डाक्टर दीपक गोस्वामी
चौधरी चरण सिंह का नाम भारतीय राजनीति में उस धुरी की तरह है जिसके चारों ओर ग्रामीण भारत की आशाएँ, किसान की अस्मिता और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का सपना घूमता रहा। 23 दि संबर 1902 को मेरठ जिले के नूरपुर गाँव में एक सामान्य माली परिवार में जन्मे इस व्यक्तित्व ने न केवल उत्तर प्रदेश की बल्कि पूरे देश की कृषि-नीति को दिशा दी। उनके जीवन का हर अध्याय आँकड़ों से बोलता है और उन आँकड़ों के पीछे खड़ी है एक ऐसी दूरदृष्टि जो आज भी नीति-निर्माताओं को रास्ता दिखाती है।
1946 में जब वे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुँचे तो उनके पास वकालत की डिग्री थी, जमींदारी उन्मूलन का सपना था और खेतों की मिट्टी का अनुभव था। 1952 में उत्तर प्रदेश के राजस्व मंत्री बनते ही उन्होंने वह कर दिखाया जो आजादी के पाँच साल बाद भी सपना लगता था। 1952 का उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम उनकी कलम से निकला। इस कानून का असर देखिए: 1960 तक उत्तर प्रदेश में 17.23 लाख बिचौलिये जमींदार समाप्त हुए और 23.18 लाख हेक्टेयर भूमि सीधे 2.12 करोड़ काश्तकारों के नाम दर्ज हुई। यह भारत के इतिहास में भूमि का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण हस्तांतरण था। छोटे किसान को जमीन का मालिकाना हक मिला तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ा। 1950-51 में उत्तर प्रदेश में गेहूँ का औसत उत्पादन 7.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था, जो 1965-66 तक बढ़कर 11.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया। यह 63.8% की वृद्धि केवल कानून बदलने से नहीं, किसान के भीतर मालिकाना हक का भरोसा जगाने से आई थी।
चरण सिंह आँकड़ों के आदमी थे। वे कहते थे कि भारत की 80% आबादी गाँव में रहती है और 72% लोग खेती पर निर्भर हैं, तो बजट का चेहरा भी खेत की ओर होना चाहिए। 1979 में जब वे मात्र 24 दिन के लिए देश के वित्त मंत्री बने तो उन्होंने 1979-80 का बजट पेश किया। उस बजट में कृषि क्षेत्र के लिए कुल योजना परिव्यय का 41.7% रखा गया, जबकि 1978-79 में यह आँकड़ा 29.3% था। इतना ही नहीं, उन्होंने उर्वरक पर सब्सिडी 450 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 600 करोड़ रुपये कर दी और ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए 180 करोड़ का प्रावधान किया। उनके 24 दिन के कार्यकाल में नाबार्ड की स्थापना का खाका भी खींचा गया, जो 12 जुलाई 1982 को अस्तित्व में आया। आज नाबार्ड का पुनर्वित्त पोर्टफोलियो 8.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक है और 12 करोड़ से ज्यादा किसान क्रेडिट कार्ड उसी सोच की उपज हैं।
28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल छोटा रहा, पर नीतिगत छाप गहरी थी। उन्होंने पहली बार ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ को वैधानिक दर्जा देने की बात की ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य वैज्ञानिक आधार पर तय हो। 1979-80 में गेहूँ का एमएसपी 115 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 125 रुपये किया गया, यानी 8.7% की एकमुश्त वृद्धि। उसी वर्ष गन्ने का राज्य परामर्शी मूल्य उत्तर प्रदेश में 14.50 रुपये से 16.50 रुपये प्रति क्विंटल हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि 1980-81 में देश का खाद्यान्न उत्पादन पहली बार 129.6 मिलियन टन के पार गया, जबकि 1978-79 में यह 131.9 मिलियन टन था पर सूखे के कारण 1979-80 में 109.7 मिलियन टन पर आ गया था। चरण सिंह की नीतियों ने एक साल में ही 18.2% की रिकवरी दी।
