महंत धर्मेंद्र दास ने फलाहारी बाबा की दावेदारी को बताया फर्जी, भूमि कब्जाने की साजिश का लगाया आरोप
अयोध्या। श्री पलटू दास जी महाराज अखाड़े की महंती को लेकर विवाद एक बार फिर गहरा गया है। अखाड़े के महंत धर्मेंद्र दास शास्त्री ने आजमगढ़ के शिवप्रकाश दास उर्फ फलाहारी बाबा की ओर से की जा रही महंती की दावेदारी को पूरी तरह निराधार और सनातन परंपराओं के विरुद्ध बताते हुए करोड़ों रुपये की अखाड़े की भूमि पर कब्जा करने की साजिश का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने जिला प्रशासन से अपनी और अखाड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
महंत धर्मेंद्र दास ने कहा कि सनातन परंपरा के अनुसार कोई भी संत एक समय में केवल एक ही मठ या अखाड़े का महंत हो सकता है। उनका दावा है कि शिवप्रकाश दास पहले से आजमगढ़ के लालगंज स्थित हनुमानगढ़ी कटघर के महंत हैं, इसलिए अयोध्या स्थित पलटू दास अखाड़े की गद्दी पर उनका दावा परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिवप्रकाश दास जिस हंसनाथ सिंह को अपना उत्तराधिकारी बता रहे हैं, वह गृहस्थ हैं, जबकि अखाड़े की परंपरा के अनुसार गृहस्थ व्यक्ति महंत का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता।
महंत धर्मेंद्र दास के अनुसार, उनकी महंती के समय शिवप्रकाश दास स्वयं कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे, जबकि उनके शिष्य हंसनाथ सिंह कार्यक्रम में उपस्थित थे और उस समय किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी। उन्होंने दावा किया कि उस कार्यक्रम के फोटो और अन्य साक्ष्य अखाड़े के पास सुरक्षित हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी पक्ष गांव के कुछ लोगों को जमीन का हिस्सा देने का लालच देकर अखाड़े की संपत्ति पर अवैध कब्जे का प्रयास कर रहा है। उनका कहना है कि वर्ष 2020 से अखाड़े की व्यवस्था और संपत्ति पर उनका वास्तविक कब्जा है तथा नगर निगम अभिलेख, बिजली कनेक्शन और अन्य आवश्यक दस्तावेज उनके नाम पर दर्ज हैं।
महंत धर्मेंद्र दास ने बताया कि उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी को पत्र भेजकर सुरक्षा की मांग की है। उनका कहना है कि यदि उनके या अखाड़े के साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी शिवप्रकाश दास, राजकुमार यादव, प्रमोद यादव और अमरजीत यादव की होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि पूरा विवाद वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है तथा संबंधित पक्ष के विरुद्ध पहले से पुलिस में मुकदमा दर्ज है। उनके अनुसार, तत्कालीन महंत रामदास के जीवनकाल में एक अपंजीकृत महज्जरनामा तैयार किया गया था, जबकि उनके साकेतवास के बाद परंपरा के अनुसार महंत देवनारायण दास को सर्वसम्मति से महंत एवं सरबराहकार बनाया गया था। उनका आरोप है कि अब प्रस्तुत किए जा रहे कुछ पुराने दस्तावेजों की वैधता संदिग्ध है।








