डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यबहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।
तू कबीर मैं कबीर, हर एक भूखा उदास शोषित है कबीर। कबीर कोई एक देह नहीं, कबीर एक आवाज़ है जो हर उस गले से निकलती है जिसे भूख ने दबा दिया, जिसकी हँसी को समाज ने गिरवी रख लिया। कबीर वो आँख है जो मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे भिखारी में भी राम देख लेती है, और महल की दीवारों के पीछे छुपे अंधेरे में भी सवाल पूछ लेती है।
आज जी लो कबीर को। कबीर को जीना मतलब कलम तोड़ देना उन स्याही भरे झूठों पर जो कहते हैं कि आदमी जाति से बड़ा होता है। कबीर को जीना मतलब रोटी को मंत्र से ऊँचा मान लेना। कबीर ने कहा था, “भूखे भजन न होय गोपाला”, और आज भी सड़क पर खड़ा बच्चा पहले निवाला माँगता है, प्रवचन नहीं। तुम जब दफ्तर की एसी में बैठकर गरीबी पर लेख लिखते हो, तब तुम्हारी कलम कबीर नहीं। कबीर तब है जब तुम अपनी थाली में से एक रोटी उठाकर किसी भूखे को पकड़ा दो, बिना फोटो खींचे।
तू कबीर है जब तू कहता है कि मस्जिद का लाउडस्पीकर और मंदिर की घंटी, दोनों से ऊँची आवाज़ उस माँ की सिसकी है जिसका बेटा दिहाड़ी न मिलने से रात को भूखा सो गया। मैं कबीर हूँ जब मैं पंडित की पोथी और मौलवी की तकरीर दोनों को एक तरफ रखकर पूछता हूँ कि ईश्वर को भूख लगती है क्या? अगर नहीं, तो उसके नाम पर रोटी क्यों छीनी जाती है? कबीर हर वो शख्स है जो कहता है कि धर्म पेट भरने के बाद शुरू होता है, पहले नहीं।
शोषित है कबीर। हर फैक्ट्री में वो मजदूर कबीर है जिसके पसीने से तुम्हारी कार चमकती है, पर उसकी हथेली में छाले के सिवा कुछ नहीं। हर खेत में वो किसान कबीर है जो कर्ज के कागज को तकिया बनाकर सोता है और सुबह फिर उसी साहूकार को सलाम ठोकता है। हर घर में वो औरत कबीर है जो चूल्हे के धुएँ में अपने सपने जलाती है और फिर भी सबको गरम रोटी परोसती है। तुम उसे देवी कहते हो, कबीर उसे इंसान कहता है — थकी हुई, हारी हुई, पर फिर भी लड़ती हुई इंसान।
आज जी लो कबीर को मतलब तर्क की लाठी उठा लो। कबीर ने मूर्ति को पत्थर कहा तो लोगों ने काफिर कहा। आज तुम व्हाट्सएप फॉरवर्ड को वेद मान लेते हो और सवाल पूछने वाले को देशद्रोही। कबीर आज होता तो सबसे पहले तुम्हारे दिमाग में लगे ताले पर चोट करता। कहता, “पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।” डिग्रियां बटोर लीं, पर अक्ल? वो तो टीवी एंकर के पास गिरवी रख दी। कबीर को जीना है तो चैनल बदलो, किताब खोलो, और सबसे जरूरी — खुद से पूछो।
कबीर उदास है। उदास है उस बच्चे में जिसे स्कूल में सरनेम पूछकर पीछे बिठा दिया जाता है। उदास है उस लड़की में जिसे दहेज के लिए जला दिया जाता है और फिर उसी की तस्वीर पर मोमबत्ती जलाकर न्याय माँगा जाता है। उदास है उस बूढ़े में जो जवानी भर देश बनाता रहा और बुढ़ापे में पेंशन की लाइन में खड़ा गाली खाता है। ये उदासी कमजोरी नहीं, ये कबीर की आग है। उदासी जब सवाल बनती है तो क्रांति बन जाती है।
कलमतोड़ कबीर चाहिए। वो कलम तोड़ दो जो सिर्फ तारीफ लिखती है। वो कलम तोड़ दो जो डरकर सच के आगे झुक जाती है। कबीर की कलम आग थी — “कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर, ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर”। पर आज की कलम या तो बिकाऊ है या डरी हुई। आज कबीर को जीना है तो लिखो उस ठेकेदार पर जो मजदूर की मजदूरी मार गया। लिखो उस नेता पर जो धर्म के नाम पर रोटी छीनता है। लिखो उस समाज पर जो रेप के बाद लड़की के कपड़े नापता है। अगर उंगलियाँ काँपें तो समझो कबीर अभी मरा नहीं।
तू कबीर, मैं कबीर। हम सब कबीर हैं जब हम नफरत के बाजार में प्रेम की दुकान खोलते हैं। कबीर ने कहा था, “प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय”। आज प्रेम आईटी सेल पर बिक रहा है, 2 रुपये प्रति ट्वीट। कबीर को जिंदा करना है तो बिना लाइक की फिक्र किए किसी से कहो — “तू ठीक है न?” किसी अजनबी को पानी पिला दो। किसी थके हुए रिक्शेवाले को ‘भैया’ कहकर बुला लो। ये छोटे काम ही कबीर की चादर हैं — दाग वाले, पर अपनी।
भूखा है कबीर। सिर्फ पेट का नहीं, इज्जत का भूखा। वो सफाईकर्मी जो तुम्हारा मैला उठाता है और तुम नाक बंद कर लेते हो, वो कबीर है। उसे महीने के अंत में तनख्वाह नहीं, ‘थैंक यू’ चाहिए। वो दलित छात्र जो पहली बार कॉलेज पहुँचता है और सीनियर उसका मजाक उड़ाते हैं, वो कबीर है। उसे आरक्षण नहीं, बराबरी का मौका चाहिए। कबीर को जीना मतलब कुर्सी खींचकर पास बिठाना, नाम से बुलाना, इंसान समझना।
शब्द कम पड़ेंगे कबीर को जीने के लिए, क्योंकि कबीर कोई निबंध नहीं, रोज का अभ्यास है। सुबह उठकर खबर पढ़ते वक्त सोचो — ये खबर किसके हक में, किसके खिलाफ? दफ्तर जाते वक्त गार्ड को देखकर रुक जाओ — उसका नाम पूछो। रात को बेटे को सुलाते वक्त सिर्फ रामायण नहीं, कबीर के दोहे सुनाओ ताकि वो बड़ा होकर पत्थर में भगवान नहीं, इंसान में भगवान ढूंढे।
तो उठ, कलम तोड़। उस कलम को तोड़ जो चुप रहना सिखाती है। और नई कलम गढ़ — रीढ़ की हड्डी से। लिख कि तू कबीर है, मैं कबीर हूँ। जो भूखा है, वो कबीर है। जो उदास है, वो कबीर है। जो शोषित है, वो कबीर है। और जब हर शोषित कबीर हो जाएगा, उस दिन शोषण खुद बेघर हो जाएगा।
आज जी ले कबीर को। कल का इंतजार मत कर। क्योंकि कबीर कल नहीं, कबीर अभी है — तेरी साँस में, तेरे सवाल में, तेरे इनकार में। कबीर मरता नहीं, बस हम उसे भूल जाते हैं। आज याद कर ले। आज जी ले।








