50 महिलाओं को मिला रोजगार
बाराबंकी। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए छप्पर के नीचे शुरू की गई मशरूम की खेती आज नगर पंचायत रामसनेहीघाट के मालिनपुर गांव की रहने वाली ललिता देवी की पहचान बन चुकी है। मेहनत, लगन और आधुनिक तकनीक के दम पर उन्होंने छोटे स्तर के इस कार्य को अत्याधुनिक एसी मशरूम फार्म में बदल दिया है। आज उनके फार्म में पूरे वर्ष मशरूम का उत्पादन होता है और करीब 50 महिलाओं को रोजगार भी मिला है।
ललिता देवी ने बताया कि वर्ष 2005 में गांव के कुछ किसानों को मशरूम की खेती करते देखकर उन्होंने भी इसकी शुरुआत की थी। शुरुआती दिनों में सीमित संसाधनों के कारण उन्होंने छप्पर के नीचे मशरूम उगाना शुरू किया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने नई तकनीकों को अपनाया और धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ाते हुए अपने व्यवसाय का विस्तार किया।
वर्ष 2024 में उन्होंने करीब 20 लाख रुपये की लागत से दो आधुनिक उत्पादन कक्ष तैयार किए। पूरे फार्म को अत्याधुनिक सुविधाओं से विकसित करने में लगभग 80 लाख रुपये का निवेश किया गया। फार्म में तापमान नियंत्रित रखने के लिए एसी लगाए गए हैं, जबकि बिजली बाधित होने की स्थिति में उत्पादन प्रभावित न हो, इसके लिए जनरेटर की भी व्यवस्था की गई है।
उन्होंने बताया कि मशरूम की एक फसल तैयार होने में लगभग 40 दिन लगते हैं। इसके बाद करीब 25 दिनों तक तुड़ाई कर मशरूम को बाजार में भेजा जाता है। साल में चार बार फार्म की सफाई कर नई बुवाई की जाती है। बेहतर उत्पादन के लिए समय-समय पर पानी का छिड़काव और आवश्यक दवाओं का उपयोग किया जाता है। उत्पादन के लिए बांस की बल्लियों से ढांचा तैयार कर भूसे और गोबर की खाद के मिश्रण से मचान बनाया जाता है, जिसमें मशरूम का बीज डाला जाता है।
ललिता देवी के फार्म में तैयार मशरूम की मांग बाराबंकी के अलावा गोरखपुर, सुल्तानपुर, अयोध्या, लखनऊ, कानपुर और दिल्ली तक है। सामान्य दिनों में मशरूम 170 रुपये प्रति किलो बिकता है, जबकि शादी-विवाह के सीजन में इसकी कीमत 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। उनका दावा है कि मशरूम उत्पादन से उन्हें हर महीने करीब पांच लाख रुपये का मुनाफा होता है।
उन्होंने बताया कि पहले उनके पति गेहूं और धान की पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन उससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो पा रही थी। मशरूम की खेती शुरू करने के बाद परिवार की आर्थिक तस्वीर पूरी तरह बदल गई। अब उनके दोनों बेटे पढ़ाई के साथ-साथ फार्म के संचालन में भी सहयोग कर रहे हैं।
ललिता देवी आधुनिक तकनीक के साथ-साथ जैविक और पारंपरिक तरीके से भी मशरूम का उत्पादन करती हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक तरीके से तैयार मशरूम की गुणवत्ता और ताजगी के कारण बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है। हालांकि सर्दियों में बंगला मशरूम की अधिक आवक होने से कीमतों में कुछ गिरावट आती है। आज वह अपने अनुभव के आधार पर गांव की अन्य महिलाओं को भी मशरूम की खेती के लिए प्रेरित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनने का संदेश दे रही हैं।