उनकी राजनीति का आधार ‘ग्राम गणराज्य’ की अवधारणा थी। वे मानते थे कि जब तक गाँव का किसान बाजार, पूँजी और तकनीक से नहीं जुड़ेगा, तब तक लोकतंत्र अधूरा है। 1967 में उन्होंने भारतीय क्रांति दल बनाया और 1977 में जनता पार्टी की नींव रखने वालों में प्रमुख रहे। 1980 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी लोकदल को 41 सीटें मिलीं और 9.39% वोट शेयर मिला। यह वोट शेयर पूरी तरह ग्रामीण था। 84% मतदाता उन निर्वाचन क्षेत्रों से थे जहाँ 70% से अधिक आबादी खेती पर निर्भर थी। यह आँकड़ा बताता है कि चरण सिंह ने वर्ग को वोट में बदला, और वोट को नीति में।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में 1967 और 1970 के उनके कार्यकाल में चकबंदी कानून को सख्ती से लागू किया गया। 1968 से 1977 के बीच उत्तर प्रदेश में 1.68 करोड़ हेक्टेयर भूमि की चकबंदी हुई। चकबंदी से खेतों की औसत संख्या प्रति किसान 5.7 से घटकर 2.3 रह गई। इसका सीधा असर सिंचाई दक्षता पर पड़ा। 1966 में नलकूपों की संख्या 1.9 लाख थी जो 1976 तक 6.4 लाख हो गई। इसी अवधि में खाद्यान्न उत्पादकता 8.9 क्विंटल से बढ़कर 13.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हुई। वे मानते थे कि चकबंदी बिना हुए ट्रैक्टर भी बैलगाड़ी की गति से चलेगा।
चरण सिंह ने लेखन को हथियार बनाया। 1959 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘जॉइंट फार्मिंग एक्स-रेड’ ने नेहरू की सहकारी खेती की नीति को आँकड़ों से चुनौती दी। उन्होंने सोवियत संघ के सामूहिकीकरण के आँकड़े रखे कि 1928 से 1940 के बीच वहाँ खाद्यान्न उत्पादन 7.3 करोड़ टन से घटकर 6.4 करोड़ टन रह गया, जबकि भारत में छोटे खेतों का मॉडल ही सफल होगा। 1981 में ‘इकनॉमिक नाइटमेयर ऑफ इंडिया’ में उन्होंने बताया कि 1950 से 1980 के बीच उद्योग पर प्रति व्यक्ति निवेश 103 रुपये था जबकि कृषि पर मात्र 17 रुपये। इसी असंतुलन को वे भारत की गरीबी का मूल कहते थे।
उनका अंतिम जन का सिद्धांत केवल नारा नहीं था। 1979 में ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम का प्रस्ताव उन्होंने ही रखा, जो बाद में मनरेगा की पृष्ठभूमि बना। 1980 की जनगणना के अनुसार भारत में 55.5% ग्रामीण परिवार भूमिहीन या सीमांत किसान थे। चरण सिंह ने कहा कि जब तक इस 55% के पास साल में 100 दिन का रोजगार नहीं होगा, तब तक गरीबी रेखा कागज की लकीर है। आज मनरेगा में 2023-24 में 11.2 करोड़ परिवारों को काम मिला और 305 करोड़ मानव-दिवस सृजित हुए। बीज चरण सिंह ने बोया था।
29 मई 1987 को उनका निधन हुआ, पर उनकी नीतियाँ जीवित रहीं। 2001 में भारत सरकार ने उनके जन्मदिन 23 दिसंबर को ‘किसान दिवस’ घोषित किया। आज भी भारत के कुल कार्यबल का 45.5% हिस्सा कृषि में है और जीडीपी में कृषि का योगदान 18.3% है, जबकि 1951 में यह 51.9% था। यह गिरावट विकास का संकेत है, पर चरण सिंह चेताते थे कि जीडीपी में हिस्सा घटे पर नीति में हिस्सा न घटे। 2023-24 में कृषि ऋण का लक्ष्य 20 लाख करोड़ रुपये रखा गया, 1979-80 में यह मात्र 2,100 करोड़ था। 952 गुना वृद्धि के पीछे वही सोच है कि किसान को साहूकार से मुक्ति चाहिए।
चौधरी चरण सिंह का खाँटीपन आँकड़ों से नहीं, आँकड़ों के पीछे खड़े किसान की आँख से मापा जाता है। उन्होंने कुर्ता-पायजामा को सत्ता का वस्त्र बनाया और खेत को संसद की बहस बनाया। वे अंतिम व्यक्ति को पहले रखते थे क्योंकि मानते थे कि लोकतंत्र की जड़ें दिल्ली में नहीं, उस खेत में हैं जहाँ हल चलता है। जब 2026 में भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तब भी हर तीसरा मतदाता गाँव से है और हर दूसरा थाल खेत से। यही चरण सिंह की अमरता है कि वे अंक में थे, पर अंक से बड़े थे। वे महानायक इसलिए थे कि उन्होंने सत्ता को किसान के दरवाजे तक पैदल चलकर पहुँचाया, हवाई जहाज से नहीं।




