डॉ. दीपक गोस्वामी, प्रधान आचार्य, वैदिक ज्ञानपीठम, श्रीधाम वृंदावन, मथुरा
‘उससे योग करो जिससे कभी वियोग न हो’—यह वाक्य जीवन के आध्यात्मिक सत्य की ओर संकेत करता है। मनुष्य जीवनभर शरीर, संबंध, पद, प्रतिष्ठा, धन और सांसारिक उपलब्धियों से जुड़ता है, लेकिन समय के साथ इनमें से बहुत कुछ उससे दूर हो जाता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि वह कौन-सा संबंध है, जिसमें बिछोह की आशंका न हो? डॉ. दीपक गोस्वामी के आध्यात्मिक चिंतन के अनुसार इसका उत्तर श्री राधा सर्वेश्वरी तत्त्व में निहित है। उनके अनुसार श्री राधा प्रेम की उस दिव्य चेतना का स्वरूप हैं, जो जीव को क्षणभंगुर आकर्षणों से ऊपर उठाकर शाश्वत आनंद और समर्पण की ओर ले जाती है।
लेख में श्री राधा को भगवान श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति और प्रेम स्वरूपा के रूप में समझाया गया है। लेखक ने वैदिक और उपनिषदिक परंपरा के विभिन्न संदर्भों का उल्लेख करते हुए राधा-कृष्ण के संबंध को अग्नि और उसकी दाहकता, सूर्य और उसकी प्रभा तथा दीपक और उसकी ज्योति के समान बताया है। उनके अनुसार राधा और कृष्ण का तत्त्व अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही दिव्य सत्ता के परस्पर पूरक रूप हैं। यही कारण है कि भक्त परंपरा में राधा को कृष्ण की आराध्या और प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। वृंदावन की भक्ति परंपरा में भी राधा-कृष्ण के इस प्रेम को आध्यात्मिक साधना का केंद्र माना गया है।
डॉ. गोस्वामी के अनुसार संसार में सबसे प्रभावशाली शक्ति प्रेम है, लेकिन यहां प्रेम का अर्थ केवल सांसारिक संबंधों से नहीं, बल्कि निष्काम, निश्चल और समर्पित भक्ति से है। उनका मानना है कि योग, ज्ञान, तप और भक्ति जैसे मार्ग मनुष्य को ईश्वर की ओर ले जाते हैं, जबकि राधा तत्त्व में प्रेम स्वयं साधना का केंद्र बन जाता है। इसी भाव के आधार पर वे कहते हैं कि जब तक मनुष्य अपने क्षणभंगुर संबंधों को ही जीवन का अंतिम सत्य मानता रहेगा, तब तक वियोग और अस्थिरता बनी रहेगी। लेकिन जब उसका मन दिव्य प्रेम और शरणागति से जुड़ता है, तब भीतर एक ऐसी अनुभूति जन्म लेती है, जो बाहरी परिस्थितियों से परे होती है।
लेख के अंत में लेखक मनुष्य को श्री राधा के चरणों में प्रेम और श्रद्धा के साथ शरण लेने का संदेश देते हैं। उनके अनुसार मां के स्नेह और कृपा की अनुभूति मनुष्य को भय, असुरक्षा और अभाव से ऊपर उठाने वाली शक्ति बन सकती है। यही समर्पण अंततः भक्ति को केवल पूजा-पद्धति न रहने देकर जीवन जीने की दृष्टि में बदल देता है। श्री राधा के प्रति प्रेम, विश्वास और शरणागति को ही लेखक उस आध्यात्मिक योग के रूप में देखते हैं, जिसमें वियोग का भय नहीं रहता। लेख का समापन इसी भाव के साथ होता है—राधे राधे।





















