ज्ञान भारतम् सर्वेक्षण में सामने आए मुगलकालीन दस्तावेज, नस्तालिक लिपि में लिखे अभिलेखों ने बढ़ाई इतिहासकारों की उत्सुकता…..?
आनंद वेदांती त्रिपाठी
अयोध्या। रामनगरी अयोध्या के प्राचीन मठ-मंदिरों में छिपा इतिहास अब धीरे-धीरे दुनिया के सामने आ रहा है। संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में चल रहे ‘ज्ञान भारतम्’ राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के दौरान प्राचीन आचारी मंदिर से लगभग 400 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां और ऐतिहासिक दस्तावेज प्राप्त हुए हैं। इनमें कुछ ऐसे अभिलेख भी शामिल हैं जिन्हें अब तक अयोध्या क्षेत्र में मिली सबसे प्राचीन पांडुलिपियों में माना जा रहा है।
सर्वेक्षण के दौरान आचारी मंदिर में कुल पांच हजार से अधिक पांडुलिपियां मिलने की जानकारी सामने आई है। मंदिर के महंत विवेक आचारी के अनुसार प्राप्त दस्तावेजों के अध्ययन के लिए इतिहासकारों से भी संपर्क किया गया है। कई अभिलेख नस्तालिक लिपि में लिखे गए हैं, जिसका उपयोग मुगल काल में फारसी, उर्दू और कश्मीरी भाषा के लेखन में व्यापक रूप से किया जाता था।
महंत विवेक आचारी ने बताया कि मंदिर में मिले कुछ दस्तावेज 16वीं शताब्दी के हैं, जिन पर तत्कालीन शासन की आधिकारिक मुहरें अंकित हैं। प्रारंभिक अध्ययन में इन्हें शाही फरमान, भूमि अनुदान, कानूनी अभिलेख तथा प्रशासनिक और न्यायिक आदेशों से संबंधित दस्तावेज माना जा रहा है। इसके अलावा वर्ष 1888 के भी कई महत्वपूर्ण अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
एक हजार वर्ष पुरानी परंपरा से जुड़ा है आचारी मंदिर
आचारी मंदिर की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। महंत विवेक आचारी के अनुसार मंदिर की परंपरा लगभग एक हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है। मंदिर के द्वितीय पूर्वाचार्य छत्रु स्वामी सिद्ध संत थे, जिनकी साधना और सिद्धि से प्रभावित होकर तत्कालीन मुस्लिम शासक ने मंदिर को लगभग 500 बीघा भूमि अनुदान स्वरूप प्रदान की थी।
आचारी मंदिर की विशेषता यह भी है कि इसके स्वामित्व क्षेत्र में स्थित तुलसी चौरा को वह स्थान माना जाता है, जहां गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना का शुभारंभ किया था। पुरातात्विक और ऐतिहासिक दृष्टि से इन दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज अयोध्या के गौरवशाली अतीत के नए अध्याय खोल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन दस्तावेजों के गहन अध्ययन से रामनगरी के इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।




