिया जाता है।
भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों में विलफुल डिफॉल्टर की पहचान के लिए निर्धारित मानदंड और प्रक्रिया मौजूद हैं। इसलिए किसी व्यक्ति या कंपनी को बिना जाँच और निर्धारित प्रक्रिया के जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाला घोषित नहीं किया जा सकता।
लेकिन यदि जाँच में जानबूझकर की गई चूक प्रमाणित हो, तो कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
न्याय का सिद्धांत स्पष्ट है—वास्तविक कारोबारी असफलता को अपराध न बनाया जाए और आर्थिक अपराध को व्यावसायिक असफलता बताकर छिपाया न जाए।
बैंक के भीतर भी जवाबदेही तय होनी चाहिए
मान लीजिए किसी कंपनी को हजारों करोड़ रुपये का ऋण दिया गया। ऋण स्वीकृत करने से पहले उसकी परियोजना का मूल्यांकन किसने किया? कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति किसने जाँची? गिरवी रखी संपत्ति का मूल्य किस आधार पर तय हुआ? ऋण की राशि निर्धारित उद्देश्य पर खर्च हो रही है या नहीं, इसकी निगरानी किसने की?
और जब भुगतान में देरी शुरू हुई, तब बैंक ने क्या कदम उठाए?
बैंकिंग व्यवस्था में एसएमए-0, एसएमए-1 और एसएमए-2 जैसी प्रारंभिक चेतावनी श्रेणियाँ मौजूद हैं। इनके माध्यम से भुगतान में 1 से 30 दिन, 31 से 60 दिन और 61 से 90 दिन की देरी वाले खातों में बढ़ते जोखिम की पहचान की जाती है।
अर्थात संकट को पहचानने और समय रहते कदम उठाने की व्यवस्था मौजूद है। अब यह देखना जरूरी है कि उसका वास्तविक उपयोग कितनी प्रभावशीलता से होता है।
यदि किसी ऋण में गलत मूल्यांकन, लापरवाही, मिलीभगत या समय पर कार्रवाई न करने की भूमिका सामने आती है, तो केवल कर्जदार ही नहीं, संबंधित निर्णय-प्रक्रिया की भी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
हर डूबे ऋण के लिए बैंक अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन हर मामले में बैंक की जिम्मेदारी से आँखें बंद कर लेना भी उचित नहीं।
एनसीएलटी और दिवाला प्रक्रिया : राहत किसे, नुकसान कितना?
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) का उद्देश्य संकटग्रस्त कंपनियों के समाधान के लिए समयबद्ध और व्यवस्थित प्रक्रिया उपलब्ध कराना है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) की प्रक्रिया के माध्यम से किसी कंपनी का समाधान हो सकता है या परिसमापन की स्थिति बन सकती है।
कई मामलों में समाधान योजना के तहत ऋणदाताओं को उनके कुल स्वीकार किए गए दावों से कम राशि प्राप्त होती है। इसे सामान्य भाषा में हेयरकट कहा जाता है।
लेकिन यहाँ भी तुलना का आधार समझना जरूरी है। समाधान योजना से प्राप्त राशि की तुलना कुल स्वीकार किए गए दावों, उचित मूल्य और परिसमापन मूल्य से की जा सकती है। ये तीनों अलग-अलग आधार हैं। एक प्रतिशत को दूसरे का प्रमाण बताना गलत होगा।
समाधान प्रक्रिया का उद्देश्य केवल अधिकतम वसूली करना नहीं, बल्कि उपलब्ध परिस्थितियों में परिसंपत्तियों का बेहतर मूल्य बचाना, कारोबार को संभव हो तो जारी रखना, रोजगार और आर्थिक गतिविधि को सुरक्षित रखना तथा ऋणदाताओं के हितों का संतुलन बनाना भी है।
इसलिए हर हेयरकट को घोटाला कहना गलत है। लेकिन हर समाधान योजना को सफलता बताकर वसूली की गुणवत्ता और प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाना बंद कर देना भी गलत है।
छोटे कर्जदार और बड़े कर्जदार : समान न्याय की कसौटी
यहाँ आम आदमी का प्रश्न सबसे तीखा है।
एक छोटा दुकानदार, किसान या स्वरोजगार करने वाला व्यक्ति कुछ लाख रुपये का ऋण नहीं चुका पाता तो उसे नोटिस, कानूनी कार्रवाई और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर बड़े ऋणों के समाधान में लंबी कानूनी प्रक्रिया, पुनर्गठन, परिसंपत्ति बिक्री और समझौते की व्यवस्था दिखाई देती है।
लेकिन केवल इन उदाहरणों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि हर बड़े कर्जदार को संरक्षण मिलता है और हर छोटे कर्जदार के साथ अन्याय होता है। इसके लिए तुलनात्मक आँकड़े चाहिए—ऋण का आकार, चूक का कारण, वसूली की दर, कानूनी कार्रवाई का समय, संपत्ति की उपलब्धता और समाधान के परिणाम।
फिर भी यह प्रश्न पूरी ताकत से पूछा जाना चाहिए कि क्या बैंकिंग व्यवस्था में समान परिस्थितियों वाले कर्जदारों के साथ समान और निष्पक्ष व्यवहार होता है?
