प्रयागराज। न्याय की नगरी के रूप में पहचाने जाने वाले प्रयागराज में जिला अधिवक्ता संघ के चुनाव के दौरान संगम सभागार में सामने आए घटनाक्रम ने अधिवक्ता समाज की गरिमा और चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मतगणना के दौरान हंगामे, बैलेट पेपरों के बिखरने और व्यवस्था बिगड़ने की तस्वीरें सामने आने के बाद चुनाव की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। संगम सभागार में फर्श पर बिखरे गुलाबी और नीले बैलेट पेपर, अस्त-व्यस्त कुर्सियां और टेबल पर पड़े मतपत्र पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को बयां कर रहे थे। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर व्यवस्था संभालनी पड़ी।
मतगणना के दौरान कैसे बिगड़े हालात?
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, अध्यक्ष पद के चुनाव की मतगणना के दौरान एक प्रत्याशी की जीत की स्थिति स्पष्ट होने के बाद अचानक हंगामा शुरू हो गया। आरोप है कि कुछ लोगों ने मतगणना प्रक्रिया में व्यवधान डाला और टेबल पर रखे बैलेट पेपरों को खींचकर नीचे फेंक दिया। इसके बाद मौके पर अफरातफरी का माहौल बन गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एडिशनल सीपी (ऑर्डर इन लॉ) अजय पाल शर्मा को भी संगम सभागार पहुंचना पड़ा। हालांकि, पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगी। सवाल यह है कि जिस स्थान पर कानून और न्याय की समझ रखने वाले अधिवक्ता एकत्र होते हैं, वहां किसी चुनाव की मतगणना के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति क्यों बिगड़ी? यह घटना केवल चुनावी विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे संस्था की प्रतिष्ठा पर भी सवाल खड़े होते हैं।
निष्पक्ष चुनाव की उठी मांग
घटना के बाद कई वरिष्ठ और युवा अधिवक्ताओं ने चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से पूरा कराने की मांग की। कुछ अधिवक्ताओं की ओर से चुनाव में गड़बड़ी और मतपत्रों के साथ कथित छेड़छाड़ के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि चुनाव में हार और जीत स्वाभाविक प्रक्रिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी प्रत्याशी की जीत जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही महत्वपूर्ण हार को स्वीकार करना भी है। यदि चुनाव प्रक्रिया पर किसी पक्ष को आपत्ति है तो उसके समाधान के लिए निर्धारित संस्थागत और कानूनी रास्ते मौजूद हैं।
बार की गरिमा पर उठे सवाल
जिला अधिवक्ता संघ प्रयागराज कोई सामान्य संस्था नहीं है। प्रयागराज की न्यायिक परंपरा में इसका अपना महत्वपूर्ण स्थान है। यहां से जुड़े अधिवक्ताओं से समाज हमेशा कानून, अनुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों की अपेक्षा करता है। ऐसे में चुनाव के दौरान यदि मतपत्र फेंके जाने, मतगणना बाधित होने या हंगामे के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह निश्चित रूप से गंभीर विषय है। एक अधिवक्ता न्यायालय में कानून और संविधान की मर्यादा की बात करता है। इसलिए बार के चुनाव में भी उसी अनुशासन और मर्यादा का पालन होना चाहिए।
क्या चुनावी विवाद संस्था की प्रतिष्ठा से बड़ा हो गया?
इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवालों को जन्म दिया है।
क्या चुनावी हार को स्वीकार करने की लोकतांत्रिक परंपरा कमजोर पड़ रही है?
क्या बार चुनावों में व्यक्तिगत वर्चस्व और पद की राजनीति संस्था की गरिमा पर भारी पड़ने लगी है?
और सबसे बड़ा सवाल—यदि अधिवक्ता संघ के चुनाव में ही निष्पक्षता और अनुशासन पर सवाल खड़े हों तो आम लोगों के बीच अधिवक्ता समाज की छवि पर इसका क्या असर पड़ेगा?
फर्श पर पड़े बैलेट पेपर केवल कागज के टुकड़े नहीं हैं। वे उस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसके आधार पर संस्था के प्रतिनिधि चुने जाते हैं। इसलिए उनके साथ किसी भी तरह की कथित लापरवाही या छेड़छाड़ को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
जांच से सामने आनी चाहिए पूरी सच्चाई
पूरे मामले में निष्पक्ष जांच सबसे जरूरी है। बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश और जिला प्रशासन को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की वास्तविकता सामने लानी चाहिए। यदि संगम सभागार में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं तो उनकी फुटेज की जांच कर यह स्पष्ट किया जा सकता है कि वास्तव में हंगामा कैसे शुरू हुआ और मतपत्रों के साथ क्या हुआ। यदि जांच में किसी व्यक्ति की ओर से चुनाव प्रक्रिया बाधित करने, मतपत्रों को नुकसान पहुंचाने या अन्य गंभीर अनियमितता के आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। कार्रवाई का आधार आरोप नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच में सामने आए तथ्य होने चाहिए।
मुद्दा किसी व्यक्ति की जीत-हार नहीं, संस्था की प्रतिष्ठा है
उमा शंकर तिवारी चुनाव जीते या हारे, असली मुद्दा इससे कहीं बड़ा है। सवाल यह है कि जिला अधिवक्ता संघ जैसी प्रतिष्ठित संस्था का चुनाव कितनी पारदर्शिता और गरिमा के साथ संपन्न हुआ। चुनाव किसी व्यक्ति की निजी प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि पूरी संस्था के विश्वास का विषय होता है। मतभेद होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मतभेद को अराजकता में बदल देना किसी भी संस्था के हित में नहीं हो सकता। काले कोट के साथ समाज कानून, न्याय और जिम्मेदारी की उम्मीद जोड़ता है। इसलिए अधिवक्ता समाज के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है कि हार-जीत से ऊपर संस्था की गरिमा और लोकतांत्रिक मर्यादा होनी चाहिए। पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो और जो भी सच्चाई है, वह सामने आए—यही इस विवाद का सबसे उचित समाधान है।






