विकास की चमक के पीछे आदिवासी भारत: अधिकार, संसाधन और राजनीति की असली कहानी

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आदिवासी समाज: अधिकार, विकास और राजनीतिक भागीदारी की पूरी तस्वीर

आदिवासी भारत: विकास की चमक के पीछे अधिकार, संसाधन और राजनीतिक भागीदारी की असली तस्वीर

भारत के विकास की चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसा भारत भी है, जिसकी पहचान जंगल, जल, जमीन, श्रम और प्रकृति के साथ सदियों पुराने रिश्ते से बनी है। यह भारत आदिवासी भारत है। उसे केवल गरीबी, पिछड़ेपन या सरकारी सहायता के पात्र के रूप में देखना उसके इतिहास, ज्ञान और संवैधानिक अधिकारों के साथ अन्याय होगा। असल सवाल यह नहीं है कि आदिवासी समाज के लिए सरकारों ने कितना खर्च किया या कितनी योजनाएं बनाई गईं। बड़ा सवाल यह है कि उसके संसाधनों, अधिकारों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उसकी वास्तविक हिस्सेदारी कितनी है।

आबादी बड़ी, लेकिन चुनौतियां भी गंभीर

2011 की जनगणना के अनुसार, देश में अनुसूचित जनजातियों की आबादी 10.43 करोड़ थी, जो कुल आबादी का करीब 8.6 प्रतिशत है। मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की संख्या लगभग 1.53 करोड़, छत्तीसगढ़ में करीब 78.23 लाख और झारखंड में लगभग 86.45 लाख दर्ज की गई थी। देश के कई आदिवासी समुदाय आज भी दूरदराज के जंगलों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले इलाकों में रहते हैं। ऐसे क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, इंटरनेट और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना अब भी चुनौती बना हुआ है। कई बार सामान्य विकास योजनाएं अंतिम बस्ती तक पहुंचते-पहुंचते अपनी प्रभावशीलता खो देती हैं।

शिक्षा में सुधार हुआ, लेकिन दूरी अभी बाकी

आदिवासी समाज में शिक्षा की स्थिति पहले के मुकाबले बेहतर हुई है, लेकिन अभी भी लंबी दूरी तय करनी बाकी है। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक अनुसूचित जनजातियों की साक्षरता दर 59 प्रतिशत थी। इसमें पुरुष साक्षरता 68.5 प्रतिशत और महिला साक्षरता 49.4 प्रतिशत थी। छत्तीसगढ़ में जनजातीय साक्षरता दर 59.1 प्रतिशत, झारखंड में 57.1 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 50.6 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इसलिए केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालय तक बच्चों की पहुंच, नियमित उपस्थिति, प्रशिक्षित शिक्षक, छात्रावास, डिजिटल सुविधाएं और माध्यमिक शिक्षा के बाद कौशल विकास को एक साथ मजबूत करना होगा।

मातृभाषा में शिक्षा से आसान होगी सीखने की प्रक्रिया

आदिवासी बच्चे की समस्या उसकी क्षमता नहीं, बल्कि कई बार शिक्षा व्यवस्था और उसकी सामाजिक-भाषाई पृष्ठभूमि के बीच का अंतर होती है। जिस बच्चे की पहली भाषा गोंडी, संथाली, मुंडारी, भीली या कोई अन्य स्थानीय भाषा है, उसके सामने शुरुआत से ही अपरिचित भाषा में पाठ्यक्रम रख देना सीखने की प्रक्रिया को कठिन बना सकता है। प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा के साथ हिंदी और आगे चलकर अंग्रेजी तथा डिजिटल कौशल की क्रमिक व्यवस्था ज्यादा प्रभावी हो सकती है। स्थानीय समुदाय से आने वाले प्रशिक्षित शिक्षकों की भागीदारी भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