कानून का सम्मान केवल छोटे व्यक्ति से नहीं, बड़े कारोबारी से भी उतनी ही दृढ़ता से कराया जाना चाहिए।
जनता को क्या जानने का अधिकार है?
बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता केवल वार्षिक रिपोर्टों का विषय नहीं होनी चाहिए। जनता के सामने नियमित रूप से ऐसी जानकारी रखी जानी चाहिए जिससे वास्तविक स्थिति समझी जा सके।
कितने ऋण राइट-ऑफ किए गए? उनमें से कितनी वसूली हुई? कितने मामलों में विलफुल डिफॉल्ट प्रमाणित हुआ? कितने मामलों में धोखाधड़ी की आशंका की जाँच हुई? ऋण स्वीकृति और निगरानी में लापरवाही कहाँ मिली? कितने मामलों में संबंधित अधिकारियों या संस्थाओं के विरुद्ध कार्रवाई हुई? समाधान योजनाओं से कितनी राशि प्राप्त हुई और कितने कारोबार फिर से चल सके?
व्यक्तिगत गोपनीयता और कानूनी सीमाओं का सम्मान करते हुए समेकित, तुलनीय और नियमित आँकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
संसद, नियामक संस्थाओं, बैंकों और जाँच एजेंसियों की भूमिका भी स्पष्ट होनी चाहिए। जनता को सनसनी नहीं, प्रमाण चाहिए; आरोप नहीं, जवाब चाहिए।
अंतिम प्रश्न : कर्ज किसका, जोखिम किसका और जवाबदेही किसकी?
किसी उद्योगपति का कारोबार डूबना अपने-आप में अपराध नहीं। किसी बैंक का ऋण राइट-ऑफ करना भी अपने-आप में कर्जमाफी या घोटाले का प्रमाण नहीं। लेकिन यदि ऋण देने में लापरवाही हुई, निगरानी में चूक हुई, धन का दुरुपयोग हुआ या वसूली में जानबूझकर ढिलाई बरती गई, तो उसकी जाँच और जवाबदेही अनिवार्य है।
देश को उद्यमी चाहिए, उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए और आर्थिक विकास चाहिए। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं कि जोखिम उठाने वाला लाभ का पूरा अधिकारी बने और नुकसान की जिम्मेदारी तय करने से बच निकले।
बैंकिंग व्यवस्था में विश्वास तभी बचेगा जब नियम सबके लिए समान हों, वास्तविक असफलता और जानबूझकर की गई धोखाधड़ी में स्पष्ट अंतर हो, वसूली की प्रक्रिया निष्पक्ष हो और निर्णय लेने वालों की जवाबदेही भी तय हो।
सरकार से प्रश्न पूछना व्यवस्था का विरोध नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखने के लिए उसके कमजोर पक्षों की जाँच जरूरी है।
सेठ जी का कारोबार डूब सकता है, लेकिन जनता का विश्वास नहीं डूबना चाहिए।
लेखक : डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक — आदर्श संस्कार शाला, भारत
यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी एवं नियामकीय सूचनाओं के आधार पर जनहित में प्रस्तुत विश्लेषण है। इसमें उल्लिखित काल्पनिक उदाहरण किसी वास्तविक व्यक्ति या संस्था पर आरोप नहीं हैं। ऋण राइट-ऑफ, कर्जमाफी, विलफुल डिफॉल्ट और दिवाला समाधान की कानूनी एवं लेखांकन संबंधी प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं।





















