‘द लिवर डॉक’ ने लैब के रासायनिक प्रदूषकों को गोमूत्र में शामिल बताने का लगाया आरोप, स्प्रिंगर नेचर से जांच की मांग
वाराणसी। IIT-BHU और BITS पिलानी द्वारा गोमूत्र पर किए गए संयुक्त शोध को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। इस शोध में दावा किया गया था कि विभिन्न नस्लों की गायों के मूत्र में कई ऐसे बायोएक्टिव मेटाबोलाइट्स पाए गए हैं, जिनका औद्योगिक और औषधीय महत्व हो सकता है। हालांकि अब इस रिसर्च की वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
‘द लिवर डॉक’ के नाम से चर्चित डॉ. एबी फिलिप्स ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल पर आरोप लगाया है कि शोध में जिन रसायनों को गोमूत्र में मौजूद बताया गया है, उनमें कई लैब में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक, सॉल्वेंट्स और रासायनिक प्रदूषक हो सकते हैं। उनका कहना है कि इन यौगिकों को कैंसररोधी और जीवाणुरोधी गुणों वाला बताने के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दिए गए हैं।
डॉ. फिलिप्स ने शोध प्रकाशित करने वाले अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर नेचर की एथिक्स टीम और संपादकों को पत्र लिखकर मामले की जांच, ‘एक्सप्रेशन ऑफ कंसर्न’ जारी करने और शोध की वैज्ञानिक समीक्षा कराने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अध्ययन में कम नमूनों का उपयोग किया गया, सांख्यिकीय विश्लेषण पर्याप्त नहीं था और डेटा तालिकाओं व निष्कर्षों में कई विरोधाभास हैं।
यह शोध भारत सरकार के सूत्र-पीआईसी (SPARC-PIC) प्रोजेक्ट के तहत करीब 31 लाख रुपये की सहायता से किया गया था। इसमें IIT-BHU, BITS पिलानी और BHU के बरकछा (मिर्जापुर) स्थित दक्षिण परिसर के वैज्ञानिक शामिल थे। शोध में गोमूत्र के औषधीय गुणों का दावा किया गया था।
फिलहाल संबंधित संस्थानों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि शिकायत के आधार पर जर्नल स्तर पर जांच शुरू होती है, तो इस शोध की वैज्ञानिक वैधता की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।