जंगल सिर्फ लकड़ी का स्रोत नहीं

आदिवासी अर्थव्यवस्था में जंगल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी, लाख, शहद, बांस और दूसरी लघु वनोपज हजारों परिवारों की आजीविका का आधार हैं। समस्या यह है कि जंगल से उत्पाद जुटाने वाले परिवार और अंतिम बाजार के बीच कीमत का बड़ा अंतर पैदा हो जाता है। ऐसे में केवल सरकारी सहायता या आर्थिक अनुदान स्थायी समाधान नहीं है। जरूरत है कि स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण केंद्र, भंडारण, बेहतर परिवहन, ब्रांडिंग, सहकारी विपणन और उचित मूल्य की व्यवस्था विकसित की जाए। यदि कोई परिवार कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय उसे स्थानीय स्तर पर प्रसंस्कृत करके बाजार तक पहुंचाए, तो उसकी आय में काफी बढ़ोतरी हो सकती है।

वन और जमीन के अधिकार सबसे बड़ा सवाल

आदिवासी अधिकारों की चर्चा जंगल और जमीन के सवाल के बिना अधूरी है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने वनभूमि पर परंपरागत व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को कानूनी आधार दिया है। इसी तरह संविधान की पांचवीं अनुसूची और पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 यानी पेसा अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका को विशेष महत्व देते हैं। पेसा के तहत ग्रामसभा को विकास योजनाओं की स्वीकृति, लाभार्थियों के चयन और पंचायत द्वारा किए गए खर्च के उपयोग की पुष्टि जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं दी गई हैं। लेकिन असली चुनौती कानून और जमीन के बीच मौजूद दूरी है। कागज पर अधिकार होना और ग्रामसभा के पास वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति होना दो अलग बातें हैं। कई जगह ग्रामसभा की बैठक केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाती है और वास्तविक निर्णय पहले ही प्रशासनिक या राजनीतिक स्तर पर तय हो चुके होते हैं। इसलिए आदिवासी स्वशासन का मतलब केवल ग्रामसभा की बैठक आयोजित करना नहीं, बल्कि उसे वास्तविक निर्णय और निगरानी की शक्ति देना है।

राजनीति में प्रतिनिधित्व बढ़ा, लेकिन निर्णय की शक्ति?

भारतीय संविधान ने आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में 543 सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित थीं। राज्य विधानसभाओं में भी संविधान के अनुच्छेद 332 के तहत अनुसूचित जनजातियों के लिए जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की जाती हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन केवल आरक्षित सीटों की संख्या से आदिवासी राजनीतिक सशक्तीकरण की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। सवाल यह भी है कि आरक्षित सीट से चुना गया प्रतिनिधि वास्तविक रूप से किसके प्रति जवाबदेह है—ग्रामसभा, स्थानीय जनता, राजनीतिक दल या उस राजनीतिक व्यवस्था के प्रति जिसने उसे टिकट और संगठनात्मक समर्थन दिया? आदिवासी क्षेत्रों की राजनीति को दो स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला चुनावी राजनीति का स्तर है, जहां टिकट, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण हो जाते हैं। दूसरा रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दों का स्तर है, जिसमें वनाधिकार, सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, रोजगार, सिंचाई, वन उपज का उचित मूल्य और विस्थापन जैसे सवाल शामिल हैं। अक्सर चुनाव के दौरान ये मुद्दे प्रमुख हो जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद उनकी प्राथमिकता कम होती दिखाई देती है।

प्रतिनिधित्व को जवाबदेही में बदलना जरूरी

राजनीतिक प्रतिनिधित्व तभी सार्थक होगा, जब सांसद और विधायक अपने क्षेत्र की ग्रामसभाओं के साथ नियमित संवाद करें। विकास योजनाओं की प्राथमिकताएं स्थानीय समुदाय की जरूरतों के आधार पर तय हों और विस्थापन, खनन तथा वनभूमि से जुड़े मामलों में समुदाय की वैधानिक राय दर्ज हो। चुने हुए प्रतिनिधियों के काम का सामाजिक लेखा-परीक्षण भी होना चाहिए। लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट देने तक सीमित नहीं रह सकता। राजनीतिक भागीदारी का मतलब केवल सांसद या विधायक बनना भी नहीं है। पंचायत, ग्रामसभा, सहकारी समितियां, स्वयं सहायता समूह, वन प्रबंधन समितियां, युवा संगठन और स्थानीय नागरिक संस्थाएं भी लोकतांत्रिक भागीदारी के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसमें महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आदिवासी महिलाएं कृषि, वनोपज, पशुपालन, जल प्रबंधन और घरेलू अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसलिए निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए।

विकास की कीमत विस्थापन क्यों बने?

