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अमृत उजाला > उत्तर प्रदेश > लखनऊ > पहले अनदेखी, फिर बुलडोज़र: LDA की नाकामी का बोझ आखिर जनता क्यों उठाए ?
लखनऊ

पहले अनदेखी, फिर बुलडोज़र: LDA की नाकामी का बोझ आखिर जनता क्यों उठाए ?

amritujala
Last updated: May 28, 2026 8:51 am
amritujala 2 months पहले
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पहले नींद, फिर बुलडोज़र: LDA की नाकामी का बोझ आखिर जनता क्यों उठाए?— एक गंभीर प्रश्न, एक कड़वी सच्चाई

लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) का मूल दायित्व क्या है? शहर में नियोजित विकास सुनिश्चित करना, अवैध निर्माणों को समय रहते रोकना और नागरिक हितों की रक्षा करना। लेकिन आज स्थिति इसके उलट दिखाई देती है। अवैध निर्माण पहले महीनों–सालों तक खड़े होते हैं, कई मंज़िलें बन जाती हैं, व्यवसाय शुरू हो जाते हैं, फ्लैट बिक जाते हैं, और तब कहीं जाकर प्राधिकरण को “अवैधता” दिखाई देती है। उसके बाद शुरू होती है ध्वस्तीकरण की कार्रवाई — बुलडोज़र, पुलिस बल, मशीनें, प्रशासनिक तंत्र और करोड़ों के सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है — यदि निर्माण अवैध था, तो उसे बनते समय क्यों नहीं रोका गया?

क्या LDA के अभियंता, जोनल अधिकारी, प्रवर्तन इकाइयाँ और निरीक्षण तंत्र सो रहे थे? क्या उन्हें जानकारी नहीं थी? यदि जानकारी नहीं थी, तो यह प्रशासनिक अक्षमता का गंभीर प्रमाण है। और यदि जानकारी थी, फिर भी निर्माण चलता रहा, तो मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही और संभावित मिलीभगत तक पहुँचता है।

कड़वी सच्चाई यह है कि अवैध निर्माण कोई रातों-रात खड़ी होने वाली झोपड़ी नहीं होती। बहुमंज़िला इमारतें, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, होटल, बेसमेंट, अतिक्रमण — यह सब महीनों की गतिविधि, सामग्री, मजदूरों और मशीनों से बनते हैं। क्या यह सब प्रशासन की आँखों के सामने नहीं होता?

यदि LDA समय रहते कार्रवाई करे, तो एक नोटिस, एक निरीक्षण और प्रारम्भिक रोकथाम से मामला नियंत्रित हो सकता है। लेकिन जब वर्षों तक निष्क्रियता बनी रहे और अंत में बुलडोज़र चलाया जाए, तब उसका पूरा खर्च जनता की जेब से जाता है।

ध्वस्तीकरण कोई मुफ़्त प्रक्रिया नहीं है। उसमें मशीनरी, ईंधन, प्रशासनिक अमला, पुलिस सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और कई अन्य सरकारी संसाधन लगते हैं। अर्थात्, पहले अवैध निर्माण रोकने में विफलता और फिर उसी विफलता को सुधारने के लिए लोक धन का भारी व्यय।

यह स्थिति दोहरी क्षति पैदा करती है —
पहली, शहर के नियोजित विकास को नुकसान;
दूसरी, करदाताओं के धन की बर्बादी।

और सबसे दुखद पहलू यह है कि अक्सर इस पूरे चक्र में जिम्मेदारी तय नहीं होती। अवैध निर्माण खड़ा हो गया, ध्वस्तीकरण भी हो गया, मगर यह शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होता है कि निर्माण अवधि के दौरान किस अधिकारी की निगरानी थी, किसने निरीक्षण किया, किसने रिपोर्ट दी और किस स्तर पर चूक हुई।

क्या केवल भवन मालिक ही दोषी है?
या फिर वह तंत्र भी प्रश्नों के घेरे में है, जिसका काम ही ऐसे निर्माण रोकना था?

लोकतांत्रिक प्रशासन में जवाबदेही का सिद्धांत स्पष्ट है — कर्तव्य पालन में विफलता की भी जवाबदेही होती है। यदि किसी क्षेत्र में वर्षों तक अवैध निर्माण फलते-फूलते रहें, तो केवल अंतिम कार्रवाई की प्रेस विज्ञप्ति पर्याप्त नहीं है। जनता यह जानना चाहती है कि रोकथाम क्यों असफल रही।

आज आवश्यकता केवल बुलडोज़र राजनीति या दिखावटी प्रवर्तन की नहीं, बल्कि प्रिवेंटिव गवर्नेंस की है — ऐसी व्यवस्था, जहाँ अवैध निर्माण की पहली ईंट पर ही प्रशासन सक्रिय हो जाए।

साथ ही, एक कठोर नीति पर विचार होना चाहिए — जहाँ स्पष्ट प्रशासनिक लापरवाही सिद्ध हो, वहाँ ध्वस्तीकरण पर हुए सरकारी खर्च और विभागीय उत्तरदायित्व की समीक्षा अनिवार्य बने। क्योंकि लोक धन किसी विभागीय निष्क्रियता की कीमत चुकाने का साधन नहीं बन सकता।

लखनऊ जैसे तेजी से बढ़ते शहर में विकास प्राधिकरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि अवैध निर्माण पहले पनपें, फिर प्रशासन जागे, और अंततः उसका आर्थिक बोझ जनता उठाए, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि शासन-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

शहरों का विकास बुलडोज़र से नहीं, समय पर जवाबदेही, सतर्क निगरानी और पारदर्शी प्रशासन से होता है।

और जब तक यह नहीं होगा, तब तक हर ध्वस्तीकरण अभियान के साथ एक सवाल गूँजता रहेगा —
“अवैध निर्माण बनने तक LDA कहाँ था?”

शिखर
अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ।

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