आओ स्वस्थ रहना सीखें
डाक्टर दीपक गोस्वामी
शाम के छह बजते ही रसोई पर ताला जड़ देने की बात आजकल हर व्हाट्सएप ग्रुप में घूम रही है। ऊपर से देखने में ये बड़ी सीधी सी बात लगती है कि बस खाना बंद कर दो और सुबह तक सिर्फ पानी पियो। लेकिन इसके पीछे शरीर का पूरा विज्ञान छिपा है और साथ में हमारी हजारों साल पुरानी आदतें भी। असल में ये कोई नई खोज नहीं है। हमारे दादा दादी सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करते थे। आयुर्वेद में भी कहा गया कि रात का खाना सूरज डूबने से पहले कर लेना चाहिए। अब उसी बात को मॉडर्न साइंस इंटरमिटेंट फास्टिंग और अर्ली टाइम रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग का नाम देकर वापस लाया है।
सोचिए जरा, जब आप शाम छह बजे के बाद कुछ नहीं खाते तो होता क्या है। पेट को पूरे बारह से चौदह घंटे का आराम मिल जाता है। दिन भर हमने जो ठूंस ठूंस कर खाया, कोल्ड ड्रिंक पी, चाय पकौड़े निपटाए, उन सबको पचाने में लिवर, किडनी, आंतें सब लगे रहते हैं। जब रात को भी हम खाते रहते हैं तो शरीर को मरम्मत का वक्त ही नहीं मिलता। गाड़ी दिन रात चलाओगे तो इंजन कब ठंडा होगा। ठीक वैसे ही शरीर को भी बिना ईंधन के कुछ घंटे चाहिए ताकि वो अंदर की सफाई कर सके। साइंस इसे ऑटोफैजी कहती है। मतलब शरीर की अपनी सफाई वाली मशीन चालू हो जाती है। पुरानी खराब कोशिकाओं को तोड़कर नई बनाती है। इसीलिए सुबह उठकर हल्का महसूस होता है, पेट साफ रहता है और मन भी शांत लगता है।
अब जमीनी हकीकत पर आते हैं। शहरों में छह बजे रसोई बंद करना बहुत लोगों के लिए मज़ाक जैसा है। ऑफिस से आदमी सात बजे निकलता है, ट्रैफिक में फंसकर आठ बजे घर पहुंचता है। बीवी बच्चों का इंतजार कर रही होती है कि साथ खाना खाएंगे। ऐसे में छह बजे ताला कैसे लगेगा। तो भाई सीधा हिसाब है कि नियम पत्थर की लकीर नहीं है। मकसद है सोने से तीन से चार घंटे पहले खाना बंद कर देना। आप दस बजे सोते हो तो सात बजे तक खा लो। बारह बजे सोते हो तो नौ बजे तक डिनर निपटा लो। असली खेल टाइमिंग का है, छह बजे का नहीं। गांव में आज भी लोग सात बजे खाना खाकर सो जाते हैं और तड़के चार बजे उठ जाते हैं। उनकी सेहत देख लो और अपनी देख लो। फर्क साफ दिख जाएगा।
अब बात करते हैं कि इससे होगा क्या। पहला और सबसे बड़ा फायदा वजन का। रात को लेट खाना सीधा चर्बी बनकर पेट और कमर पर जमा होता है। क्योंकि खाने के बाद हम बिस्तर पर लेट जाते हैं, कोई मेहनत नहीं। कैलोरी बर्न कहां होगी। जब आप जल्दी खाना बंद कर दोगे तो इंसुलिन लेवल रात में नीचे रहेगा। इंसुलिन नीचे गया तो शरीर जमा चर्बी को गलाना शुरू करेगा। दूसरा फायदा शुगर वालों को। खाना खाते ही ब्लड शुगर बढ़ती है। रात भर शुगर हाई रही तो सुबह फास्टिंग शुगर भी बढ़कर आएगी। डॉक्टर फिर दवा बढ़ा देंगे। अगर आपने सात बजे के बाद कुछ न खाया तो पूरी रात शुगर कंट्रोल में रहेगी। सुबह की रिपोर्ट भी अच्छी आएगी। तीसरा फायदा नींद का। पेट भरा होगा तो नींद कैसे आएगी। डकारें आएंगी, गैस बनेगी, खट्टी डकारें गले तक आएंगी। खाली पेट सोओगे तो नींद ऐसी आएगी जैसी बच्चे को आती है। गहरी और सुकून वाली।
लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। ये नुस्खा सबके लिए नहीं है। जिसको शुगर की दवा चल रही है और वो रात को खाना नहीं खाएगा तो आधी रात को शुगर लो होकर चक्कर आ सकते हैं। जान भी जा सकती है। प्रेग्नेंट औरत को दो लोगों का पेट भरना है। वो अगर भूखी सोएगी तो बच्चे पर असर पड़ेगा। जो लोग जिम जाते हैं, बॉडी बनाते हैं, उनको रात में प्रोटीन चाहिए मसल रिकवरी के लिए। वो छह बजे खाना बंद करेंगे तो मसल लॉस होगा। जिनका काम ही नाइट शिफ्ट का है, नर्स, सिक्योरिटी गार्ड, फैक्ट्री वर्कर, वो बेचारे क्या करें। उनके लिए तो रात ही दिन है। तो ये फॉर्मूला उनपर फिट नहीं बैठता।
एक और कड़वी सच्चाई ये है कि हमने छह बजे रसोई बंद कर दी, पर नौ बजे बिस्तर में लेटकर नमकीन का पैकेट खोल लिया, या आइसक्रीम खा ली, या दो गिलास दूध पी लिया। तो भाई ताला लगाने का फायदा क्या हुआ। नियम का मतलब है कि चूल्हा बंद तो मतलब बंद। पानी, बिना चीनी की हर्बल चाय, या गुनगुना पानी ले सकते हो। दूध भी एक तरह का भोजन है। उसमें कैलोरी है, फैट है, शुगर है। वो फास्ट तोड़ देगा।
शुरू में दिक्कत सबको आती है। सात बजते ही पेट में चूहेकूदने लगते हैं। आदत पड़ी है रात दस बजे तक कुछ न कुछ चबाने की। टीवी देखते हुए चिप्स, फोन चलाते हुए बिस्किट। ये भूख नहीं है, ये बोरियत वाली क्रेविंग है। पहले हफ्ते दस दिन लगेंगे। धीरे धीरे शरीर समझ जाएगा कि अब रात को खाना नहीं आएगा। फिर भूख लगनी बंद हो जाएगी। शुरुआत एकदम छह बजे से मत करो। पहले आठ बजे बंद करो, फिर सात बजे, फिर छह बजे। शरीर को झटका मत दो। वरना चिड़चिड़ाहट होगी, नींद नहीं आएगी, उल्टा BP बढ़ेगा।
असली बात ये है कि डाइट के नाम पर हम फैंसी चीजों के पीछे भागते हैं। ओट्स, क्विनोआ, एवोकाडो। अरे भाई अपनी रोटी सब्जी दाल चावल ही काफी है, बस टाइम से खा लो। हमारे पुरखे यही खाकर सौ साल जीते थे। उन्हें न जिम पता था न डायटीशियन। वो बस कुदरत के साथ चलते थे। सूरज के साथ उठो, सूरज के साथ खाओ, सूरज ढले तो आराम करो। हमने बिजली ईजाद कर ली और रात को दिन बना दिया। देर रात तक जागते हैं, मोबाइल चलाते हैं और साथ में कुछ न कुछ कुतरते रहते हैं। बीमारी को खुद न्योता देते हैं और फिर डॉक्टर के चक्कर लगाते हैं।
तो निचोड़ ये है कि शाम को जल्दी खाना बंद करना सेहत के लिए वाकई अच्छा है। विज्ञान भी मानता है और हमारी परंपरा भी यही कहती है। पर इसे जिद मत बनाओ। अपने काम, अपनी नींद, अपनी दवाओं के हिसाब से ढालो। मकसद पेट को बारह घंटे का ब्रेक देना है। चाहे वो छह से छह का हो या आठ से आठ का। और हां, कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले एक बार अपने फैमिली डॉक्टर से पूछ लेना। क्योंकि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की डिग्री से इलाज नहीं होता। शरीर अपना है, जिम्मेदारी भी अपनी है। समझदारी से चलो, फायदा जरूर मिलेगा। और अगर रात को बहुत तेज भूख लगे, चक्कर आए, घबराहट हो तो जबरदस्ती मत करो। एक फल खा लो, या एक गिलास दूध पी लो। जान से बढ़कर कोई नियम नहीं होता। सेहत बनानी है, सजा नहीं देनी है खुद को।