सड़क, बांध, खनन, उद्योग और ऊर्जा परियोजनाएं देश के विकास के लिए जरूरी हो सकती हैं। लेकिन विकास की कीमत किसी समुदाय की जमीन, संस्कृति और आजीविका के नुकसान के रूप में नहीं चुकाई जानी चाहिए। किसी प्रभावित परिवार को केवल एक बार मुआवजा देकर सरकार या परियोजना की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। पुनर्वास के साथ दीर्घकालिक आय, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और सामुदायिक लाभ में हिस्सेदारी की व्यवस्था भी जरूरी है। विकास तभी टिकाऊ माना जाएगा, जब उसका लाभ स्थानीय समुदाय तक पहुंचे और उसकी कीमत भी वही समुदाय अकेले न चुकाए।

स्वास्थ्य और पोषण पर भी गंभीर ध्यान जरूरी

आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और पोषण की चुनौतियां भी बड़ी हैं। जनजातीय कार्य मंत्रालय की सामग्री में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 आधारित आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जनजाति के बच्चों में बौनापन 40.9 प्रतिशत, क्षीणता 23.2 प्रतिशत और कम वजन 39.5 प्रतिशत दर्ज किया गया। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल पैकेटबंद पोषण सामग्री पर्याप्त नहीं हो सकती। स्थानीय खाद्य परंपराओं और उपलब्ध संसाधनों को भी पोषण योजनाओं का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। मोटे अनाज, दालें, हरी सब्जियां, अंडे और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थ इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

आदिवासी महिलाओं को बनाया जाए विकास का केंद्र

आदिवासी महिला परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। खेती से लेकर वनोपज, पशुपालन और जल संग्रह तक उसकी भूमिका व्यापक है। यदि महिलाओं के नाम पर भूमि अधिकार, बैंकिंग सुविधा, कौशल प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच और स्वयं सहायता समूहों को मजबूत किया जाए, तो इसका सीधा प्रभाव पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है। ग्रामसभा में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी बढ़ाना भी राजनीतिक और सामाजिक सशक्तीकरण की दिशा में बड़ा कदम होगा।

सबसे कमजोर जनजातीय समूहों के लिए अलग रणनीति जरूरी

देश में 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह 18 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में चिन्हित किए गए हैं। इनके लिए प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान जैसी पहल आवास, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सड़क, दूरसंचार, विद्युतीकरण और आजीविका जैसी बुनियादी सुविधाओं पर केंद्रित है। अब चुनौती नई योजनाएं बनाने से ज्यादा यह सुनिश्चित करने की है कि उनका वास्तविक लाभ हर पात्र परिवार और दूरस्थ बस्ती तक पहुंचे।

बजट से ज्यादा जरूरी है उसका वास्तविक असर

केंद्रीय बजट 2026-27 में जनजातीय कार्य मंत्रालय के लिए करीब 15,422 करोड़ रुपये का सकल बजटीय प्रावधान दर्ज है। इसके अलावा कई अन्य मंत्रालयों की योजनाओं में भी अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग प्रावधान किए जाते हैं। इसलिए केवल बजट का आकार देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कितना पैसा वास्तव में आदिवासी समाज तक पहुंचा। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि स्वीकृत धन में से कितना पैसा गांव, परिवार, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और आजीविका परियोजनाओं तक पहुंचा और उससे जमीन पर क्या बदलाव आया।

अब लाभार्थी नहीं, अधिकारधारी के रूप में देखना होगा

आदिवासी विकास की सोच में सबसे बड़ा बदलाव यही होना चाहिए कि आदिवासी समाज को केवल सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाला समुदाय न माना जाए, बल्कि उसे अपने अधिकारों का स्वामी और निर्णय प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाया जाए। हर ग्रामसभा के स्तर पर सामाजिक लेखा-परीक्षण की व्यवस्था हो। विकास कार्यों की लागत, स्वीकृति, समयसीमा और प्रगति सार्वजनिक की जाए। वनाधिकार दावों के निपटारे के लिए समयबद्ध व्यवस्था हो। लघु वनोपज के लिए उत्पादक से बाजार तक स्थानीय मूल्य-श्रृंखला विकसित की जाए। स्कूलों में मातृभाषा, आधुनिक विज्ञान और डिजिटल शिक्षा का संतुलित मेल हो। दूरस्थ इलाकों में मोबाइल स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण केंद्रों और स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों के नेटवर्क को मजबूत किया जाए।

राजनीति में भी हो जवाबदेही

राजनीतिक सुधार की दिशा भी स्पष्ट होनी चाहिए। आरक्षित क्षेत्र में केवल चुनाव कराना पर्याप्त नहीं है। पांच साल की पूरी अवधि में जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। सांसद और विधायक अपने क्षेत्र की प्रमुख ग्रामसभाओं के सामने नियमित कार्य-विवरण प्रस्तुत करें। चुनावी वादों और वास्तविक उपलब्धियों की सार्वजनिक समीक्षा हो। ग्रामसभा और पंचायत के महत्वपूर्ण निर्णयों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए। महिलाओं और युवाओं को स्थानीय नेतृत्व के लिए प्रशिक्षण मिले और राजनीतिक दल आदिवासी समाज को केवल चुनावी आंकड़े के रूप में देखने के बजाय नीति-निर्माण में वास्तविक भागीदारी दें।

विकास के साथ आदिवासी ज्ञान का सम्मान भी जरूरी

सबसे जरूरी बदलाव हमारी सोच में होना चाहिए। आदिवासी समाज को विकास का निष्क्रिय लाभार्थी मानना बंद करना होगा। उसके पास जंगल, जैव-विविधता और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का पीढ़ियों से अर्जित अनुभव है। आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक आदिवासी ज्ञान के बीच संवाद भारत के लिए विकास का एक नया मॉडल तैयार कर सकता है। जंगल बचाना है तो जंगल पर निर्भर समुदाय को मजबूत करना होगा। जल बचाना है तो जलस्रोतों की सुरक्षा में स्थानीय समुदाय की भूमिका बढ़ानी होगी। जमीन बचानी है तो भूमि अधिकारों को कागज से निकालकर वास्तविक जीवन में लागू करना होगा। और राजनीति को सार्थक बनाना है तो प्रतिनिधित्व को निर्णय लेने की शक्ति में बदलना होगा।

आदिवासी न्याय का रास्ता अधिकार और सम्मान से होकर गुजरता है

आदिवासी समाज को दया नहीं चाहिए। उसे संविधान से मिले अधिकार, सम्मान, समान अवसर और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति चाहिए। जब ग्रामसभा की आवाज विकास योजनाओं में सबसे पहले सुनी जाएगी, जब जंगल से निकलने वाले संसाधनों का उचित मूल्य स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा, जब आदिवासी बच्चे अपनी भाषा और पहचान के साथ आधुनिक शिक्षा हासिल करेंगे और जब जनप्रतिनिधि चुनाव के बाद भी जनता के बीच मौजूद रहेंगे, तभी विकास और लोकतंत्र को वास्तव में समावेशी कहा जा सकेगा। भारत की प्रगति का असली पैमाना केवल महानगरों की ऊंची इमारतें नहीं हैं। उसकी असली परीक्षा उस दूरस्थ वन बस्ती में होगी, जहां बच्चा नियमित रूप से स्कूल जाता है, महिला अपने श्रम का उचित मूल्य हासिल करती है, परिवार अपनी जमीन पर सुरक्षित रहता है, युवा अपने क्षेत्र में रोजगार पाता है और ग्रामसभा अपने भविष्य से जुड़े फैसले खुद लेने में सक्षम होती है।

जंगल, जल, जमीन और जमीर की रक्षा ही आदिवासी न्याय की बुनियाद है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व तभी सार्थक होगा, जब वह केवल संख्या और सीटों तक सीमित न रहकर अधिकार, निर्णय और स्वशासन की वास्तविक शक्ति में बदले।

लेखक : डॉ. दीपक गोस्वामी

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